- ट्रंप की आर्थिक चेतावनी ने बढ़ाई तीसरे देशों की चिंता, भारत के व्यापार, चाबहार और तेल बाजार पर पड़ सकती है नजर
भारत 19
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान की टकराहट अब सिर्फ वॉशिंगटन और तेहरान के बीच की लड़ाई नहीं रह गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी ने इस संघर्ष का दायरा उन देशों और कंपनियों तक बढ़ाने का संकेत दिया है, जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखे हुए हैं। संदेश साफ है, अमेरिका अगर आर्थिक दबाव का अगला चक्र शुरू करता है तो निशाना केवल ईरानी संस्थाएं नहीं, बल्कि उनके साथ व्यापार की श्रृंखला में जुड़े दूसरे पक्ष भी हो सकते हैं। यही वह बिंदु है जिसने इस घटनाक्रम को भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है। ईरान के साथ भारत का व्यापार भले पहले के मुकाबले कम हुआ हो, लेकिन रिश्ता सिर्फ आयात-निर्यात के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। चाबहार बंदरगाह से लेकर मध्य एशिया तक भारत की रणनीतिक पहुंच और पश्चिम एशिया में ऊर्जा सुरक्षा—ट्रंप की नई आर्थिक चेतावनी इन सभी समीकरणों के बीच आ खड़ी हुई है।
असली निशाना ईरान का आर्थिक घेरा
ईरान वर्षों से अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक और वित्तीय रास्ते तलाशता रहा है। तेल की बिक्री, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान, बिचौलिया कंपनियां और तीसरे देशों के जरिये होने वाला कारोबार इस व्यवस्था के हिस्से रहे हैं। अमेरिका की नई चेतावनी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि उसका फोकस सिर्फ तेहरान पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं दिखता। यदि वॉशिंगटन ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों, कंपनियों, जहाजरानी नेटवर्क या वित्तीय संस्थाओं पर दबाव बढ़ाता है तो प्रतिबंधों का असर सीमा पार फैल सकता है। यानी यह केवल ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की रणनीति नहीं होगी, बल्कि उसके आसपास बने कारोबारी घेरे को तोड़ने की कोशिश भी होगी। चीन, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, ऐसे किसी भी दबाव के केंद्र में रहेगा। लेकिन इसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान के साथ व्यापारिक या रणनीतिक रिश्ते रखने वाले कई देशों को अपने आर्थिक हितों और अमेरिकी जोखिम के बीच नया संतुलन बनाना पड़ सकता है।
भारत का व्यापार छोटा, हित बड़े
भारत और ईरान के बीच कारोबार अब उस स्तर पर नहीं है, जहां वह कभी हुआ करता था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने ईरानी तेल खरीदना बंद कर दिया और द्विपक्षीय व्यापार भी सीमित होता गया। फिर भी भारत के लिए ईरान का महत्व खत्म नहीं हुआ है। बासमती चावल, चाय और दवा जैसे भारतीय उत्पादों के लिए ईरान अब भी एक बाजार है। इससे भी बड़ा मुद्दा चाबहार है, जिसे भारत सिर्फ एक बंदरगाह परियोजना के रूप में नहीं देखता। वह भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, उसके जरिये वह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाता है। यदि अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई का दायरा ईरान से जुड़े विदेशी निवेश, वित्तीय लेन-देन या बंदरगाह गतिविधियों तक बढ़ता है तो भारत के सामने एक संवेदनशील कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। फिलहाल चाबहार को लेकर किसी नई अमेरिकी कार्रवाई का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है। लेकिन ट्रंप की चेतावनी के बाद परियोजना निश्चित रूप से उन भारतीय हितों में शामिल हो गई है, जिन पर वॉशिंगटन के अगले कदम को ध्यान से देखना होगा।
तेल का झटका भारत को ज्यादा महसूस हो सकता है
भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता ईरान के साथ सीधे व्यापार से भी आगे जाती है। असली आर्थिक झटका पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति की अनिश्चितता से आ सकता है। ईरान के आसपास तनाव बढ़ने पर दुनिया की नजर तुरंत होर्मुज जलडमरूमध्य पर जाती है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। इस इलाके में किसी भी तरह की लंबी अस्थिरता तेल की कीमतों को ऊपर धकेल सकती है। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित असर नहीं है। इससे आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर भी दबाव बन सकता है। बाजार पहले से ही होर्मुज क्षेत्र में लंबे संकट की आशंका को तेल कीमतों में शामिल करने लगा है।
वॉशिंगटन का दबाव, नई मुश्किलों की आशंका
इस पूरे मामले में अभी सबसे बड़ी अनिश्चितता यही है कि अमेरिकी चेतावनी आखिर किस रूप में जमीन पर उतरेगी। अगर कार्रवाई मुख्य रूप से ईरानी तेल और प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क तक सीमित रहती है तो असर एक दायरे में रहेगा। लेकिन यदि अमेरिका उन विदेशी कंपनियों और संस्थाओं को भी निशाना बनाता है जो ईरान के साथ सामान्य व्यापार या रणनीतिक परियोजनाओं से जुड़ी हैं, तो इसका असर कहीं व्यापक हो सकता है। प्रतिबंधों की असली ताकत अक्सर सीधे माल पर रोक लगाने में नहीं, बल्कि बैंकिंग, बीमा और जहाजरानी व्यवस्था को जोखिम में डालने में होती है। किसी कंपनी के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से कटने का खतरा पैदा होते ही ईरान से कारोबार करना अपने आप मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ट्रंप की चेतावनी ने केवल ईरान ही नहीं, उसके कारोबारी साझेदारों की चिंता भी बढ़ा दी है।
भारत के सामने फिर वही संतुलन
नई दिल्ली के लिए यह मामला कोई आसान आर्थिक गणित नहीं है। एक तरफ अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। दूसरी तरफ ईरान भारत की पश्चिम और मध्य एशिया नीति का अहम हिस्सा बना हुआ है। भारत को अब देखना होगा कि अमेरिका की अगली कार्रवाई कितनी दूर तक जाती है। यदि आर्थिक दबाव केवल ईरान तक सीमित रहता है तो भारतीय हितों को संभालना अपेक्षाकृत आसान होगा। लेकिन यदि निशाना उन देशों और संस्थाओं तक पहुंचता है जो ईरान के साथ कारोबार करते हैं, तो भारत को फिर वही मुश्किल संतुलन साधना पड़ सकता है—अमेरिका से रिश्ते भी बचाने हैं और ईरान में अपने रणनीतिक दरवाजे भी खुले रखने हैं।


