- चना, मसूर और मटर पर सीएसए में 29-30 अगस्त को राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की बैठक
विक्सन सिकरोरिया, कानपुर। खेत में बोई गई एक फसल अगर अपनी पैदावार देने के साथ अगली फसल के लिए भी मिट्टी को तैयार कर दे, कम पानी में उत्पादन दे और बदलते मौसम के जोखिम को भी कम करने में मदद करे, तो किसानों के लिए उससे बेहतर सौदा क्या हो सकता है। चना, मसूर और मटर जैसी रबी दलहनी फसलों को लेकर कृषि वैज्ञानिकों की बढ़ती दिलचस्पी के पीछे यही संभावनाएं हैं।
रबी की दालों को अब केवल प्रोटीन का स्रोत या किसानों की पारंपरिक फसल के रूप में नहीं देखा जा रहा है। कम सिंचाई, मिट्टी की उर्वरता और फसल विविधीकरण में उनकी भूमिका ने इन्हें बदलते कृषि परिदृश्य में महत्वपूर्ण बना दिया है। इन्हीं संभावनाओं पर मंथन के लिए चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) और भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के संयुक्त तत्वावधान में रबी दलहनी फसलों पर 31वीं अखिल भारतीय वार्षिक समूह बैठक आयोजित की जा रही है। सीएसए के कुलपति डॉ. संजीव गुप्ता के अनुसार, 29 और 30 अगस्त को होने वाली दो दिवसीय बैठक में देशभर से 100 से अधिक दलहन वैज्ञानिक हिस्सा लेंगे। बैठक में दलहन सुधार कार्यक्रमों, मूल्य संवर्धन और देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में रणनीति पर विचार होगा।

एक फसल, अगली फसल के लिए भी फायदा
दलहनी फसलों की सबसे खास विशेषताओं में उनकी जड़ों से जुड़ी जैविक प्रक्रिया शामिल है। जड़ों में मौजूद विशेष सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी रूप में बदलने में मदद करते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता पर सकारात्मक असर पड़ सकता है और अगली फसल को भी इसका लाभ मिल सकता है। कटाई के बाद दलहनी फसलों के अवशेष खेत में जैविक पदार्थ बढ़ाने में योगदान देते हैं। इससे अगली फसल के लिए उर्वरक की आवश्यकता कम करने की संभावना बनती है। यानी रबी की दाल खेत से केवल अनाज लेकर नहीं जातीं, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने में भी भूमिका निभा सकती हैं।

घटते भूजल के दौर में कम पानी वाली फसल
मसूर और चना जैसी फसलों की एक बड़ी विशेषता अपेक्षाकृत कम पानी में उत्पादन देना है। घटते भूजल और सिंचाई पर बढ़ते दबाव के बीच यह गुण किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि फसल चक्र और विविधीकरण में दलहनों की हिस्सेदारी बढ़ाने से सिंचाई पर दबाव कम किया जा सकता है। कम अवधि में तैयार होने वाली, रोगों के प्रति अधिक सहनशील और बदलते तापमान में बेहतर प्रदर्शन करने वाली किस्मों पर चल रहा शोध किसानों को मौसम संबंधी जोखिम से बचाने में मदद कर सकता है।
उत्पादन के साथ पर्यावरण का भी लाभ
दलहन खेती को टिकाऊ कृषि व्यवस्था के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मूल शोध तथ्यों के अनुसार, ये फसलें अपेक्षाकृत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ कार्बन अवशोषण में भी योगदान देती हैं। मिट्टी की उर्वरता, कम पानी की जरूरत और फसल विविधीकरण के कारण दलहनों की भूमिका भविष्य की कृषि रणनीति में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
100 से अधिक वैज्ञानिक तय करेंगे आगे की दिशा
सीएसए में होने वाली बैठक में देशभर के वैज्ञानिक रबी दलहनी फसलों पर अपने शोध और अनुभव साझा करेंगे। नई किस्मों, उत्पादन बढ़ाने, बदलते मौसम के अनुरूप खेती और दलहन सुधार कार्यक्रमों को गति देने पर चर्चा होगी। बैठक का महत्व केवल वैज्ञानिक विमर्श तक सीमित नहीं है। यहां होने वाली चर्चा का अंतिम लक्ष्य ऐसी तकनीक और रणनीति तैयार करना है, जिसका लाभ खेत तक पहुंच सके। कम पानी, बेहतर मिट्टी और पोषण से भरपूर उत्पादन, यही तीन कारण रबी की दालों को किसानों के लिए भविष्य की महत्वपूर्ण फसलों में शामिल कर रहे हैं।

