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आईआईटी का अध्ययन : नल ने बदली गांवों की जिंदगी

  • देवीपाटन के 80 गांवों में आईआईटी कानपुर की पड़ताल, पानी की तलाश घटी तो बदली परिवारों की दिनचर्या और प्राथमिकताएं

विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। एक नल का कनेक्शन किसी गांव की जिंदगी में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है? आईआईटी कानपुर के अध्ययन ने देवीपाटन क्षेत्र से इसका जवाब तलाशा है। घर तक पानी पहुंचने के बाद बदलाव सिर्फ रसोई और आंगन तक सीमित नहीं रहा। पानी जुटाने में बीतने वाला समय बचा तो ग्रामीण परिवारों की दिनचर्या और प्राथमिकताएं भी बदलने लगीं। आईआईटी कानपुर के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रदीप स्वर्णकार के निर्देशन में हुई यह पड़ताल गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर के 80 गांवों में की गई। अध्ययन में जल जीवन मिशन के बाद ग्रामीण जीवन, महिलाओं की स्थिति, स्वास्थ्य, समय के उपयोग और सामाजिक बदलावों को समझने का प्रयास किया गया।

पानी की मशक्कत घटी, बदला घर का पूरा गणित

अध्ययन में सबसे स्पष्ट बदलाव उन परिवारों में दिखाई दिया, जहां पहले पानी जुटाना रोजमर्रा की बड़ी जिम्मेदारी थी। खासकर महिलाओं को दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाने में समय और श्रम खर्च करना पड़ता था। घर पर नल से पानी मिलने के बाद यह बोझ काफी हद तक कम हुआ। इस बदलाव का असर महिलाओं की रोजमर्रा की भूमिका पर भी पड़ा। अब उनके पास बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई और परिवार की दूसरी जरूरतों के लिए पहले की तुलना में अधिक समय उपलब्ध होने लगा है। अध्ययन यह संकेत देता है कि पेयजल की आसान उपलब्धता ने महिलाओं के श्रम को कम करने के साथ उनकी दिनचर्या को भी नया स्वरूप दिया है।

चार जिलों में अलग-अलग दिखी बदलाव की तस्वीर

आईआईटी की टीम ने गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर के गांवों का तुलनात्मक अध्ययन किया। निष्कर्षों में यह सामने आया कि जल जीवन मिशन का प्रभाव सभी जिलों में दिखाई दिया, हालांकि पानी की पहुंच और उसके सामाजिक असर की स्थिति एक जैसी नहीं रही। कुछ जिलों में नल के पानी का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक पाया गया, जबकि कुछ क्षेत्रों में अभी भी इसकी पहुंच और उपयोग का विस्तार जारी है। इसके बावजूद अध्ययन में शामिल परिवारों के अनुभवों में एक साझा बात उभरकर सामने आई—घर के भीतर पानी की उपलब्धता ने रोजमर्रा की कठिनाइयों को कम किया है।

बचा समय अब परिवार की जरूरतों में लग रहा

पानी के लिए होने वाली दैनिक भागदौड़ कम होने के बाद परिवारों के सामने समय के उपयोग का एक नया अवसर पैदा हुआ। अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण परिवार इस अतिरिक्त समय को अपनी अलग-अलग जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार इस्तेमाल कर रहे हैं। कहीं यह समय छोटे व्यवसाय और दूसरे उत्पादक कामों में लग रहा है तो कहीं परिवार के साथ समय बिताने में। बुजुर्गों की देखभाल और व्यक्तिगत जरूरतों पर भी पहले की तुलना में अधिक ध्यान देने की स्थिति बनी है। कुछ परिवार इस बदलाव को आय बढ़ाने और कौशल विकास के अवसर के रूप में भी देख रहे हैं।

स्कूलों और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचा असर

अध्ययन में पानी की बेहतर उपलब्धता का असर सार्वजनिक संस्थानों पर भी दर्ज किया गया। स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों में स्वच्छता और साफ-सफाई की व्यवस्था बेहतर होने से ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। विशेष रूप से स्कूलों में छात्राओं की उपस्थिति में सुधार को पानी की आसान उपलब्धता से जुड़े बदलावों में महत्वपूर्ण माना गया है। पानी और स्वच्छता की बेहतर व्यवस्था ने शिक्षा के माहौल को भी प्रभावित किया।

यह सिर्फ नल कनेक्शन की कहानी नहीं

आईआईटी कानपुर के अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह पानी की उपलब्धता को केवल एक बुनियादी सुविधा के रूप में नहीं देखता। देवीपाटन क्षेत्र के गांवों में इसका प्रभाव परिवारों के समय, श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक जीवन तक फैलता दिखाई देता है। यानी घर तक पहुंचा पानी केवल बाल्टियां भरने का साधन नहीं बना। उसने ग्रामीण परिवारों के रोजमर्रा के जीवन से पानी की तलाश का एक बड़ा बोझ कम किया और उस खाली हुई जगह में परिवार, काम, देखभाल और बेहतर जीवन की नई प्राथमिकताएं उभरने लगीं।

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