- नई के लिए एक साल से दफ्तरों के चक्कर; ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ के दावे के बीच सिस्टम की संवेदनहीन तस्वीर
भारत 19
कानपुर। सरकार ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ की बात करती है, लेकिन कौशांबी के दीनानाथ मिश्रा की कहानी सरकारी दावों और जमीन की हकीकत के बीच का फासला दिखाती है। दोनों पैरों से दिव्यांग दीनानाथ के लिए करीब आठ साल पहले मिली ट्राईसाइकिल सहारा बनी थी। वह खराब हुई तो नई ट्राईसाइकिल के लिए करीब एक साल पहले आवेदन करने का उनका दावा है। इसके बाद भी जरूरतमंद दीनानाथ को सहारा मिलने के बजाय दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े।
सिराथू तहसील क्षेत्र के निजामपुर नौगिरा गांव निवासी दीनानाथ मिश्रा दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वाडियो में वह बताते है कि करीब आठ साल पहले उन्हें ट्राईसाइकिल मिली थी। समय के साथ वह खराब हो गई। नई ट्राईसाइकिल के लिए उन्होंने आवेदन किया, लेकिन करीब एक साल बाद भी इंतजार खत्म नहीं हुआ। मामला तब सामने आया जब दीनानाथ कलेक्ट्रेट पहुंचे और मदद की गुहार लगाई। सोशल मीडिया पोस्टों में प्रशासन के संज्ञान में मामला आने और ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराने की बात कही गई है। हालांकि, नई ट्राईसाइकिल उन्हें मिल चुकी है, इसकी अभी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
योजना दिव्यांग के लिए, लेकिन लाभ लेने को दफ्तरों की दौड़
सरकार दिव्यांगजनों को सहायक उपकरण उपलब्ध कराने के लिए योजनाएं चला रही है। ट्राईसाइकिल भी इसी तरह की सहायता का हिस्सा है। इसका मकसद साफ है, दिव्यांग व्यक्ति की आवाजाही आसान हो और वह दूसरों पर कम निर्भर रहे। हालांकि दीनानाथ का मामला व्यवस्था की एक अहम कमजोरी सामने लाता है। अगर वह योजना के पात्र हैं तो करीब एक साल तक सहायता क्यों नहीं पहुंची? आवेदन कहां अटका रहा? और अगर किसी वजह से वह पात्र नहीं थे तो उन्हें इसकी स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिली? इन सवालों का जवाब इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मामला किसी ऐसी सुविधा का नहीं है जिसे कुछ समय के लिए टाला जा सके। दीनानाथ के लिए ट्राईसाइकिल रोजमर्रा की आवाजाही और आत्मनिर्भरता का साधन है।
सरकार के दावे और सिस्टम की हकीकत के बीच सवाल
सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितनी आसानी से पहुंचता है। दीनानाथ का मामला इसी कसौटी पर प्रशासनिक तंत्र से जवाब मांगता है। सरकार ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ की बात करती है, लेकिन यदि एक दिव्यांग व्यक्ति को अपनी जरूरत की सहायता के लिए महीनों तक आवेदन और कार्यालयों के बीच भटकना पड़े तो सवाल केवल एक ट्राईसाइकिल का नहीं रह जाता। सवाल यह बनता है कि कल्याणकारी योजना और उसके लाभार्थी के बीच खड़ी प्रशासनिक व्यवस्था कितनी संवेदनशील और जवाबदेह है।
दीनानाथ की शिकायत सही है या आवेदन प्रक्रिया में कोई तकनीकी अड़चन थी, इसका स्पष्ट जवाब प्रशासनिक तंत्र ही देगा। लेकिन एक बात तय है, जिस व्यक्ति को सरकारी सहायता की जरूरत है, उसे सहायता पाने के लिए व्यवस्था से लड़ना न पड़े, यही किसी भी कल्याणकारी योजना की पहली कसौटी होनी चाहिए। और कौशांबी का यह मामला इसी कसौटी पर प्रशासन से जवाब मांग रहा है।


