- 2014 के बाद नए मतदाताओं को साधने की रणनीति के सामने जेन-जी ने रोजगार, शिक्षा और सीधे संवाद की नई चुनौती खड़ी की
भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा ने 18 वर्ष की उम्र पूरी कर रहे युवाओं को मतदाता बनाने और उन्हें अपने राजनीतिक दायरे में लाने के लिए लगातार अभियान चलाए। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों तक पहुंच बनाई गई। हर चुनाव के साथ नए युवाओं को मतदाता बनाने से लेकर पार्टी और उसके कार्यक्रमों से जोड़ने की रणनीति मजबूत होती गई।
एक दशक बाद वही पीढ़ी भाजपा के सामने नए सवालों के साथ खड़ी है। अब वह केवल राजनीतिक संदेश सुनने या कार्यक्रमों की भीड़ बनने तक सीमित नहीं रहना चाहती। **रोजगार, परीक्षाएं, शिक्षा और भविष्य उसकी प्राथमिक चिंताएं हैं और वह इन पर सीधे जवाब चाहती है। यही जेन-जी की वह नई राजनीतिक स्थिति है, जिसे उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को समझना होगा।
2014 में नहीं थे मतदाता, अब बदल रहे राजनीति
जेन-जी में आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को शामिल किया जाता है। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के समय इस पीढ़ी का बड़ा हिस्सा मतदान की उम्र तक नहीं पहुंचा था। इसके बाद भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर 18 वर्ष पूरे करने वाले युवाओं को मतदाता बनाने के अभियान चलाए। चुनावी राज्यों में यह प्रक्रिया और तेज होती गई। पार्टी नेताओं और युवा मोर्चा को कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों तक पहुंचकर युवाओं से संवाद और उन्हें पार्टी की गतिविधियों से जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई। बड़े कार्यक्रमों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की रणनीति भी इसी का हिस्सा रही। लेकिन जिस पीढ़ी को पार्टी ने एक दशक तक अपने साथ जोड़ने की कोशिश की, उसका राजनीतिक व्यवहार अब बदल रहा है।
जंतर-मंतर ने दिखाया युवाओं का बदला तेवर
हाल के जेन-जी आंदोलन ने इस बदलाव को खुलकर सामने रखा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा, रोजगार और परीक्षाओं से जुड़े सवालों को लेकर जुटे युवाओं ने दिखाया कि डिजिटल पीढ़ी अब अपनी बात रखने के लिए केवल राजनीतिक दलों के मंच की मोहताज नहीं है। इस आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर भी युवाओं ने अपना पक्ष तेजी से रखा। भाजपा का आईटी सेल, जो लंबे समय से सबसे आक्रामक और संगठित राजनीतिक डिजिटल तंत्रों में गिना जाता है, युवाओं के सवालों के सामने अपनी स्थापित शैली में प्रभावी जवाब देने में कठिनाई महसूस करता दिखा। यहीं से पार्टी के सामने असली चुनौती शुरू होती है। जेन-जी को केवल युवा मतदाता समूह की तरह नहीं देखा जा सकता। उसके सूचना पाने, प्रतिक्रिया देने और नेताओं से संवाद करने के तरीके अलग हैं।
सोशल मीडिया पर अब एकतरफा संदेश नहीं चलता
भाजपा की चुनावी ताकत उसके संगठित संदेश तंत्र में रही है। बूथ से लेकर सोशल मीडिया तक पार्टी कम समय में अपना राजनीतिक संदेश बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाने में सक्षम रही है। लेकिन जेन-जी के सामने यही मॉडल अपनी सीमा तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। यह पीढ़ी केवल संदेश ग्रहण नहीं करती, बल्कि उस पर तुरंत सवाल उठाती है, अपनी प्रतिक्रिया देती है और जरूरत पड़ने पर समानांतर नैरेटिव भी खड़ा कर देती है। उसे अत्यधिक तैयार और प्रचारात्मक दिखने वाले वीडियो या संदेश के बजाय स्वाभाविक संवाद ज्यादा भरोसेमंद लग सकता है। यही कारण है कि भाजपा के सामने अब केवल बेहतर डिजिटल कंटेंट बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि युवाओं से बात करने का तरीका बदलने की जरूरत भी है। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के आईटी तंत्र में हुए बदलाव और दीपक म्हास्के को जिम्मेदारी दिए जाने को भी इसी बदलती चुनौती के संदर्भ में देखा जा रहा है।
एक करोड़ 80 लाख नए मतदाता, बड़ा सवाल
