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ट्रांसजेंडर कानून 2026: अब सरकार तय करेगी पहचान


– स्व-पहचान का अधिकार खत्म, मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और जिला मजिस्ट्रेट के प्रमाणपत्र से मिलेगी कानूनी मान्यता, सर्जरी के बाद भी पहचान बदलने के लिए सरकारी प्रक्रिया जरूरी

भारत 19 डेस्क
कानपुर।
भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कानूनी पहचान का आधार 2026 में बदल गया है। नए संशोधन ने उस व्यवस्था को खत्म कर दिया है जिसमें व्यक्ति की स्वयं पहचानी गई लैंगिक पहचान को कानूनी पहचान का स्पष्ट आधार माना गया था। अब ट्रांसजेंडर के रूप में कानूनी मान्यता के लिए निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और जिला मजिस्ट्रेट का प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण होगा। यही बदलाव इस कानून को केवल ट्रांसजेंडर कल्याण से जुड़ा संशोधन नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान और राज्य की प्रमाणन शक्ति के बीच एक बड़े बदलाव के रूप में सामने लाता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को मार्च में संसद ने पारित किया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून लागू हो चुका है। इसके कई प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अदालत को यह तय करना है कि स्व-पहचान के अधिकार को हटाकर मेडिकल और प्रशासनिक प्रमाणन की नई व्यवस्था संविधान के तहत व्यक्ति की गरिमा, निजता, स्वायत्तता और समानता के अनुरूप है या नहीं।

पहचान अब सिर्फ व्यक्ति के कहने से तय नहीं होगी

2019 के कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी स्वयं पहचानी गई लैंगिक पहचान का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया था। 2026 के संशोधन ने इस प्रावधान को हटा दिया है। इसके बाद कानूनी पहचान हासिल करने की प्रक्रिया में मेडिकल बोर्ड की भूमिका बढ़ गई है। जिला मजिस्ट्रेट पहचान प्रमाणपत्र जारी करने से पहले नामित मेडिकल बोर्ड की सिफारिश की जांच करेगा। बोर्ड का नेतृत्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी स्तर का अधिकारी करेगा और जरूरत पड़ने पर अन्य मेडिकल विशेषज्ञों की सहायता भी ली जा सकती है। यानी अब कानूनी पहचान की राह व्यक्ति के आवेदन से शुरू होकर मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी तक पहुंचेगी। यही बदलाव 2026 के कानून का सबसे बड़ा सवाल सामने लाता है, कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान का अंतिम कानूनी निर्धारण उसका अपना होगा या राज्य की निर्धारित प्रक्रिया तय करेगी?

असली बदलाव सेक्स चेंज नहीं, पहचान का है

ट्रांसजेंडर कानून की चर्चा में जेंडर चेंज या सेक्स-रीअसाइनमेंट सर्जरी पर काफी ध्यान गया है, लेकिन कानूनी तौर पर 2026 का संशोधन ऐसी सर्जरी पर सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाता। बदलाव यह है कि यदि कोई व्यक्ति लैंगिक परिवर्तन सर्जरी कराता है तो उसके बाद संशोधित पहचान प्रमाण-पत्र की प्रक्रिया अनिवार्य हो जाती है। जिस मेडिकल संस्थान में ऐसी सर्जरी होती है, उसे इसकी जानकारी संबंधित जिला मजिस्ट्रेट और मेडिकल बोर्ड को देने की व्यवस्था भी की गई है। इसलिए नए कानून को सेक्स चेंज पर रोक कहना सही नहीं होगा। ज्यादा सटीक यह है कि सर्जरी और कानूनी पहचान के बीच सरकारी प्रमाणन की कड़ी पहले से मजबूत कर दी गई है। इसका व्यावहारिक असर कितना होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि जेंडर बदलने का चिकित्सकीय निर्णय और उसके बाद की कानूनी पहचान अब पहले की तुलना में अधिक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ गई है।

सर्जरी कराने से अपने आप नहीं मिलेगी कानूनी पहचान

2026 के संशोधन का एक और महत्वपूर्ण पहलू ट्रांसजेंडर की कानूनी परिभाषा में बदलाव है। संशोधित कानून ने पहले मौजूद व्यापक श्रेणियों को बदल दिया है। ट्रांस-मैन, ट्रांस-वुमन और जेंडरक्वियर यानी पुरुष या महिला की पारंपरिक लैंगिक पहचान से अलग पहचान रखने वाले व्यक्ति को पहले जैसी व्यापक वैधानिक परिभाषा में नहीं रखा गया है, जबकि किन्नर, हिजड़ा, अरावानी, जोगता, यूनक और इंटरसेक्स से संबंधित कुछ श्रेणियों को परिभाषा में स्थान दिया गया है। इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि सिर्फ हार्मोनल थेरेपी या लिंग परिवर्तन सर्जरी करा लेना अपने आप 2026 के कानून के तहत ट्रांसजेंडर की कानूनी पहचान की गारंटी नहीं देता। यानी चिकित्सा प्रक्रिया और कानूनी पहचान को अब अलग-अलग समझना होगा।

