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डीएम को स्कूल में शिक्षक मिले न बच्चे

  • चार शिक्षकों की तैनाती, 106 बच्चों का नामांकन; औचक निरीक्षण में एक शिक्षामित्र और महज तीन छात्र मिले, बेसिक शिक्षा विभाग की निगरानी पर सवाल

भारत 19
कानपुर। सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं, बच्चे हैं, पूरा प्रशासनिक तंत्र है और उनकी उपस्थिति पर नजर रखने की जिम्मेदारी भी तय है। इसके बावजूद सदर तहसील क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा में सोमवार को जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह पहुंचे तो न चार शिक्षक मिले, न 106 में से 103 बच्चे। मौके पर केवल एक शिक्षामित्र और तीन विद्यार्थी मौजूद थे। यह तस्वीर महज एक स्कूल की अव्यवस्था नहीं, बल्कि बेसिक शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सीधा सवाल है।

विद्यालय में पांच शिक्षक तैनात हैं। इनमें प्रभारी प्रधानाध्यापक रंजना गुप्ता और शिक्षिका क्षमा श्रीवास्तव आकस्मिक अवकाश पर थीं। साफिया खातून अंसारी बीआरसी में प्रशिक्षण में गई थीं, जबकि सबीहा हसन जैदी चिकित्सकीय अवकाश पर थीं। इस तरह चार शिक्षक अलग-अलग कारणों से विद्यालय में नहीं थे और पठन-पाठन की जिम्मेदारी मौके पर मौजूद शिक्षामित्र महेश प्रसाद के भरोसे थी। चारों शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण अलग-अलग और विभागीय नियमों के तहत हो सकते हैं। लेकिन असली सवाल अनुपस्थित शिक्षकों से आगे का है जब एक ही दिन विद्यालय में शिक्षक उपलब्ध नहीं थे तो बच्चों की पढ़ाई की वैकल्पिक व्यवस्था किसने की और इसकी निगरानी किस स्तर पर हुई?

नामांकन 106, स्कूल में सिर्फ तीन बच्चे

106 बच्चों के नामांकन वाले स्कूल में निरीक्षण के समय केवल तीन विद्यार्थी मौजूद थे। यानी नामांकन रजिस्टर में दर्ज बच्चों का स्कूल में वास्तविक पहुंच से इतना बड़ा अंतर था कि लगभग पूरा स्कूल खाली था। यहां सवाल सिर्फ उन 103 बच्चों की गैरहाजिरी का नहीं है। सवाल यह है कि इतनी कम छात्र उपस्थिति विभागीय निगरानी में पहले क्यों नहीं आई। यदि बच्चों की उपस्थिति लगातार कम थी तो स्कूल स्तर पर अभिभावकों से संपर्क, प्रधानाध्यापक की निगरानी और ब्लॉक स्तर की मॉनिटरिंग किस स्थिति में थी? और यदि यह सिर्फ उस दिन की स्थिति थी तो इसकी वजह क्या थी?

एक ही स्कूल में दो बड़े सवाल

लोधवा खेड़ा में सामने आए आंकड़े एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पांच में चार शिक्षक अनुपस्थित और 106 में 103 बच्चे गैरहाजिर। शिक्षक नहीं होंगे तो बच्चों की उपस्थिति प्रभावित हो सकती है, लेकिन बच्चों की इतनी कम उपस्थिति के बावजूद विभागीय निगरानी सक्रिय क्यों नहीं हुई, यह भी उतना ही बड़ा सवाल है। यही वजह है कि डीएम ने मामले को केवल शिक्षकों की उपस्थिति तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी का वेतन रोकने और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से स्पष्टीकरण तलब करने के निर्देश दिए।

अवकाश और प्रशिक्षण के बावजूद व्यवस्था क्यों नहीं?

प्रभारी प्रधानाध्यापक और एक शिक्षिका का आकस्मिक अवकाश, एक शिक्षिका का प्रशिक्षण और दूसरी का चिकित्सकीय अवकाश. इनमें से किसी स्थिति को अपने आप में अनियमितता नहीं कहा जा सकता। लेकिन विभागीय व्यवस्था की परीक्षा ऐसे ही समय में होती है। यदि एक साथ कई शिक्षक विद्यालय में उपलब्ध नहीं हैं तो क्या कोई वैकल्पिक शिक्षक व्यवस्था थी? क्या खंड शिक्षा अधिकारी को इसकी जानकारी थी? क्या यह देखा गया कि स्कूल में मौजूद शिक्षक संख्या बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त है? औचक निरीक्षण के बाद अब ये सवाल विभाग के सामने हैं। डीएम ने भी इसी बिंदु पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि शिक्षकों के अवकाश और प्रशिक्षण के बावजूद विद्यालय में पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करना खंड शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी थी।

कार्रवाई अधिकारी पर, सवाल पूरे तंत्र पर

डीएम ने खंड शिक्षा अधिकारी का वेतन रोकने और बीएसए से स्पष्टीकरण मांगने के निर्देश दिए हैं। यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि प्रशासन ने स्कूल की स्थिति को सिर्फ स्थानीय स्तर की चूक नहीं माना।दरअसल, एक स्कूल में शिक्षक और बच्चे दोनों की बेहद कम मौजूदगी का पता अगर जिला प्रशासन के औचक मुआयने में चलता है, तो इससे नियमित निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्कूलों की निगरानी के लिए बना तंत्र आखिर किसकी और कितनी नियमित निगरानी कर रहा है?

मध्याह्न भोजन के तहत निर्धारित मेन्यू के अनुसार रोटी और सब्जी तैयार होती मिली, लेकिन निरीक्षण की सबसे अहम तस्वीर भोजन की नहीं, खाली कक्षाओं की रही। अब विभाग के सामने सिर्फ यह बताने की चुनौती नहीं है कि चार शिक्षक कहां थे। उसे यह भी बताना होगा कि 106 बच्चों के स्कूल में 103 बच्चे क्यों नहीं पहुंचे और इतनी कम उपस्थिति के बावजूद विभागीय निगरानी तंत्र को इसकी खबर क्यों नहीं हुई। लोधवा खेड़ा की तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां शिक्षक भी सरकारी रिकॉर्ड में हैं, बच्चे भी सरकारी रिकॉर्ड में हैं और निगरानी का तंत्र भी मौजूद है—लेकिन डीएम पहुंचे तो स्कूल में इनमें से किसी की मौजूदगी व्यवस्था के दावे के अनुरूप नहीं मिली।

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