2024 के लोकसभा चुनाव में करीब एक करोड़ 80 लाख नए मतदाता जुड़े थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा युवा मोर्चा ने 2025 में 18 से 30 वर्ष के युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए अभियान शुरू किया। ‘वन बूथ, टेन यूथ’ इसका प्रमुख लक्ष्य था। पार्टी की कोशिश युवाओं को सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि अपने संगठन का सक्रिय हिस्सा बनाने की भी थी। लेकिन अब इस रणनीति के सामने एक नया सवाल है। क्या पार्टी के ये युवा कार्यकर्ता अपने बूथ और अपने दायरे से बाहर के युवाओं की भी भाषा और चिंताओं को समझते हैं? यही उत्तर प्रदेश में भाजपा की बड़ी परीक्षा हो सकती है। क्योंकि युवाओं से संपर्क और युवाओं से संवाद, दोनों अलग बातें हैं।
भाषण नहीं, जवाब चाहता है युवा
पार्टी के सामने चुनौती यह भी है कि उसके कई युवा कार्यकर्ता अब भी पारंपरिक राजनीतिक शैली में बात करते हैं। लेकिन जेन-जी का संवाद का तरीका अलग है। वह एकतरफा भाषण से ज्यादा बातचीत चाहती है और रोजगार, परीक्षा तथा शिक्षा जैसे सवालों पर सीधे जवाब मांगती है। भाजपा अब अपनी डिजिटल टीम में ऐसे युवाओं को शामिल करने की तैयारी कर रही है, जो विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर सहजता से संवाद कर सकें और आदेशात्मक भाषा के बजाय बातचीत के अंदाज में अपनी बात रख सकें। इसका असर उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक स्तर तक दिख सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुए बदलाव को चुनावी राज्यों में उतारना पार्टी के सामने अगला कदम होगा।
टिकट की कसौटी भी बदल सकती है
जेन-जी के साथ बदलते संवाद का असर टिकट के दावेदारों की कसौटी पर भी पड़ सकता है। केवल संगठनात्मक पकड़ या भीड़ जुटाने की क्षमता पर्याप्त नहीं होगी। यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि कोई नेता सोशल मीडिया पर युवाओं के साथ कितना सहज है। उसे रोजगार, परीक्षा या शिक्षा से जुड़े कठिन सवालों का सामना करने और जवाब देने की क्षमता भी दिखानी होगी। उसके डिजिटल वीडियो और पोस्ट को युवा स्वाभाविक संवाद मानते हैं या महज राजनीतिक प्रचार, यह भी फर्क पैदा कर सकता है। भाजपा के लिए यह बदलाव आसान नहीं होगा, क्योंकि उसकी राजनीतिक ताकत लंबे समय से अनुशासित और संगठित संदेश व्यवस्था में रही है। लेकिन जेन-जी अधिक खुलापन मांग रही है। अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि सरकार ने क्या किया। यह सुनना भी जरूरी होगा कि युवा क्या पूछ रहा है।
सपा भी जेन-जी की डिजिटल भाषा पकड़ने में जुटी
भाजपा के सामने चुनौती इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि विपक्ष इस नए राजनीतिक वर्ग की अहमियत समझ रहा है। समाजवादी पार्टी ने जेन-जी तक पहुंच बनाने के लिए एआई और मीम जैसे माध्यमों का इस्तेमाल शुरू किया है। युवाओं तक डिजिटल पहुंच बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटकर काम करने की तैयारी भी की जा रही है। इससे साफ है कि 2027 के चुनाव में युवाओं को सिर्फ पारंपरिक रैलियों और छात्र संगठनों के जरिए नहीं साधा जाएगा। सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, मीम और सीधे डिजिटल संवाद भी चुनावी रणनीति का बड़ा हिस्सा होंगे।
2027 बताएगा किसने युवाओं को सिर्फ सुना नहीं
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव इसलिए सिर्फ सत्ता का मुकाबला नहीं होगा। यह इस बात की भी परीक्षा होगा कि कौन-सा राजनीतिक दल उस युवा पीढ़ी को बेहतर समझ सका, जिसकी राजनीतिक भागीदारी पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। भाजपा के सामने चुनौती सबसे अलग है। क्योंकि जिस युवा को पार्टी ने 18 वर्ष की उम्र में मतदाता के रूप में जोड़ने के लिए अभियान चलाए, वही युवा अब बड़ा होकर सवाल पूछ रहा है। उत्तर प्रदेश में असली मुकाबला केवल युवाओं को अपने पक्ष में करने का नहीं होगा। मुकाबला यह भी होगा कि उनके सवालों को कौन सुनता है, उनका जवाब कौन देता है और किसका संवाद उन्हें सबसे अधिक अपना लगता है।


