- दो अधिवक्ताओं पर कार्रवाई रद्द; गैंग चार्ट के आधार पर मुकदमे की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
भारत 19
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा बुनियादी सवाल उठाया है, जिसने इस कानून के इस्तेमाल पर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने पूछा है कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ सजा देने के लिए कोई अलग और स्पष्ट अपराध ही तय नहीं है, तो उसके खिलाफ विशेष कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई किस आधार पर की जाएगी?
इसी सवाल से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो अधिवक्ताओं के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत की गई कार्रवाई रद्द कर दी। शीर्ष अदालत के फैसले का सीधा अर्थ यह है कि केवल किसी व्यक्ति को गैंगस्टर बताकर या उसका नाम गैंग चार्ट में शामिल कर देना, अपने आप में मुकदमे और सजा का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के अधिवक्ता शिव प्रताप सिंह उर्फ चीनू और हिमांशु श्रीवास्तव से जुड़ा था। दोनों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक क्रियाकलाप निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
पहले अपराध, फिर गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट के सामने कानून की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा। आम तौर पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए पुलिस संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों और कथित गतिविधियों के आधार पर गैंग चार्ट तैयार करती है। इसके बाद उसे गैंगस्टर घोषित करते हुए विशेष कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है। अदालत ने इसी व्यवस्था की कानूनी बुनियाद को परखा। उसका कहना था कि हत्या, लूट, रंगदारी, धमकी या अन्य गंभीर आपराधिक कृत्यों के लिए पहले से अलग-अलग कानून मौजूद हैं। इन अपराधों में मुकदमा और सजा भी उन्हीं कानूनों के तहत हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठा कि जब मूल अपराधों के लिए कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं, तो केवल उन्हीं मामलों को जोड़कर किसी व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत अलग कार्रवाई का आधार क्या होगा।
केवल गैंग चार्ट काफी नहीं
शीर्ष अदालत की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू गैंग चार्ट को लेकर है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी व्यक्ति का नाम गैंग चार्ट में डाल देने भर से उसके खिलाफ एक अलग दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने का आधार अपने आप तैयार नहीं हो जाता। दंड कानून का मूल सिद्धांत है कि जिस कृत्य के लिए किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जा रहा है, वह कानून में स्पष्ट रूप से अपराध होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत के आधार पर गैंगस्टर एक्ट की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाया। अदालत की चिंता यह भी रही कि किसी व्यक्ति को गैंगस्टर घोषित करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उसके खिलाफ गिरफ्तारी, मुकदमा और अन्य कठोर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसलिए ऐसी कार्रवाई के पीछे स्पष्ट कानूनी आधार होना जरूरी है।
दो अधिवक्ताओं को मिली राहत
मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अधिवक्ताओं के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत चल रही कार्रवाई रद्द कर दी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर उन मूल आपराधिक मामलों पर नहीं पड़ेगा, जो किसी अन्य कानून के तहत दर्ज हैं। यानी अगर किसी व्यक्ति पर हत्या, मारपीट, धमकी या किसी अन्य अपराध का मामला दर्ज है, तो उसकी जांच और मुकदमा संबंधित कानूनों के तहत चलता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की राहत केवल गैंगस्टर एक्ट के तहत की गई उस कार्रवाई तक सीमित है, जिसकी कानूनी बुनियाद को अदालत ने इस मामले में पर्याप्त नहीं माना।
फैसले से क्यों बढ़ी बहस
उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल संगठित अपराध और गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल बताए जाने वाले लोगों के खिलाफ बड़े पैमाने पर किया जाता रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी का महत्व केवल दो व्यक्तियों को राहत मिलने तक सीमित नहीं है। इस फैसले ने जांच एजेंसियों और प्रशासन के सामने भी यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गैंग चार्ट तैयार करने और किसी व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए कानूनी कसौटी कितनी स्पष्ट और मजबूत होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से मूलतः यही संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति को गैंगस्टर का ठप्पा लगाने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसके खिलाफ विशेष कानून के तहत कार्रवाई का अपराध और कानूनी आधार क्या है। यही सवाल अब उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट से जुड़े मामलों में आगे की कानूनी बहस का केंद्र बन सकता है।


