- कानपुर-बुंदेलखंड में टिकट और सत्ता की दौड़ ने बढ़ाई संगठन की बेचैनी, 2027 चुनाव से पहले चुनौती
राजीव सक्सेना, कानपुर। भाजपा को खड़ा करने के लिए कभी सड़क पर संघर्ष करने वाले, आंदोलन करने वाले और संगठन की जड़ें मजबूत करने वाले कार्यकर्ता अब पार्टी की नई राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी नाराजगी का केंद्र दूसरे दलों से आने वाले वे नेता हैं, जिन्हें भाजपा में प्रवेश के बाद टिकट मिला, चुनाव लड़ने का मौका मिला और कई मामलों में सत्ता व संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां भी।
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में यह सवाल अब बंद कमरों की चर्चा तक सीमित नहीं है। कानपुर के पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष विनोद शुक्ला ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर दी है। उनका तंज सीधे उस नीति पर है, जिसमें पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के बजाय बाहर से आए नेताओं पर दांव लगाती दिखाई देती है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने अब चुनौती केवल मजबूत उम्मीदवार तलाशने की नहीं, बल्कि उन कार्यकर्ताओं के भरोसे को संभालने की भी है, जिन्होंने पार्टी के कमजोर दौर से लेकर उसके सत्ता के शिखर तक पहुंचने की यात्रा में जमीन पर काम किया।
बिठूर से भोगनीपुर तक बदली राजनीति की तस्वीर
कानपुर नगर की बिठूर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव से पहले कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे अभिजीत सिंह सांगा भाजपा में आए और उन्हें टिकट मिल गया। स्थानीय समीकरणों और पारिवारिक राजनीतिक पकड़ के सहारे सांगा चुनाव भी जीत गए। लेकिन पार्टी के भीतर वर्षों से टिकट की उम्मीद लगाए नेताओं के लिए यह फैसला एक संकेत था कि चुनावी जरूरत पड़ने पर पुराने दावेदारों के ऊपर नए नेताओं को तरजीह मिल सकती है। 2022 में भोगनीपुर विधानसभा सीट पर यह तस्वीर फिर दिखाई दी। सपा और कांग्रेस में रह चुके राकेश सचान चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए और पार्टी ने उन्हें टिकट दिया। वह चुनाव जीते और बाद में प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। यह सीट भाजपा के पास पहले से थी। ऐसे में संगठन के भीतर वर्षों से सक्रिय नेताओं के लिए यह फैसला और अधिक असहज करने वाला था। यहीं से पुराने कार्यकर्ताओं के बीच एक सवाल मजबूत हुआ है कि पार्टी के लिए वर्षों तक संघर्ष करने की राजनीतिक कीमत आखिर क्या है?
2024 ने संगठन को भी दिया चेतावनी का संकेत
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दूसरे दलों से भाजपा में आने वाले नेताओं की संख्या तेजी से बढ़ी। लेकिन चुनाव परिणाम 2019 की तुलना में बिल्कुल अलग रहे। 2019 में जिन 10 लोकसभा सीटों पर भाजपा को सफलता मिली थी, उनमें 2024 में पार्टी चार सीटों तक सिमट गई। चुनावी नतीजों के पीछे विपक्षी गठबंधन, उम्मीदवारों की स्थिति और स्थानीय मुद्दों समेत कई कारण रहे। इसके बावजूद पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी चर्चा में रही। संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि चुनावी राजनीति में बाहर से बड़े चेहरे लाना उपयोगी हो सकता है, लेकिन इससे स्थानीय कार्यकर्ता की भूमिका कमजोर पड़ने का संदेश नहीं जाना चाहिए। यानी 2024 के नतीजों ने कम से कम इतना जरूर दिखाया कि संगठन की जमीन केवल बड़े राजनीतिक चेहरों से नहीं, कार्यकर्ताओं के भरोसे से भी मजबूत होती है।
अब नए चेहरे, पुरानी सीटों पर दावेदारी
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के तीन बार के विधायक और राष्ट्रीय सचिव रहे अजय कपूर का भाजपा में शामिल होना क्षेत्र की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में रहा। लोकसभा टिकट भले उन्हें नहीं मिला, लेकिन अब किदवई नगर और गोविंद नगर विधानसभा सीट से उनकी दावेदारी की चर्चा है। इसी तरह रमा निरंजन 2021 में सपा छोड़कर भाजपा में आईं और 2022 में भाजपा ने उन्हें झांसी-जालौन-ललितपुर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद चुनाव में प्रत्याशी बनाया। वह चुनाव जीत गईं। आरके सिंह पटेल को भी दूसरे दल से भाजपा में आने के बाद विधानसभा और लोकसभा, दोनों स्तरों पर अवसर मिले। पुराने कार्यकर्ताओं की बेचैनी यहीं है। जिन राजनीतिक सीढ़ियों को वे वर्षों से संगठन में काम कर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर कई बार बाहर से आया नेता सीधे ऊपर पहुंच जाता है।
विनोद शुक्ला की टिप्पणी ने खोल दिया असंतोष
पूर्व जिलाध्यक्ष विनोद शुक्ला ने सोशल मीडिया पर लिखी टिप्पणी में पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मुद्दा खुलकर उठाया है। उन्होंने सवाल किया कि अपने कार्यकर्ताओं को मजबूत करने के बजाय पार्टी उन नेताओं को क्यों आगे बढ़ा रही है, जिनका राजनीतिक अतीत दूसरे दलों से जुड़ा रहा है। शुक्ला का कहना है कि कार्यकर्ता घमंडी नहीं, स्वाभिमानी होता है। वह पार्टी के फैसले के अनुसार प्रत्याशी के लिए पूरी ताकत से चुनाव लड़ता है, लेकिन जीत के बाद उपेक्षित महसूस करता है। उन्होंने पूर्व जिलाध्यक्षों और संगठन के पुराने लोगों के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनकी टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी विपक्षी दल का आरोप नहीं, बल्कि भाजपा संगठन के एक पूर्व जिलाध्यक्ष की सार्वजनिक नाराजगी है।
2027 से पहले भाजपा को साधना होगा संतुलन
चुनाव करीब आने के साथ दूसरे दलों के नेताओं को भाजपा में शामिल करने की प्रक्रिया फिर तेज हो सकती है। राजनीतिक रूप से प्रभावशाली चेहरों को साथ लाना चुनावी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन कानपुर-बुंदेलखंड में इससे पुराने और नए नेताओं के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी होगा। भाजपा के सामने असली चुनौती यह है कि चुनावी गणित के लिए नए चेहरे जोड़ते हुए संगठन की पुरानी रीढ़ को नाराज न होने दिया जाए। क्योंकि टिकट का फैसला नेतृत्व करता है, लेकिन चुनावी लड़ाई आखिरकार उसी कार्यकर्ता को जमीन पर लड़नी होती है, जो वर्षों से पार्टी का झंडा उठाए हुए है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कानपुर-बुंदेलखंड भाजपा में यह खिंचाव कितना बढ़ता है और पार्टी इसे किस तरह संभालती है, यह संगठनात्मक राजनीति की एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।


