- सीएसए के दिलीपनगर कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित रिसर्च प्रजेंटेशन के दौरान पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. शशिकांत ने साझा कीं भेड़ों की याददाश्त, नस्ल और स्वास्थ्य से जुड़ी रोचक जानकारियां
Bharat 19/ कानपुर। भेड़ को आमतौर पर शांत और साधारण पालतू पशु के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसकी याददाश्त और सीखने की क्षमता वैज्ञानिकों को भी लगातार आकर्षित कर रही है। भेड़ अपने मालिक को दो साल या उससे अधिक समय तक बिना देखे पहचान सकती है। चेहरे की पहचान और पुरानी स्मृतियों को याद रखने की उसकी क्षमता उसे दूसरे पालतू पशुओं से अलग बनाती है। उसके मस्तिष्क में मौजूद तंत्रिका तंत्र का एक हिस्सा चेहरों की पहचान में मदद करता है, जबकि हिप्पोकैंपस नई बातें सीखने, पुरानी यादों को सुरक्षित रखने और रास्ते या दिशा पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के दिलीपनगर कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित रिसर्च प्रजेंटेशन के दौरान पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. शशिकांत ने किसानों को भेड़ों की इन खासियतों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भेड़ें अलग-अलग चेहरों को पहचानने और उन्हें लंबे समय तक याद रखने में सक्षम होती हैं। जिस किसान के साथ वे लंबे समय तक रहती हैं, उसके चेहरे, आवाज और व्यवहार से भी परिचित हो जाती हैं। यही वजह है कि लंबे अंतराल के बाद भी वे अपने परिचित व्यक्ति को पहचान सकती हैं।

भेड़ों में होती सीखने-समझने की क्षमता

डॉ. शशिकांत के अनुसार भेड़ों की याददाश्त से जुड़े अध्ययन यह बताते हैं कि उनके व्यवहार और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझना पशुपालन के लिए भी महत्वपूर्ण है। भेड़ें अपने आसपास के वातावरण से सीखती हैं और परिचित परिस्थितियों तथा व्यक्तियों को याद रख सकती हैं। इससे यह धारणा भी बदलती है कि भेड़ केवल ऊन और मांस प्राप्त करने वाला पालतू पशु है। बीकानेर स्थित केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान में भेड़ों की विभिन्न नस्लों, उनके स्वास्थ्य और व्यवहार से जुड़े शोध में भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। इनमें उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ मस्तिष्क और व्यवहार से जुड़े अध्ययन भी महत्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिक इन अध्ययनों के माध्यम से भेड़ों की बेहतर देखभाल, नस्ल चयन और उत्पादकता बढ़ाने के उपायों को समझने का प्रयास कर रहे हैं।
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अलग-अलग जलवायु के लिए अलग नस्लें
भारत में भेड़ों की कई नस्लें हैं और उनकी विशेषताएं स्थानीय जलवायु तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हैं। ठंडे और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भाखरवाल जैसी नस्लें पाली जाती हैं। वहीं राजस्थान की जैसलमेरी भेड़ अपनी ऊन की विशेषताओं के लिए जानी जाती है। पश्मीना के संदर्भ में चांगथांगी नस्ल की बकरियां विशेष महत्व रखती हैं। इनके महीन रेशों से उच्च गुणवत्ता वाली पश्मीना तैयार की जाती है। रिसर्च प्रजेंटेशन में इस नस्ल की ऊन की बारीकी और उससे तैयार होने वाले उत्पादों की विशेषताओं की भी जानकारी दी गई।
कम संसाधनों में किसानों की बढ़ सकती है आमदनी
रिसर्च प्रजेंटेशन में किसानों को भेड़ पालन के आर्थिक पक्ष की जानकारी देते हुए डॉ. शशिकांत ने बताया कि पशुपालन में भेड़ पालन किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन बनता जा रहा है। इसकी खासियत यह है कि सही नस्ल का चयन, संतुलित चारा, समय पर स्वास्थ्य देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर सीमित जमीन और संसाधनों में भी अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। भेड़ पालन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी अनुकूलन क्षमता है। कई नस्लें गर्म और शुष्क परिस्थितियों में भी आसानी से रह सकती हैं, जबकि कुछ नस्लें ठंडे और पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल होती हैं। यही कारण है कि राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश समेत देश के अलग-अलग राज्यों में किसान अपनी स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार भेड़ पालन को अपना सकते हैं।
नस्ल के साथ चारा और स्वास्थ्य प्रबंधन भी जरूरी
डॉ. शशिकांत ने किसानों को सलाह दी कि केवल भेड़ों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। बेहतर आमदनी के लिए स्थानीय वातावरण के अनुकूल नस्ल का चयन, पर्याप्त पौष्टिक चारा, स्वच्छ पानी, नियमित टीकाकरण और समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण जरूरी है। भेड़ों की उत्पादकता और उनके स्वास्थ्य पर सीधे तौर पर इन सभी कारकों का असर पड़ता है। वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से किसान ऊन, मांस और प्रजनन के माध्यम से अपनी आय बढ़ा सकते हैं। साथ ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नस्ल का चयन करने से बीमारी और रखरखाव पर होने वाला अनावश्यक खर्च भी कम किया जा सकता है। इस तरह भेड़ पालन छोटे और सीमांत किसानों के लिए सीमित संसाधनों में अतिरिक्त आमदनी का प्रभावी माध्यम बन सकता है।


