- अमित शाह के वंदे मातरम् हमले के बाद राहुल गांधी ने जंतर-मंतर आंदोलन में पैलेट गन विवाद को फिर बनाया राजनीतिक मुद्दा
भारत 19
नई दिल्ली। जंतर-मंतर की उस सड़क पर हुए प्रदर्शन को एक महीना बीत चुका है। लोकसभा सत्र भी हंगामे में गुजर गया। राहुल गांधी ने छात्र साहिल लोछाब की चोटों को सामने रखकर सरकार को घेरने की कोशिश की, सुप्रीम कोर्ट तक पैलेट गन के इस्तेमाल का सवाल पहुंचा, लेकिन जिस राजनीतिक तूफान की कांग्रेस को उम्मीद थी, वह नहीं उठा। शुक्रवार को राहुल गांधी फिर उसी मोर्चे पर लौट आए।
संसद मार्ग थाने के बाहर धरना, घायल छात्र को साथ बैठाना और पैलेट गन से चोट के मामले में एफआईआर की मांग—सतह पर यह एक पुलिस कार्रवाई और न्याय की मांग की खबर है। लेकिन इसकी राजनीतिक टाइमिंग दूसरी कहानी कहती है। राहुल की यह वापसी ऐसे वक्त हुई, जब उससे एक दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस को ‘वंदे मातरम्’ के मुद्दे पर सीधे वैचारिक कटघरे में खड़ा कर दिया था। शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने के रुख को तुष्टिकरण और राष्ट्रवाद की बहस में लपेट लिया। बुधवार को भाजपा ने बहस का मैदान चुना—वंदे मातरम्, राष्ट्रवाद और कांग्रेस का इतिहास। शुक्रवार को राहुल गांधी फिर लौटे—जंतर-मंतर, पैलेट गन और पुलिस जवाबदेही पर। यहीं से संसद मार्ग थाने के बाहर का धरना सिर्फ एफआईआर की मांग नहीं रह जाता।
लोकसभा से नहीं उठा तो ‘जंतर-मंतर ’ लौटे
20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन के बाद कथित पैलेट गन इस्तेमाल का मुद्दा जरूर सुर्खियों में आया, लेकिन वह वैसा व्यापक राजनीतिक आंदोलन नहीं बन सका, जैसा कांग्रेस शायद चाहती थी। राहुल गांधी ने घायल छात्रों का मामला उठाया, साहिल लोछाब को सामने लाया और पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। लेकिन अदालत की सुनवाई ने राजनीतिक बहस को एक अलग पटरी पर डाल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन के इस्तेमाल पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए कहा कि जब तक इनके उपयोग की अनुमति देने वाले नियमों को असंवैधानिक नहीं ठहराया जाता, तब तक पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। हालांकि अदालत ने जंतर-मंतर पर तैनात आरएएफ के गोला-बारूद रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और कथित दुरुपयोग के विशिष्ट मामलों की जांच के सवाल को खुला रखा। साथ ही बल प्रयोग के क्रमिक और असाधारण परिस्थितियों वाले नियमों की भी पड़ताल शुरू हुई।
यहीं राहुल की पहली राजनीतिक कोशिश की कुंद पड़ गई। मुद्दा खत्म नहीं हुआ, लेकिन वह अदालत की प्रक्रिया, एसओपी और कानूनी जांच के दायरे में चला गया। अब राहुल ने उसी कहानी को नए सिरे से उठाया है। पहले सवाल था—क्या प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई?, अब सवाल है—जो युवक कथित तौर पर पैलेट घायल हुआ उसकी शिकायत पर एफआईआर क्यों नहीं? यानि पैलेट गन की बहस को राहुल ने फिर से पुलिस की जवाबदेही और पीड़ित को न्याय के फ्रेम में खड़ा कर दिया है।
‘वंदे मातरम्’ के बाद पैलेट की टाइमिंग
यहीं राजनीतिक हलकों की नजर राहुल गांधी के धरने की टाइमिंग पर टिकती है। अमित शाह ने कांग्रेस के ‘वंदे मातरम्’ रुख पर हमला करते हुए इसे सिर्फ एक सांस्कृतिक या ऐतिहासिक विवाद तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे कांग्रेस की पुरानी राजनीति, तुष्टिकरण और राष्ट्रीय पहचान की बहस से जोड़ दिया। भाजपा ने संकेत दिया कि वह इस मुद्दे को केवल एक दिन की बयानबाजी नहीं रहने देगी। ऐसे में राहुल गांधी का अगले ही दिन पैलेट गन विवाद को लेकर पुलिस थाने पहुंचना राजनीतिक संयोग भर नहीं दिखता। कम-से-कम भाजपा ने इसे उसी तरह पढ़ा है। पार्टी की ओर से रविशंकर प्रसाद ने राहुल के धरने को ‘अराजक राजनीति’ बताते हुए कहा कि इस घटना पर एफआईआर पहले से दर्ज है और जांच चल रही है। भाजपा नेताओं ने यह आरोप भी लगाया कि धरना ‘वंदे मातरम्’ विवाद से ध्यान हटाने की कोशिश है। यानी दोनों पक्ष अब एक-दूसरे पर नैरेटिव बदलने का आरोप लगा रहे हैं।
राहुल ने मुद्दा नहीं, रास्ता बदला
राहुल गांधी की रणनीति में एक बात साफ दिखाई देती है—उनकी राजनीतिक सुई अब भी जंतर-मंतर के आंदोलन पर अटकी है। लेकिन इस बार उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चल रही बड़ी कानूनी बहस को दोहराने के बजाय एक व्यक्ति की शिकायत को केंद्र बनाया है। साहिल लोछाब की चोट, उसकी एफआईआर की मांग और पुलिस के दरवाजे पर विपक्ष के नेता का बैठना—यह सब उस बड़े सवाल को मानवीय चेहरा देता है, जिसे अदालत की तकनीकी बहस में राजनीतिक धार नहीं मिल सकी। राहुल ने शुक्रवार को इसी आधार पर दिल्ली पुलिस पर मामला दर्ज करने का दबाव बनाया और साहिल के साथ संसद मार्ग थाने के बाहर धरना दिया। भाजपा ने जवाब में इसे कानून की प्रक्रिया से ऊपर जाकर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया। यही इस पूरे घटनाक्रम की असली राजनीतिक परत है।
अमित शाह ने कांग्रेस को ‘वंदे मातरम्’ के सवाल पर उसके वैचारिक इतिहास के कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। राहुल गांधी ने बहस को वहां टिकने देने के बजाय फिर उस मुद्दे की तरफ रुख किया, जहां सरकार को पुलिस कार्रवाई और जवाबदेही पर सफाई देनी पड़ सकती है। शुक्रवार का धरना केवल साहिल लोछाब की एफआईआर का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक लड़ाई का नया दौर है जिसमें एक तरफ भाजपा कांग्रेस को राष्ट्रवाद के मैदान में घेरना चाहती है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी सरकार को राज्य की ताकत और नागरिक के अधिकार के सवाल पर कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं।


