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जंतर-मंतर की भीड़ ने आरक्षण से बड़ा सवाल उठाया

  • ‘आरक्षण हटाओ’ के नारों के बीच रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और घटते अवसरों की बेचैनी भी आई सामने

भारत 19
नई दिल्ली।
जंतर-मंतर पर आरक्षण के विरोध में जुटी भीड़ ने एक पुरानी बहस को फिर जिंदा जरूर किया है, लेकिन इस बार कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि कुछ लोग जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की मांग कर रहे हैं। भीड़ के नारों के पीछे एक दूसरा सवाल भी उभर रहा है, जब नौकरियां और अवसर सीमित हों तो बढ़ती प्रतिस्पर्धा का गुस्सा आखिर किस पर निकलेगा?

शुक्रवार को जंतर-मंतर पर जुटे प्रदर्शनकारियों के बीच ‘आरक्षण हटाओ’ का नारा गूंज रहा था। किसी ने जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग की, तो किसी ने क्रीमी लेयर और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा का मुद्दा उठाया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए समानता संबंधी नियमों का विरोध भी इसी मंच पर दिखाई दिया। यानी नारा एक था, लेकिन उसके पीछे असंतोष की कई परतें थीं। यही वजह है कि इस प्रदर्शन को केवल आरक्षण विरोधी आंदोलन कह देना तस्वीर का एक हिस्सा भर होगा। बड़ा सवाल यह है कि क्या आरक्षण इस असंतोष का कारण है या फिर सीमित अवसरों के लिए बढ़ती लड़ाई ने आरक्षण को सबसे आसान राजनीतिक निशाना बना दिया है?

नारा आरक्षण का, बेचैनी अवसरों की भी

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की दुनिया पिछले कुछ वर्षों में और कठिन हुई है। परीक्षाओं में देरी, भर्ती प्रक्रियाओं पर सवाल, सीमित सरकारी नौकरियां और लाखों उम्मीदवारों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने युवा असंतोष को लगातार बढ़ाया है। ऐसे माहौल में अलग-अलग श्रेणियों की कटऑफ और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल तेजी से उठते हैं। आरक्षण विरोधी आंदोलन इसी असंतोष को ‘मेरिट’ और ‘समान अवसर’ की भाषा में सामने ला रहा है। लेकिन यहीं बहस का दूसरा पक्ष शुरू होता है। आरक्षण समर्थकों का तर्क है कि केवल अंतिम परीक्षा और उसके अंक को समान अवसर का पैमाना नहीं माना जा सकता। अलग सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को एक ही शुरुआती रेखा पर खड़ा मान लेना भी वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। इसलिए जंतर-मंतर पर उठी आवाज का असली टकराव सिर्फ आरक्षण बनाम मेरिट नहीं है। इसके पीछे यह संघर्ष भी है कि सीमित अवसरों की दुनिया में न्याय और समानता को किस तरह परिभाषित किया जाए।

एक आंदोलन, कई मांगें

जंतर-मंतर के प्रदर्शन की दूसरी बड़ी विशेषता यह रही कि इसकी मांगें पूरी तरह एकरूप नहीं थीं। कुछ लोग पूरी आरक्षण व्यवस्था समाप्त करने की बात कर रहे थे। कुछ जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा चाहते थे। आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग भी सामने आई। यूजीसी के समानता और भेदभाव से जुड़े नियमों का विरोध भी आंदोलन से जुड़ गया। यहीं आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती छिपी है। भीड़ जुटाना और स्पष्ट राजनीतिक मांग तैयार करना दो अलग बातें हैं। जब तक आंदोलन यह साफ नहीं करता कि वह आरक्षण समाप्त करना चाहता है, उसकी समीक्षा चाहता है या व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहा है, तब तक उसके लिए लंबे समय तक एक समान राजनीतिक दबाव बनाए रखना आसान नहीं होगा।

सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंची नाराजगी

इस आंदोलन ने एक और बदलाव की तरफ संकेत किया है। सोशल मीडिया अब केवल राजनीतिक दलों के प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। किसी मुद्दे पर बनी डिजिटल नाराजगी बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के समर्थन के भी लोगों को सड़क तक ला सकती है। ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की ऑनलाइन अपील ने अलग-अलग राज्यों के लोगों को दिल्ली तक पहुंचाया। इससे साफ है कि राजनीतिक लामबंदी का पुराना मॉडल बदल रहा है। पहले संगठन लोगों को जोड़ते थे और फिर मुद्दा फैलता था। अब कई मामलों में मुद्दा पहले डिजिटल दुनिया में आकार लेता है और उसके बाद संगठन और नेतृत्व तैयार होते हैं। लेकिन यही मॉडल आंदोलन की कमजोरी भी बन सकता है। सोशल मीडिया भीड़ तो पैदा कर सकता है, मगर उसे लंबे अभियान में बदलने के लिए स्पष्ट नेतृत्व, साझा एजेंडा और संगठनात्मक ढांचा चाहिए।

राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं यह सवाल

आरक्षण भारत में केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक समीकरणों का भी विषय है। यही कारण है कि कोई बड़ा राजनीतिक दल ‘आरक्षण हटाओ’ जैसे नारे को सीधे अपनाने में सावधानी बरतेगा। लेकिन जंतर-मंतर का प्रदर्शन राजनीतिक दलों को पूरी तरह चुप रहने की सुविधा भी नहीं देता। एक तरफ सामाजिक न्याय की राजनीति है, दूसरी तरफ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच उन युवाओं की नाराजगी है जो खुद को अवसरों की दौड़ में पीछे महसूस कर रहे हैं। राजनीतिक चुनौती इन दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। यही कारण है कि आने वाले दिनों में बहस केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रह सकती कि आरक्षण रहे या हटे। उससे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या देश में अवसरों का दायरा इतना बढ़ रहा है कि आरक्षण को लेकर पैदा होने वाला प्रतिस्पर्धात्मक तनाव कम हो सके?

आर्थिक आधार का सवाल भी इतना सरल नहीं

प्रदर्शनकारियों की एक प्रमुख मांग जाति के बजाय आर्थिक आधार को महत्व देने की रही। लेकिन यहां भी मामला केवल नारा देने भर का नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसलिए वास्तविक बहस आर्थिक आधार को जोड़ने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि क्या आर्थिक कमजोरी सामाजिक और ऐतिहासिक पिछड़ेपन का विकल्प हो सकती है। यही वह सवाल है जहां आरक्षण की पूरी बहस सबसे जटिल हो जाती है। एक व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर हो सकता है, लेकिन आरक्षण समर्थक तर्क के अनुसार सामाजिक भेदभाव और प्रतिनिधित्व का सवाल उससे अलग है। दूसरी ओर आरक्षण विरोधी पक्ष का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को केवल उसकी जाति के आधार पर अवसरों से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। दोनों तर्कों के बीच राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं है।

जंतर-मंतर ने बहस का केंद्र बदल दिया

इस प्रदर्शन की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि उसने आरक्षण की बहस को फिर कटऑफ और जाति के सीमित दायरे से बाहर निकालकर अवसरों की कमी के बड़े सवाल से जोड़ दिया है। यदि सरकारी नौकरियां सीमित हों, प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों युवा कुछ हजार पदों के लिए संघर्ष कर रहे हों और निजी क्षेत्र स्थिर विकल्प न दे पा रहा हो, तो प्रतिस्पर्धा का दबाव किसी न किसी नीति पर राजनीतिक गुस्से के रूप में सामने आएगा। आज वह गुस्सा आरक्षण के खिलाफ दिखाई दे रहा है। कल यही असंतोष भर्ती व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली, बेरोजगारी या किसी दूसरे मुद्दे के खिलाफ भी खड़ा हो सकता है। इसलिए जंतर-मंतर की भीड़ को सिर्फ एक दिन के आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के रूप में पढ़ना जल्दबाजी होगी।

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