अस्पतालों की भूमिका भी बदली

नए कानून ने मेडिकल संस्थानों की जिम्मेदारी भी बढ़ाई है। लिंग परिवर्तन सर्जरी करने वाले संस्थान को निर्धारित प्राधिकरणों को इसकी जानकारी देनी होगी। सर्जरी के बाद व्यक्ति को संशोधित पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया से भी गुजरना होगा। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे व्यक्ति की निजी मेडिकल प्रक्रिया, सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी पहचान के बीच संबंध पहले से अधिक मजबूत हो जाता है। यही व्यवस्था निजता और मेडिकल गोपनीयता को लेकर भी सवाल खड़े कर रही है। आलोचकों का कहना है कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान को मेडिकल जांच और सरकारी प्रमाणन से जोड़ना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता और गरिमा को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि स्पष्ट सत्यापन व्यवस्था से कानून के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक पात्र लोगों तक कल्याणकारी लाभ पहुंचाने में मदद मिलेगी।

सरकार के लिए पहचान का सत्यापन क्यों जरूरी

सरकार की ओर से संशोधन का प्रमुख तर्क यह रहा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं और कानूनी संरक्षण का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक पहुंचे और व्यवस्था का दुरुपयोग न हो। इसीलिए 2026 में पहचान को अधिक स्पष्ट और सत्यापन-आधारित बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन यही व्यवस्था आलोचना का केंद्र भी है। सवाल यह है कि किसी व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित करने के लिए मेडिकल बोर्ड की जरूरत कितनी है और क्या इससे पहचान की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से कठिन हो सकती है? यही सवाल अब अदालत के सामने भी है।

NALSA फैसले से निकली संवैधानिक बहस

2026 के संशोधन को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट का 2014 का नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA)  बनाम भारत संघ फैसला महत्वपूर्ण है। उस फैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की लैंगिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को मान्यता दी थी। अब 2026 के संशोधन में स्वयं पहचानी गई लैंगिक पहचान का स्पष्ट अधिकार हटाए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि नई व्यवस्था उस न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में स्वयं पहचान हटाने और अनिवार्य मेडिकल प्रमाणन को व्यक्ति की स्वायत्तता, गरिमा और निजता  से जुड़े अधिकारों के खिलाफ बताया गया है। मामला अभी लंबित है।

पुराने पहचान-पत्रों पर आज केंद्र ने स्थिति साफ की

विवाद में 17 अगस्त 2026 का घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि 2026 के संशोधन से पहले जारी किए गए ट्रांसजेंडर पहचान-पत्र प्रभावित नहीं होंगे और वे वैध बने रहेंगे। अदालत में यह सवाल उठा था कि यदि संशोधन भविष्य के लिए लागू है तो पहले जारी पहचान-पत्रों को किस आधार पर अमान्य माना जा सकता है। इस स्पष्टीकरण से उन लोगों के लिए तत्काल स्थिति साफ हुई है जिनके पास 2026 के संशोधन से पहले जारी पहचान-पत्र हैं। हालांकि, नए आवेदकों के लिए संशोधित कानून की प्रमाणन व्यवस्था लागू रहेगी।

असली सवाल: पहचान की सत्ता किसके पास?

2026 के कानून को केवल सेक्स चेंज या ट्रांसजेंडर सर्जरी के नजरिए से देखना इसके सबसे महत्वपूर्ण बदलाव को छोटा कर देगा। असल बदलाव कानूनी पहचान के आधार में हुआ है। पहले व्यवस्था का केंद्र था कि व्यक्ति अपनी लैंगिक पहचान स्वयं बताए। अब व्यवस्था का केंद्र है कि व्यक्ति कानून में निर्धारित श्रेणी में आए, मेडिकल बोर्ड उसकी सिफारिश करे और जिला मजिस्ट्रेट उसे प्रमाणित करे। यही कारण है कि इस कानून की सबसे बड़ी बहस सेक्स चेंज पर रोक को लेकर नहीं, बल्कि व्यक्ति और राज्य के बीच पहचान तय करने के अधिकार को लेकर है। सर्जरी पर सीधा प्रतिबंध नहीं है। लेकिन कानूनी पहचान के लिए मेडिकल और प्रशासनिक सत्यापन अनिवार्य होने से राज्य की भूमिका निश्चित रूप से बढ़ी है। अब इस व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है। यानी 2026 के ट्रांसजेंडर कानून की असली कहानी यह नहीं कि सेक्स चेंज पर रोक लग गई है, बल्कि यह है कि कानूनी पहचान अब पहले की तुलना में कहीं अधिक राज्य-प्रमाणित प्रक्रिया बन गई है।

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