- खाद्य प्रसंस्करण को नई साझेदारी का आधार बनाने की तैयारी, निवेश के साथ तकनीक और वैश्विक गुणवत्ता मानकों पर जोर
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश अब अपनी कृषि ताकत को सिर्फ ज्यादा उत्पादन के आंकड़ों से नहीं मापना चाहता। सरकार की नजर उस अगले पड़ाव पर है, जहां खेत से निकलने वाला कच्चा माल प्रदेश में ही प्रसंस्कृत हो, उसकी कीमत बढ़े और वह तैयार उत्पाद के रूप में दुनिया के बाजार तक पहुंचे। इस रास्ते में उत्तर प्रदेश को जापान की आधुनिक तकनीक, गुणवत्ता प्रबंधन और खाद्य प्रसंस्करण विशेषज्ञता से बड़ी उम्मीद है।
लखनऊ में भारत-जापान व्यापार नेटवर्किंग के मंच से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जापानी निवेशकों को उत्तर प्रदेश में आने का निमंत्रण दिया। लेकिन इस अपील के पीछे सिर्फ नई फैक्ट्रियां लगाने की मंशा नहीं दिखी। सरकार की कोशिश कृषि उत्पादन, आधुनिक प्रसंस्करण और अंतरराष्ट्रीय बाजार के बीच ऐसी श्रृंखला तैयार करने की है, जिसमें खेत और बाजार के बीच पैदा होने वाली अतिरिक्त कीमत का बड़ा हिस्सा प्रदेश की अर्थव्यवस्था में ही रहे।

उत्पादन बहुत है, अब उत्पाद की कीमत बढ़ाने की बारी
उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था का पैमाना बड़ा है और यहां फसलों तथा खाद्य उत्पादों की विविधता भी कम नहीं। चुनौती यह है कि इनमें से कितने उत्पाद कच्चे रूप में बिकने के बजाय प्रसंस्करण से गुजरकर अधिक कीमत वाले ब्रांड बन पाते हैं। यहीं सरकार जापान के अनुभव को उत्तर प्रदेश की जरूरत से जोड़ना चाहती है। आधुनिक प्रसंस्करण, बेहतर पैकेजिंग, गुणवत्ता की एकरूपता, भंडारण और उत्पाद की पूरी यात्रा पर नजर रखने वाली तकनीक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जापानी विशेषज्ञता यूपी के कृषि क्षेत्र के लिए उपयोगी हो सकती है। सरकार की सोच यह है कि किसान केवल उपज पैदा करने और उसे मंडी तक पहुंचाने की कड़ी न बना रहे। खाद्य प्रसंस्करण की पूरी श्रृंखला यदि उत्पादन क्षेत्रों के करीब विकसित होती है तो किसानों के साथ स्थानीय युवाओं, महिलाओं और छोटे उद्यमियों के लिए भी नए अवसर तैयार हो सकते हैं।

यूपी को सिर्फ निवेश नहीं, तकनीक का साथ चाहिए
इस साझेदारी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यही है। उत्तर प्रदेश की जरूरत केवल जापानी पूंजी तक सीमित नहीं है। खाद्य उत्पाद को वैश्विक बाजार के लायक बनाने के लिए उत्पादन के बाद की पूरी व्यवस्था उतनी ही अहम है। किसी स्थानीय उत्पाद को विदेशी बाजार तक पहुंचाने के लिए सिर्फ उसकी अच्छी पैदावार काफी नहीं होती। उसे तय गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरना पड़ता है। प्रसंस्करण, पैकिंग, भंडारण और आपूर्ति की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि उत्पाद की गुणवत्ता खेत से बाजार तक बनी रहे। उत्तर प्रदेश अब इसी कमी को तकनीकी साझेदारी से भरने की कोशिश कर रहा है। अगर जापानी कंपनियां यहां निवेश के साथ अपनी विशेषज्ञता भी लेकर आती हैं तो इसका असर केवल कुछ औद्योगिक इकाइयों तक सीमित नहीं रहेगा। स्थानीय कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन और निर्यात की संभावनाओं को भी नया आधार मिल सकता है।
काला नमक चावल सिर्फ एक उदाहरण
कार्यक्रम में काला नमक चावल का उल्लेख इसी बड़े लक्ष्य की एक झलक है। ऐसे उत्पादों की पहचान स्थानीय स्तर पर पहले से है, लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए अलग तरह की तैयारी चाहिए। एक समान गुणवत्ता, आकर्षक पैकेजिंग, भरोसेमंद ब्रांड और उत्पाद की पहचान सुनिश्चित करने वाली आधुनिक व्यवस्था के बिना स्थानीय खासियत वैश्विक पहचान में नहीं बदलती। यूपी के सामने चुनौती ऐसे ही कृषि उत्पादों को अलग-अलग उदाहरणों के बजाय एक संगठित खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात तंत्र से जोड़ने की है। यानी लक्ष्य सिर्फ यह नहीं कि काला नमक चावल या कोई दूसरा विशिष्ट उत्पाद विदेश पहुंच जाए। बड़ी कोशिश यह है कि प्रदेश के कृषि उत्पादों के लिए ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें स्थानीय पहचान को बाजार की ताकत में बदला जा सके।

बुद्ध की विरासत से कारोबार का रास्ता
भारत और जापान के बीच भगवान बुद्ध की साझा विरासत को भी इस आर्थिक संवाद में जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के लिए यह सांस्कृतिक रिश्ता निवेश और व्यापार की बातचीत को भरोसे की एक अतिरिक्त जमीन देता है। सरकार का संकेत है कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक निकटता को अब उद्योग और तकनीक की साझेदारी तक ले जाया जाए। खाद्य प्रसंस्करण इस दिशा में सबसे स्वाभाविक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है, क्योंकि यहां उत्तर प्रदेश के पास कच्चे माल और उत्पादन का आधार है तो जापान के पास आधुनिक तकनीक और गुणवत्ता आधारित औद्योगिक अनुभव।
असली परीक्षा अब शुरू होगी
नेटवर्किंग कार्यक्रम और निवेश के निमंत्रण से आगे असली सवाल अब यह है कि यह बातचीत जमीन पर कितनी उतरती है। क्या जापानी कंपनियां उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्रों में प्रसंस्करण आधारित निवेश करती हैं? क्या आधुनिक तकनीक स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच में वास्तविक बदलाव लाती है? और क्या किसान केवल कच्चा माल बेचने वाले उत्पादक से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन की श्रृंखला का हिस्सा बन पाता है?


