- यूक्रेन पर रूसी हमले तेज, तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव और एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच जयशंकर का मॉस्को दौरा
भारत 19 नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का 23-24 अगस्त का रूस दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब मास्को से संबंधों का सवाल केवल पुरानी दोस्ती तक सीमित नहीं रह गया है। यूक्रेन युद्ध फिर तेज है, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी कोशिशें चल रही हैं और एशिया में नए सुरक्षा समीकरण बन रहे हैं। ऐसे में जयशंकर का मास्को दौरा भारत की उस कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा होगा, जिसमें उसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच अपने हितों का संतुलन बनाए रखना है। आधिकारिक तौर पर दौरे का केंद्र भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की बैठक है। व्यापार, निवेश, विज्ञान और तकनीकी सहयोग पर बातचीत होगी। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने इस यात्रा के एजेंडे को कहीं व्यापक बना दिया है।
रूसी तेल अब सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में शामिल हो गया। रियायती कीमतों पर तेल खरीद ने भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें संभालने में मदद की, लेकिन अब यही खरीद पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंधों में संवेदनशील मुद्दा बनती जा रही है। अमेरिका में रूस से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने के लिए कानून बनाने की कवायद ने भारत के सामने नई चुनौती खड़ी की है। यदि ऐसी कार्रवाई आगे बढ़ती है तो सवाल केवल तेल खरीद जारी रखने का नहीं रहेगा। इसका असर भारतीय कंपनियों, बैंकिंग व्यवस्था, भुगतान तंत्र और व्यापक व्यापारिक संबंधों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि मॉस्को में ऊर्जा सहयोग की चर्चा के पीछे एक बड़ा सवाल होगा—भारत अपने ऊर्जा हितों को संभावित आर्थिक दबाव से कैसे बचाए?
युद्ध के बीच भारत का पुराना रुख
जयशंकर ऐसे समय रूस पहुंचेंगे, जब यूक्रेन पर हमले फिर तेज हुए हैं और युद्ध किसी तत्काल समाधान के करीब नहीं दिख रहा। भारत ने शुरुआत से ही इस संघर्ष पर अलग रास्ता अपनाया है। उसने रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखे, लेकिन लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान की बात भी दोहराई। यह संतुलन अब पहले से कठिन है। रूस भारत का पुराना रक्षा और रणनीतिक साझेदार है, लेकिन लंबे खिंचते युद्ध के साथ उस पर प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव का दायरा भी बढ़ रहा है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह मॉस्को के साथ संवाद और सहयोग जारी रखे, लेकिन युद्ध को लेकर अपनी स्वतंत्र स्थिति भी बनाए रखे। मास्को में भारत का संदेश इसी दोहरे संतुलन पर टिका होगा—साझेदारी जारी रहेगी, लेकिन युद्ध का स्थायी समाधान बातचीत से ही निकलेगा।
व्यापार के साथ आर्थिक सुरक्षा भी एजेंडे में
भारत और रूस द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बढ़ते कारोबार के साथ व्यापार असंतुलन भी एक बड़ी समस्या है। भारत का रूस से आयात, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में, उसके निर्यात से काफी अधिक है। इसलिए जयशंकर के दौरे में भारतीय निर्यात बढ़ाने के अलावा भुगतान व्यवस्था, बैंकिंग चैनल और आपूर्ति श्रृंखला पर भी बातचीत महत्वपूर्ण होगी। पश्चिमी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि में यह महज कारोबारी सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा बन गया है। भारत की दिलचस्पी ऐसे तंत्र विकसित करने में होगी, जिनसे दोनों देशों का व्यापार बाहरी दबाव या वित्तीय बाधाओं से कम प्रभावित हो।
एशिया में भी बदल रही है तस्वीर
दौरे की पृष्ठभूमि केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं है। रूस और उत्तर कोरिया की बढ़ती निकटता, जापान की रक्षा तैयारियों में तेजी और अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा गठबंधनों की सक्रियता एशिया में नए समीकरण बना रही है। भारत की स्थिति यहां भी जटिल है। रूस उसका पुराना रणनीतिक साझेदार है, जापान क्वाड में उसका प्रमुख सहयोगी है और अमेरिका के साथ उसके रक्षा, तकनीक और आर्थिक संबंध लगातार बढ़े हैं। यानि भारत को उन देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने हैं, जो कई मुद्दों पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। यही उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे कठिन परीक्षा भी।
मास्को में क्या साधना चाहता है भारत
जयशंकर की यह यात्रा किसी औपचारिक मध्यस्थता मिशन के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। भारत न तो यूक्रेन युद्ध में किसी पक्ष का प्रतिनिधि है और न ही वह रूस और पश्चिम के बीच मध्यस्थ की भूमिका का दावा कर रहा है। लेकिन भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ मॉस्को, वाशिंगटन और यूरोप—तीनों संवाद बनाए हुए हैं। इसलिए रूस के साथ उसकी बातचीत का महत्व केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। भारत के सामने प्राथमिकता साफ है, रूस के साथ ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाना, लेकिन ऐसा करते हुए अमेरिका और अन्य पश्चिमी साझेदारों के साथ अपने आर्थिक हितों को नुकसान से बचाना।
दौरे की असली परीक्षा
जयशंकर का मास्को दौरा इस बात की परीक्षा नहीं है कि भारत रूस से दोस्ती निभाता है या नहीं। वह रिश्ता दशकों पुराना है। असली परीक्षा यह है कि बदलती दुनिया में भारत उस दोस्ती को किस हद तक अपने हितों के अनुरूप ढाल पाता है। उसे रूसी ऊर्जा की जरूरत है, लेकिन वैश्विक बाजार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उसे रूस के साथ रणनीतिक सहयोग बनाए रखना है, लेकिन अमेरिका और जापान जैसे साझेदारों के साथ बढ़ते संबंधों को भी संभालना है।


