- 16 देशों की 666 टीमें मैदान में; खेलों के साथ वास्तविक परिस्थितियों में भी परखी जाएगी ह्यूमनॉइड रोबोटों की क्षमता
भारत 19
बीजिंग में शनिवार से भविष्य की दुनिया का एक अनोखा मुकाबला शुरू हो गया। नेशनल स्पीड स्केटिंग ओवल, जिसे ‘आइस रिबन’ के नाम से जाना जाता है, में 2,056 ह्यूमनॉइड रोबोट मैदान में उतर चुके हैं। 22 से 26 अगस्त तक चलने वाले दूसरे विश्व ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स में 16 देशों की 666 टीमें हिस्सा ले रही हैं। रोबोट दौड़ेंगे, खेलेंगे और अलग-अलग चुनौतियों से गुजरेंगे, लेकिन इस आयोजन का मकसद केवल यह दिखाना नहीं है कि मशीनें इंसानों की तरह कितनी तेजी से दौड़ सकती हैं। असली परीक्षा यह है कि इंसान जैसी बनावट वाले ये रोबोट बदलती परिस्थितियों को समझकर वास्तविक दुनिया के कामों में कितने उपयोगी साबित हो सकते हैं।
एक साल में चार गुना बढ़ा रोबोटों का मैदान
पिछले वर्ष बीजिंग में हुए पहले विश्व ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स के मुकाबले इस बार आयोजन का पैमाना कई गुना बड़ा हो गया है। पहले संस्करण में 500 से अधिक रोबोट और करीब 280 टीमें शामिल हुई थीं। एक साल बाद रोबोटों की संख्या बढ़कर 2,056 और टीमों की संख्या 666 हो गई है। यह सिर्फ प्रतिभागियों की बढ़ती संख्या नहीं है। इसके पीछे ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स में तेज होती वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी दिखाई देती है। चीन, अमेरिका, जापान, जर्मनी सहित कई देशों की टीमें इस मंच पर अपनी तकनीक की क्षमता दिखा रही हैं।
दौड़ से आगे, अब कामकाज की परीक्षा
प्रतियोगिता में खेल आधारित स्पर्धाएं तो हैं हीं, लेकिन कई मुकाबले ऐसे भी हैं जिनमें रोबोटों की व्यावहारिक क्षमता परखी जाएगी। दौड़ और दूसरे खेल उनके संतुलन, गति और शरीर के समन्वय की परीक्षा लेंगे। वहीं दूसरी चुनौतियां यह जांचेंगी कि रोबोट वस्तुओं को कितनी सटीकता से संभाल सकते हैं, बदलते माहौल में अपनी गतिविधि को कैसे नियंत्रित करते हैं और निर्देशों के आधार पर जटिल काम कितनी कुशलता से पूरा कर सकते हैं। यहीं से यह आयोजन सामान्य तकनीकी प्रदर्शनी से अलग हो जाता है। मंच पर नाचता या दौड़ता रोबोट आकर्षक हो सकता है, लेकिन किसी कारखाने, अस्पताल, गोदाम या घर में उपयोगी बनने के लिए उसे सिर्फ चलना नहीं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को समझना भी होगा।
शरीर तेज हुआ, ‘दिमाग’ की परीक्षा बाकी
ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स ने पिछले कुछ वर्षों में संतुलन और गति के मामले में बड़ी प्रगति की है। रोबोट अब दौड़ सकते हैं, खेल सकते हैं और इंसानों जैसी कई गतिविधियां कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक चुनौती अभी भी कहीं ज्यादा कठिन है। असली दुनिया पहले से तय नियमों वाला खेल का मैदान नहीं है। वहां रास्ते बदलते हैं, वस्तुएं अलग होती हैं और हर स्थिति का पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में रोबोट को देखना, समझना, फैसला लेना और तुरंत अपनी गतिविधि बदलना होगा। बीजिंग के ये मुकाबले इसी अंतर को भी सामने लाएंगे, रोबोट कितना अच्छा प्रदर्शन करता है और बिना तय परिस्थितियों के वह कितना उपयोगी साबित हो सकता है।
रोबोट की हार भी बताएगी अगली मंजिल
इन खेलों में हर रोबोट का गिरना या किसी चुनौती में असफल होना केवल हार नहीं माना जाएगा। तकनीकी कंपनियों और शोधकर्ताओं के लिए यही क्षण सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। कहां संतुलन बिगड़ा, किस स्थिति में रोबोट वस्तु को पहचान नहीं सका या किस आदेश को सही ढंग से पूरा नहीं कर पाया—यही कमियां अगली पीढ़ी की मशीनों को बेहतर बनाने का आधार बनेंगी। इस लिहाज से बीजिंग का यह आयोजन केवल विजेताओं की सूची तैयार नहीं करेगा। यह यह भी बताएगा कि ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स अभी कहां तक पहुंची है और उसकी सबसे बड़ी कमजोरियां क्या हैं।
पिछले साल का शो, इस बार असली चुनौती
पहले विश्व ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स ने दुनिया को रोबोटिक्स की संभावनाओं की झलक दिखाई थी। इस बार संख्या बढ़ी है, मुकाबले व्यापक हुए हैं और तकनीक के सामने अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं। पिछले साल सवाल था कि क्या ह्यूमनॉइड रोबोट इंसानों जैसी गतिविधियां कर सकते हैं? इस बार सवाल उससे आगे बढ़ चुका है, क्या वे केवल इंसानों जैसे दिख और चल सकते हैं या इंसानों की दुनिया में उपयोगी काम भी कर सकते हैं?


