- ईरान युद्ध और होर्मुज संकट के बीच भारत के तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी रिकॉर्ड स्तर पर, LPG उत्पादन बढ़ाकर घरेलू ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैयारी
Bharat 19/ नई दिल्ली। अमेरिका के लगातार दबाव और रूस से तेल खरीद घटाने की कोशिशों के बावजूद भारत का रूसी कच्चे तेल पर भरोसा कम होने के बजाय बढ़ता दिखाई दे रहा है। मध्य-पूर्व में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़े जोखिम ने भारत की ऊर्जा रणनीति को नया मोड़ दिया है। एक ओर भारत रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीद रहा है, वहीं दूसरी ओर LPG जैसे जरूरी ईंधन की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। अमेरिकी मीडिया में इसकी खासी चर्चा है। Reuters की आज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अपनी रिफाइनरियों के लिए प्रतिदिन 63,810 मीट्रिक टन LPG उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। इसका उद्देश्य मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के बीच घरेलू LPG आपूर्ति सुरक्षित रखना और ईंधन का बफर मजबूत करना है।
रूस से तेल आयात ने बनाया नया रिकॉर्ड
भारत की ऊर्जा रणनीति में रूस की बढ़ती भूमिका आंकड़ों से साफ होती है। जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50.83 प्रतिशत तक पहुंच गई। भारत ने इस महीने रूस से करीब 2.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा। अप्रैल से जुलाई के बीच भारत के कुल तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की औसत हिस्सेदारी 43.25 प्रतिशत रही, जबकि एक साल पहले यह करीब 37 प्रतिशत थी। इसके विपरीत इसी अवधि में मध्य-पूर्व की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से घटकर करीब 30 प्रतिशत रह गई। इन आंकड़ों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से भारत पर रूसी तेल खरीद घटाने का दबाव बना रहा है। इसके बावजूद वैश्विक ऊर्जा बाजार की परिस्थितियां भारत को रूसी आपूर्ति बनाए रखने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
ईरान युद्ध ने बदला भारत का तेल गणित
भारत के लिए रूसी तेल की बढ़ती खरीद केवल मॉस्को से नजदीकी बढ़ने का मामला नहीं है। मध्य-पूर्व के संघर्ष ने तेल की आपूर्ति और परिवहन से जुड़े जोखिम बढ़ा दिए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर संकट की आशंका ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए वैकल्पिक स्रोतों की अहमियत बढ़ा दी है। ऐसे समय में रूस भारत के लिए अपेक्षाकृत स्थिर और बड़े पैमाने पर उपलब्ध स्रोत बना हुआ है। इसलिए अमेरिकी दबाव के बावजूद रूसी तेल खरीद का बढ़ना ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता, दोनों के नजरिये से महत्वपूर्ण है।
ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर भारत का जोर
रूसी तेल की हिस्सेदारी बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि भारत ने दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से दूरी बना ली है। भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में कई स्रोतों को शामिल किया है। लैटिन अमेरिका, खासकर ब्राजील और वेनेजुएला से तेल खरीद में बढ़ोतरी हुई है। UAE भी भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इस तरह भारत एक तरफ रूस से बड़े पैमाने पर तेल ले रहा है, तो दूसरी तरफ मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका से आपूर्ति का संतुलन भी बना रहा है। इसलिए भारत की मौजूदा रणनीति को केवल रूस पर बढ़ती निर्भरता कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसे ऊर्जा स्रोतों के रणनीतिक विविधीकरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति के सामने ऊर्जा बाजार की चुनौती
भारत की बढ़ती रूसी तेल खरीद अमेरिकी रणनीति के लिए चुनौती बनी हुई है। अमेरिका रूस की तेल आय घटाकर मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है। दूसरी ओर भारत जैसे बड़े खरीदार रूसी तेल खरीदते रहते हैं तो प्रतिबंधों का असर सीमित हो सकता है। लेकिन भारत को रूसी तेल से पूरी तरह दूर करने का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है। यदि बड़ी मात्रा में रूसी तेल बाजार से हटता है तो कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी। मध्य-पूर्व में पहले से जारी संघर्ष के बीच यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकती है। यहीं अमेरिकी ऊर्जा नीति की जटिलता सामने आती है। रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के साथ वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखना भी उतना ही जरूरी है।
LPG उत्पादन बढ़ाकर घरेलू ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैयारी
कच्चे तेल के मामले में भारत आयात पर निर्भर है, लेकिन LPG जैसे घरेलू उपयोग के जरूरी ईंधन में सरकार अब घरेलू उत्पादन और भंडार को मजबूत करने पर जोर दे रही है। 16 अगस्त को सामने आया LPG उत्पादन लक्ष्य इसी रणनीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य युद्ध या समुद्री मार्गों में व्यवधान की स्थिति में घरेलू उपभोक्ताओं को आपूर्ति संकट से बचाना है। भारत की मौजूदा ऊर्जा रणनीति के तीन प्रमुख स्तर, रूस से कच्चे तेल की पर्याप्त आपूर्ति, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से तेल स्रोतों का विस्तार, LPG जैसे जरूरी ईंधन का घरेलू उत्पादन बढ़ाना दिखता है।
भारत-अमेरिका संबंधों में ऊर्जा का बढ़ता रणनीतिक महत्व
रूसी तेल की बढ़ती खरीद भारत-अमेरिका संबंधों में एक जटिल मुद्दा बनी रह सकती है। फरवरी में अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के बाद अमेरिकी टैरिफ को 18 प्रतिशत तक घटाने की घोषणा हुई थी और रूसी तेल खरीद को लेकर भी अमेरिकी अपेक्षाएं सामने आई थीं।लेकिन कुछ ही महीनों बाद भारत के तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी का 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंचना बताता है कि व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों के बावजूद ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फैसले भारत अपने आर्थिक हितों के आधार पर लेने को तैयार है।
भारत के लिए रूस बना ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार
भारत की मौजूदा ऊर्जा नीति को न तो पूरी तरह अमेरिकी दबाव की जीत माना जा सकता है और न रूस की ओर भारत के स्थायी झुकाव के रूप में देखा जा सकता है। असल कहानी इससे अधिक व्यावहारिक है। भारत को हर हाल में सस्ता, पर्याप्त और लगातार उपलब्ध तेल चाहिए। मध्य-पूर्व का संकट जितना लंबा चलेगा, रूस जैसे बड़े आपूर्तिकर्ता का महत्व उतना ही बढ़ सकता है। इसलिए अमेरिकी दबाव के बीच रूस से बढ़ता भारतीय तेल आयात विदेश नीति से ज्यादा ऊर्जा सुरक्षा का सवाल बन गया है। अमेरिका भारत को रूसी तेल से दूर करना चाहता है, लेकिन मध्य-पूर्व का संकट भारत को ऊर्जा के हर भरोसेमंद स्रोत को बचाए रखने के लिए प्रेरित कर रहा है।


