- समुद्री सुरक्षा समझौते ने दक्षिण एशिया से प्रशांत तक बदलते शक्ति संतुलन को दिया नया रणनीतिक आधार
भारत 19
नई दिल्ली। दक्षिण एशिया की जियो पॉलिटिक्स अब केवल जमीन पर खिंची सीमाओं से तय नहीं हो रही। भारत-पाकिस्तान तनाव, चीन से लगी हिमालयी सीमा और कश्मीर के साथ हिंद महासागर भी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का बड़ा मैदान बन चुका है। ग्वादर से हम्बनटोटा, मालदीव से बंगाल की खाड़ी और अंडमान-निकोबार से मलक्का जलडमरूमध्य तक समुद्री भूगोल नए राजनीतिक और सुरक्षा समीकरण गढ़ रहा है। ऐसे समय भारत-जापान का समुद्री सुरक्षा समझौता केवल रक्षा सहयोग का दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलती शक्ति राजनीति के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी का संकेत है।
इस व्यवस्था के तहत दोनों देश समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान, नौसैनिक संपर्क, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत में तालमेल बढ़ाएंगे। रक्षा तकनीक और नौसैनिक जहाज निर्माण में सहयोग की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। लेकिन इसकी असली अहमियत यह है कि हिंद महासागर और प्रशांत में भारत व जापान की सुरक्षा चिंताएं अब तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।
दक्षिण एशिया की नई राजनीति समुद्र में
लंबे समय तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति थल सीमाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन अब बंदरगाह, समुद्री मार्ग और बाहरी शक्तियों की नौसैनिक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। किस देश की पहुंच किस बंदरगाह तक है, कौन-सा जहाज कहां सक्रिय है और संकट के समय किसे रसद सहायता मिल सकती है, ये सवाल अब सुरक्षा गणना का हिस्सा हैं। भारत हिंद महासागर में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, जबकि जापान के व्यापारिक और सुरक्षा हित पश्चिमी प्रशांत से निकलकर हिंद महासागर तक फैले हैं। दोनों की भौगोलिक चिंताएं भले अलग हों, समुद्री हित अब एक साझा रणनीतिक क्षेत्र बना रहे हैं।
चीन का नाम नहीं, लेकिन चुनौती साफ
इस समझौते को किसी देश के खिलाफ घोषित सैन्य मोर्चा नहीं कहा जा सकता और न ही यह औपचारिक रक्षा गठबंधन है। फिर भी दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती आर्थिक और समुद्री मौजूदगी इसकी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है। पाकिस्तान के ग्वादर और श्रीलंका के हम्बनटोटा जैसे बंदरगाह लंबे समय से क्षेत्रीय रणनीतिक बहस के केंद्र में हैं। भारत की चिंता हर विदेशी निवेश परियोजना को सैन्य अड्डा मानने की नहीं, बल्कि हिंद महासागर में बाहरी शक्ति की बढ़ती दीर्घकालिक पहुंच को लेकर है। भारत-जापान सहयोग इसी स्थिति में भारत के रणनीतिक विकल्प और समुद्री क्षमता बढ़ाने की कोशिश है।
समुद्र में जानकारी ही पहली ताकत
विशाल हिंद महासागर में केवल युद्धपोतों की संख्या पर्याप्त नहीं। यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि कौन-सा जहाज कहां है और उसकी गतिविधि सामान्य है या असामान्य। समुद्री सूचनाओं और निगरानी में सहयोग इसलिए इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। भारत को अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक नजर रखनी है, जबकि जापान पश्चिमी प्रशांत में सक्रिय है। दोनों की निगरानी और सूचना क्षमताओं का तालमेल हिंद महासागर से प्रशांत तक समुद्री गतिविधियों की अधिक व्यापक तस्वीर तैयार कर सकता है। किसी तनाव की स्थिति में समय पर सूचना ही प्रतिक्रिया की तैयारी का पहला आधार बनती है।
ग्वादर से मलक्का तक जुड़ता रणनीतिक गलियारा
भारत की समुद्री चुनौती को अब केवल पाकिस्तान या केवल चीन के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी और वहां से मलक्का जलडमरूमध्य तक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सैन्य गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं। मलक्का जापान के लिए आर्थिक जीवनरेखा है, जबकि भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह इसे उसकी रणनीतिक गणना का अहम हिस्सा बनाते हैं। यहीं भारत का हिंद महासागर दृष्टिकोण और जापान का प्रशांत दृष्टिकोण एक-दूसरे से मिलता है। नया समझौता इस पूरी समुद्री पट्टी को साझा सुरक्षा चिंता के रूप में देखने का संकेत देता है।
छोटे पड़ोसी भी नए समीकरण में
श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों का महत्व भी इस नई समुद्री राजनीति में बढ़ गया है। भारत के लिए चुनौती केवल चीन के प्रभाव का मुकाबला करना नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों के सामने विकास, संपर्क और सुरक्षा सहयोग के विश्वसनीय विकल्प तैयार करना भी है। इस मामले में जापान एक महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है। भारत-जापान सहयोग छोटे देशों को किसी सैन्य खेमेबंदी में धकेलने के बजाय बुनियादी ढांचे और समुद्री सहयोग के अतिरिक्त विकल्प दे सकता है। यही इस साझेदारी का कम चर्चित, लेकिन महत्वपूर्ण पहलू है।
भारत के लिए नया क्षमता गुणक
समझौते में किसी युद्ध की स्थिति में सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी नहीं है। फिर भी सूचना साझेदारी, साझा अभ्यास, तकनीकी सहयोग और रसद समन्वय संकट के समय क्षमता बढ़ा सकते हैं। भारत के लिए जापान इसी अर्थ में एक क्षमता गुणक बन सकता है। सबसे बड़ा संदेश यही है कि दक्षिण एशिया अब अपनी सीमाओं में सिमटा भूगोल नहीं रहा। पाकिस्तान का समुद्री तट, श्रीलंका के बंदरगाह, मालदीव, बंगाल की खाड़ी और अंडमान-निकोबार अब हिंद-प्रशांत की बड़ी शक्ति राजनीति का हिस्सा हैं।


