- मानसून सत्र में हंगामे से कामकाज प्रभावित, फिर भी सरकार का विधायी एजेंडा आगे बढ़ा; विपक्ष के विरोध और कम चर्चा में विधेयक पारित होने पर दोनों पक्षों से सवाल
भारत 19 | नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र खत्म हो गया, लेकिन इसके साथ सरकार और विपक्ष के बीच टकराव पर बहस भी शुरू हो गई है। विपक्ष ने परीक्षा व्यवस्था, छात्रों से जुड़े विवाद और पुलिस कार्रवाई समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरा। सत्र के दौरान प्रश्नकाल, शून्यकाल और विधेयकों पर चर्चा प्रभावित हुई, इसके बीच सरकार ने अपना विधायी एजेंडा आगे बढ़ाया।
विपक्ष बहस के मौके से चूका
परीक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़े विवाद विपक्ष के प्रमुख मुद्दे रहे। विपक्ष ने इन मामलों पर सरकार से जवाब मांगा और सदन में चर्चा की मांग की। सरकार की ओर से चर्चा के लिए अवसर देने की बात भी सामने आई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी और गतिरोध कई मौकों पर कायम रहा। यहां विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठता है। सरकार को घेरने के लिए संसद में सवाल, चर्चा, संशोधन और संसदीय समितियां मौजूद हैं। लगातार कार्यवाही बाधित होने से विपक्ष जिस सरकार से जवाब मांग रहा था, उसी से जवाब लेने का मंच भी प्रभावित हुआ। इस लिहाज से कार्यवाही बाधित करने की तत्काल जिम्मेदारी विपक्ष पर अधिक दिखाई देती है। गंभीर मुद्दा उठाना उसका अधिकार है, लेकिन सदन को लगातार बाधित करना उस अधिकार का प्रभावी इस्तेमाल नहीं माना जा सकता।
बहुमत के बावजूद सरकार की परीक्षा
सरकार के लिए केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। बहुमत वाली सरकार के पास विधेयक पारित कराने की ताकत जरूर है, लेकिन संसद केवल मतदान की जगह नहीं है। सत्र में कुछ विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा हुई, जबकि कुछ बहुत कम चर्चा के बाद पारित हुए। इससे विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठता है। महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले कानूनों पर पर्याप्त बहस और संसदीय समितियों की जांच कानून की गुणवत्ता के लिए जरूरी मानी जाती है। बहुमत कानून पारित करा सकता है, लेकिन बहस का विकल्प नहीं बन सकता।

175 करोड़ रुपये से बड़ा है संसदीय समय का सवाल
सत्र में हुए व्यवधान की आर्थिक कीमत करीब 175 करोड़ रुपये आंकी गई। यह सीधे सरकारी खजाने से निकलने वाली रकम नहीं, बल्कि संसद के संचालन की अनुमानित लागत के आधार पर निकाला गया आंकड़ा है। लेकिन नुकसान का असली सवाल इससे बड़ा है। सदन का बाधित हर मिनट किसी सवाल, बहस या जनता से जुड़े मुद्दे के छूट जाने का कारण बन सकता है। इसलिए संसद के समय को केवल रुपये में नहीं, लोकतांत्रिक अवसर के रूप में भी देखना होगा।
दोष किसका?
तटस्थ आकलन में सदन रोकने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी विपक्ष की अधिक है, लेकिन लंबे गतिरोध की राजनीतिक जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। विपक्ष को सरकार के खिलाफ अपने मुद्दों को बहस और संसदीय प्रक्रियाओं के जरिए अधिक प्रभावी ढंग से उठाना होगा। सरकार को भी गंभीर मुद्दों पर संवाद और पर्याप्त चर्चा का रास्ता खुला रखना होगा। संसद चली, कानून भी बने; लेकिन व्यवधान ने बहस और जवाबदेही के हिस्से को प्रभावित किया। यही वह बिंदु है जहां दोनों पक्षों को अगली बार अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करना होगा। संसद का असली पैमाना केवल यह नहीं कि कितने विधेयक पारित हुए, बल्कि यह भी है कि उन पर कितनी गंभीर बहस हुई और सरकार से जनता के कितने सवालों के जवाब मिले।


