- सचिवों के साथ बैठकों की श्रृंखला में उभर रहा बड़ा संकेत, योजनाओं से आगे अब शासन व्यवस्था के अगले चरण की तैयारी
भारत 19
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सचिवों के साथ हालिया बैठकों को केवल सरकारी योजनाओं की समीक्षा के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इन बैठकों का क्रम एक अलग संकेत दे रहा है। सरकार अब केवल यह तय करने में नहीं जुटी कि अगले साल कौन-सी योजना कितनी आगे बढ़ेगी, बल्कि यह भी सोच रही है कि आने वाले दो दशकों की चुनौतियों के बीच सरकार खुद किस तरह काम करेगी। यहीं से ताजा उच्च स्तरीय मंथन सामान्य सरकारी बैठक से अलग हो जाता है। मोदी का जोर दीर्घकालिक सोच पर रहा, लेकिन उसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि क्या मौजूदा प्रशासनिक ढांचा 2047 के भारत की जटिल जरूरतों के लिए पर्याप्त है।
बैठकों की श्रृंखला में छिपा बड़ा संकेत
सचिवों के साथ यह एक दिन की कवायद नहीं है। अलग-अलग दौर में सामाजिक और ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर अर्थव्यवस्था, उद्योग और प्रौद्योगिकी तथा फिर बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और वैश्विक मामलों तक चर्चा का दायरा बढ़ाया गया। इन बैठकों को अलग-अलग मंत्रालयों की समीक्षा मानने के बजाय एक क्रम में देखें तो तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होती है। सरकार विभिन्न क्षेत्रों की तात्कालिक उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी दीर्घकालिक दिशा तलाश रही है। यानी चर्चा का केंद्र धीरे-धीरे “अभी क्या हो रहा है” से “आगे क्या करना है” की तरफ खिसक रहा है।
2047 सिर्फ लक्ष्य नहीं, सरकार के लिए परीक्षा भी
‘विकसित भारत 2047’ राजनीतिक और नीतिगत रूप से मोदी सरकार का बड़ा लक्ष्य है। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल नई परियोजनाएं और निवेश घोषणाएं काफी नहीं होंगी। आने वाले वर्षों में भारत को बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, नई तकनीकों, सुरक्षा चुनौतियों, आपूर्ति शृंखला और रोजगार की प्रकृति जैसे कई मोर्चों पर एक साथ फैसले लेने होंगे। यही कारण है कि शीर्ष नौकरशाही के साथ प्रधानमंत्री का संवाद अब केवल विभागीय प्रगति रिपोर्ट तक सीमित दिखाई नहीं देता। सचिवों से भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप सोचने और पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ने की अपेक्षा की जा रही है।
सरकार की भूमिका भी बदलने की जरूरत
भारत की अर्थव्यवस्था जितनी जटिल होगी, सरकार की भूमिका भी उतनी ही बदलेगी। पहले प्रशासन का बड़ा हिस्सा योजनाएं बनाने और उन्हें लागू कराने तक सीमित था। अब नीति निर्माण के साथ तकनीकी बदलावों को समझना, वैश्विक घटनाक्रमों का अनुमान लगाना और तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है। इसी संदर्भ में विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और युवाओं से अधिक संवाद की बात महत्वपूर्ण है। इसका संकेत यह है कि भविष्य की नीतियां केवल पारंपरिक प्रशासनिक अनुभव के आधार पर तैयार नहीं की जा सकतीं। नए विचारों और बाहरी विशेषज्ञता को भी निर्णय प्रक्रिया में जगह देनी होगी।
संकटों से निकला नया सबक
पिछले कुछ वर्षों में कोविड महामारी, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और पश्चिम एशिया सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकटों ने सरकारों के सामने एक नई चुनौती रखी है—हालात बदलने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयारी कैसे की जाए। मोदी के हालिया मंथन को इसी संदर्भ में भी देखा जा सकता है। सरकार भविष्य की चुनौतियों को केवल संकट आने के बाद संभालने के बजाय उन्हें पहले से पहचानने और उनके लिए संस्थागत तैयारी विकसित करने पर जोर देती दिखाई दे रही है। यहां दीर्घकालिक रणनीति का अर्थ केवल 2047 तक का एक दस्तावेज तैयार करना नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को लगातार ढालने वाली शासन व्यवस्था बनाना है।
असली परीक्षा अब बैठक के बाद शुरू होगी
फिलहाल इन बैठकों से कोई नई नीति, कानून या समयबद्ध सरकारी कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। इसलिए इसे तैयार ‘सरकार 2047 ब्लूप्रिंट’ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन बैठकों की दिशा और प्रधानमंत्री के संदेश से इतना जरूर स्पष्ट है कि सरकार भविष्य की रणनीति को प्रशासनिक स्तर पर अधिक गंभीरता से आकार देना चाहती है। अब असली सवाल बैठकों के बाद का है। क्या इस मंथन का असर आने वाली नीतियों, बजट प्राथमिकताओं और सरकारी फैसलों में दिखाई देगा? क्या शीर्ष स्तर पर हुई चर्चा नीचे तक नई कार्यशैली में बदलेगी? मोदी की सचिवों के साथ बैठकों की असली कहानी शायद यही है। लक्ष्य केवल 2047 में विकसित भारत हासिल करना नहीं है। उससे पहले सरकार को भी यह साबित करना होगा कि वह भविष्य की रफ्तार और जटिलताओं के साथ खुद को बदल सकती है।


