- 66 दिन बाद 2.52 लाख रुपये प्रति किलो पहुंची चांदी, दो दिन में 16,500 रुपये की छलांग; सोना भी 1.64 लाख पर
भारत 19
कानपुर। अमेरिका में डॉलर की कमजोरी ने दुनिया भर के सराफा बाजारों में खरीदारी का नया दौर छेड़ दिया है और उसकी चमक कानपुर तक पहुंच गई है। शुक्रवार को चांदी ने 66 दिन बाद फिर ढाई लाख रुपये प्रति किलो की दहलीज पार कर ली। स्थानीय बाजार में इसके भाव 2,52,000 रुपये प्रति किलो पहुंच गए। दो दिन पहले तक सुस्त पड़ी चांदी गुरुवार और शुक्रवार को मिलाकर 16,500 रुपये प्रति किलो महंगी हो गई।
सोना भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहा। लगातार दूसरे दिन तेजी के बाद इसके भाव 1,64,000 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गए। दो दिन में सोना 6,500 रुपये प्रति 10 ग्राम महंगा हुआ है। 16 जून को चांदी 2,56,000 रुपये प्रति किलो पर थी। इसके बाद यह ढाई लाख रुपये के स्तर से नीचे उतर गई और जुलाई से लेकर अगस्त के अधिकांश हिस्से तक उसी दायरे में रही। शुक्रवार की तेजी ने करीब ढाई महीने बाद इसे फिर उस स्तर पर पहुंचा दिया, जिसे सराफा बाजार खास नजर से देख रहा था।
अमेरिका में कमजोरी, यहां बढ़े भाव
मौजूदा तेजी की डोर सीधे अमेरिकी डॉलर से जुड़ी हुई है। डॉलर कमजोर पड़ने पर सोना और चांदी दूसरे देशों के निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमत डॉलर में तय होती है। नतीजा, खरीदारी बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाने लगती हैं। शुक्रवार को वैश्विक बाजार में यही तस्वीर दिखाई दी। डॉलर पर दबाव बढ़ा तो निवेशकों ने कीमती धातुओं की ओर रुख किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,600 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गया, जबकि चांदी भी 69 डॉलर प्रति औंस के करीब कारोबार करती दिखी। यानी कानपुर में चांदी की अचानक आई यह तेजी केवल स्थानीय मांग का नतीजा नहीं है। इसकी शुरुआत वैश्विक बाजार से हुई और अंतरराष्ट्रीय भाव बढ़ने के साथ उसका असर भारतीय सराफा बाजार तक पहुंच गया।
डॉलर की कमजोरी के पीछे क्या है
अमेरिकी अर्थव्यवस्था, सरकारी कर्ज और बॉन्ड बाजार को लेकर बढ़ती चिंताओं ने डॉलर पर दबाव बनाया है। निवेशक अमेरिकी वित्तीय बाजारों की दिशा को लेकर सतर्क हैं और इसी माहौल में सोना फिर सुरक्षित निवेश के रूप में उभरा है। चांदी को भी इसका सीधा फायदा मिला, लेकिन उसकी तेजी की प्रकृति कुछ अलग है। सोना मुख्य रूप से निवेश और सुरक्षित संपत्ति के रूप में खरीदा जाता है, जबकि चांदी निवेश के साथ उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है। इसलिए जब वित्तीय बाजार में खरीदारी बढ़ती है तो चांदी को निवेशकों का सहारा मिलता है, और औद्योगिक मांग की उम्मीदें उसकी तेजी को और गति दे सकती हैं।
भारत में क्यों ज्यादा महसूस होती है तेजी
भारत सोने और चांदी की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। इसके ऊपर रुपये और डॉलर की विनिमय दर, आयात लागत और स्थानीय मांग अपना असर जोड़ देती है। इसका मतलब साफ है—लंदन या न्यूयॉर्क के बाजार में सोना-चांदी महंगी होती है तो उसका असर कुछ समय बाद कानपुर के सराफा बाजार में भी दिखाई देता है। यही वजह है कि वैश्विक तेजी के इस दौर में स्थानीय भाव इतनी तेजी से ऊपर गए हैं।
निवेशकों को फायदा, खरीदारों पर दबाव
तेजी ने उन लोगों को फायदा पहुंचाया है जिन्होंने पहले सोना या चांदी में निवेश किया था। पुराने स्टॉक की कीमत बढ़ने से सराफा कारोबारियों को भी लाभ हो सकता है। चांदी में तेजी खास तौर पर उन निवेशकों के लिए उत्साहजनक है, जो पिछले कुछ समय से इसके ढाई लाख रुपये के स्तर पर लौटने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन ऊंचे भाव का दूसरा पहलू भी है। सोना महंगा होने पर आभूषणों की खरीद प्रभावित हो सकती है। ग्राहक बजट के हिसाब से कम वजन के गहने चुन सकते हैं या खरीदारी टाल सकते हैं। चांदी महंगी होने का असर उन उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है, जहां इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में होता है।
अब बाजार की नजर अमेरिका पर
आगे की दिशा काफी हद तक डॉलर की चाल पर निर्भर करेगी। यदि अमेरिकी मुद्रा पर दबाव बना रहा और निवेशक आर्थिक अनिश्चितता के बीच सुरक्षित विकल्प तलाशते रहे तो सोना और चांदी को समर्थन मिलता रह सकता है। दूसरी ओर डॉलर में मजबूती लौटने या तेज मुनाफावसूली की स्थिति में कीमती धातुओं में उतार-चढ़ाव भी बढ़ सकता है।


