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तमिलनाडु में जैव विविधता से बचाया जा रहा नीलगिरि तहर

  • आईआईटी कानपुर के व्याख्यान में अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने बताया जैव विविधता संरक्षण का मॉडल; प्राकृतिक आवास बहाली से लेकर आर्द्रभूमि और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा तक पर जोर

भारत 19 
कानपुर।
तमिलनाडु में जैव विविधता संरक्षण के जरिए वन संपदा, खेतिहर भूमि और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करने का प्रभावी मॉडल विकसित किया गया है। इसका प्रमुख उदाहरण राज्य के राजकीय पशु नीलगिरि तहर (जंगली पहाड़ी बकरा जैसा दिखने वाला वन्यजीव) का संरक्षण है। इसके लिए ‘प्रोजेक्ट नीलगिरि तहर’ के तहत नष्ट हो रहे पहाड़ी घास के मैदानों और प्राकृतिक आवासों को पुनर्जीवित किया जा रहा है।
आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी में बुधवार को ‘तमिलनाडु की कहानी: जैव विविधता संरक्षण और जलवायु लचीलापन का एक सफल मॉडल’ विषय पर स्वस्तिभवतु विशिष्ट व्याख्यान आयोजित हुआ। इसमें तमिलनाडु सरकार के उद्यमिता विकास एवं नवाचार संस्थान की अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं आयुक्त सुप्रिया साहू ने राज्य में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु लचीलेपन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।

प्राकृतिक आवासों की बहाली पर जोर

सुप्रिया साहू ने बताया कि नीलगिरि तहर ऊंचाई वाले पहाड़ी घास के मैदानों में पाया जाता है। इसके प्राकृतिक आवास लगातार प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में संरक्षण की रणनीति केवल वन्यजीवों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रखी गई, बल्कि उनके आवास को दोबारा विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। ‘प्रोजेक्ट नीलगिरि तहर’ इसी व्यापक संरक्षण प्रयास का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता संरक्षण के साथ प्राकृतिक संसाधनों का पुनर्जीवन, वन्यजीव संरक्षण, आर्द्रभूमियों और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटना भी जरूरी है। तमिलनाडु में इन सभी पहलुओं को एक-दूसरे से जोड़कर काम किया जा रहा है।

विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी

व्याख्यान में सुप्रिया साहू ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण तभी सार्थक है, जब नीतियों का लाभ आम लोगों और प्रकृति दोनों तक पहुंचे। तमिलनाडु के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ है कि संरक्षण को स्थानीय समुदायों, उनकी आजीविका और विकास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने विज्ञान, तकनीक, सुशासन और जनभागीदारी को पर्यावरण संरक्षण का आधार बताया। उनके मुताबिक इन सभी को साथ लेकर ऐसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने के साथ समाज को भी अधिक सक्षम और सुरक्षित बनाएं। भविष्य की बड़ी चुनौती इन सफल प्रयासों को बड़े स्तर पर लागू करने की होगी।

जलवायु लचीलेपन पर भी काम

कार्यक्रम में बताया गया कि सार्वजनिक प्रशासन और पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखने वाली सुप्रिया साहू ने तमिलनाडु में जलवायु संबंधी पहलों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह राज्य की ‘तमिलनाडु ग्रीन क्लाइमेट’ पहल की प्रमुख योजनाकारों में शामिल रही हैं। उनके अनुभव का प्रमुख हिस्सा जलवायु लचीलापन, पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ा रहा है। व्याख्यान में तमिलनाडु के मॉडल को इस बात के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया कि जैव विविधता संरक्षण को विकास, आजीविका और जलवायु नीति के साथ जोड़कर दीर्घकालिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

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