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उत्पादन बढ़ा, फिर भी चीनी ने सरकार से कराया आयात

  • त्योहारी मांग से पहले बाजार में बढ़ी किल्लत, आपूर्ति संभालने के लिए केंद्र को खोलना पड़ा विदेश से चीनी मंगाने का रास्ता

भारत 19
कानपुर
। देश में चीनी का उत्पादन बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में उसकी किल्लत और महंगाई ने सरकार का पूरा गणित बिगाड़ दिया। त्योहारी मौसम से पहले हालात ऐसे बने कि केंद्र को घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए विदेश से चीनी मंगाने का रास्ता खोलना पड़ा। यही पूरे संकट का सबसे बड़ा विरोधाभास है। उत्पादन बढ़ने के बाद भी बाजार को राहत नहीं मिली। वजह यह कि चीनी की उपलब्धता केवल मौजूदा उत्पादन से तय नहीं होती। पिछले साल की कमी का असर, सीमित शुरुआती भंडार, गन्ने का एथेनाल उत्पादन में इस्तेमाल और बढ़ती मांग ने मिलकर बाजार को उस स्थिति में पहुंचा दिया, जहां सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। मौजूदा संकट ने यह भी साफ कर दिया कि देश में चीनी का उत्पादन बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि कुल उत्पादन में से घरेलू बाजार के लिए कितनी चीनी उपलब्ध रहती है और बढ़ती खपत के मुकाबले उसका संतुलन कितना मजबूत है।

उत्पादन का विरोधाभास यहीं से शुरू हुआ

चालू चीनी वर्ष में उत्पादन बेहतर रहा, लेकिन बाजार पिछले साल की कमजोर स्थिति का बोझ लेकर आगे बढ़ा। उत्पादन में गिरावट के कारण जो कमी पैदा हुई थी, उसका असर अगले चक्र की उपलब्धता और शुरुआती स्टाक पर भी पड़ा। इसलिए मौजूदा वर्ष में उत्पादन बढ़ने का फायदा सीधे कीमतों में कमी के रूप में दिखाई नहीं दिया। नई चीनी आने के साथ बाजार को पहले से मौजूद कमी की भरपाई भी करनी पड़ी। यहीं उत्पादन और वास्तविक उपलब्धता का अंतर पैदा हुआ। आंकड़ों में वृद्धि के बावजूद बाजार में राहत उतनी नहीं पहुंची, जितनी सामान्य परिस्थितियों में पहुंचनी चाहिए थी।

गन्ने के सामने चीनी और ईंधन की दोहरी मांग

मौजूदा संकट की दूसरी परत एथेनाल नीति से जुड़ी है। भारत पेट्रोल में एथेनाल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके लिए गन्ने से जुड़े कच्चे माल का भी इस्तेमाल होता है।  यानि गन्ने के सामने अब केवल चीनी उत्पादन की जरूरत नहीं है। उसका एक हिस्सा देश की ऊर्जा नीति से भी जुड़ चुका है। यहीं नीति का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनाल उत्पादन की ओर जाने पर चीनी के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ ई-20 जैसे लक्ष्य भी सरकार की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा हैं। इसलिए मौजूदा बहस एथेनाल को रोकने या जारी रखने भर की नहीं है। असली सवाल यह है कि ऊर्जा जरूरत और खाद्य बाजार के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए, जिससे किसी एक की कीमत दूसरे को न चुकानी पड़े। इसी कारण एथेनाल उत्पादन के लिए मक्का, चावल और अन्य विकल्पों की भूमिका बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

त्योहारों ने समय से पहले बढ़ाई बाजार की चिंता

चीनी का संकट ऐसे समय गहराया है, जब देश में मांग बढ़ने का सबसे बड़ा दौर शुरू होने वाला है। त्योहारों के दौरान घरेलू खपत के साथ मिठाई और खाद्य उद्योग की जरूरत भी तेजी से बढ़ती है। इस अवधि से पहले बड़े खरीदार और कारोबारी अपनी जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त खरीद शुरू कर देते हैं। बाजार में उपलब्धता को लेकर आशंका होने पर यह खरीदारी और तेज हो जाती है। यानि दबाव केवल वास्तविक खपत से नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत को लेकर की जाने वाली खरीद से भी पैदा होता है। त्योहारी सीजन से पहले यही स्थिति सरकार के लिए चिंता का कारण बनी। बढ़ती कीमतों का असर सीधे उपभोक्ताओं के साथ मिठाई, बेकरी, बिस्किट, पेय पदार्थ और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत पर पड़ने लगा।

सरकार को आखिर खोलना पड़ा आयात का रास्ता

घरेलू उत्पादन में सुधार के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि बाजार की जरूरत को देश के भीतर की आपूर्ति से संभाल लिया जाएगा। लेकिन बढ़ती कीमतों और त्योहारी मांग के दबाव ने यह अनुमान बदल दिया। केंद्र सरकार का आयात की अनुमति देना इस बात का संकेत है कि घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना तत्काल जरूरी हो गया था। सरकार के इस कदम का उद्देश्य केवल अतिरिक्त चीनी मंगाना नहीं, बल्कि बाजार को यह भरोसा दिलाना भी है कि आने वाले दिनों में उपलब्धता बढ़ाई जाएगी। हालांकि उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि अतिरिक्त चीनी कितनी जल्दी प्रसंस्करण के बाद थोक और फुटकर बाजार तक पहुंचती है। आयात की घोषणा से कीमतें अपने आप नहीं घटेंगी। राहत तभी मिलेगी, जब अतिरिक्त आपूर्ति बाजार में दिखाई देने लगेगी।

संकट ने नीति के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल

चीनी की मौजूदा स्थिति ने सरकार के सामने एक व्यापक नीतिगत चुनौती खड़ी कर दी है। किसान को बेहतर दाम चाहिए ताकि वह गन्ने की खेती बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हो। चीनी मिलों को पर्याप्त कच्चा माल चाहिए। एथेनॉल कार्यक्रम को भी आगे बढ़ाना है और उपभोक्ता को बढ़ती कीमतों से राहत भी देनी है। भारतीय कृषि उत्पाद, उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानेश मिश्रा का कहना है कि चीनी की बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। उनका मानना है कि गन्ना किसानों को बेहतर मूल्य देकर उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जाने चाहिए। साथ ही एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल की नीति पर भी नए सिरे से विचार होना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां सरकार को दीर्घकालिक समाधान तलाशना होगा। केवल संकट के समय आयात का सहारा लेना बाजार को अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए उत्पादन, भंडार और गन्ने के विभिन्न उपयोगों के बीच पहले से संतुलन बनाना होगा।

अब अगली फसल पर टिकी नजर

फिलहाल बाजार की निगाह अतिरिक्त आपूर्ति और अगले पेराई सत्र पर है। यदि बाजार में समय पर चीनी पहुंचती है और आने वाले सीजन में गन्ने का उत्पादन बेहतर रहता है तो कीमतों की मौजूदा तेजी पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन यदि उत्पादन और उपलब्धता के बीच अंतर फिर बढ़ा तो बाजार पर दबाव दोबारा लौट सकता है।

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