- विजय के विधानसभा हमले से पुराने सहयोगियों की खाई और चौड़ी, ED दस्तावेजों के हवाले से DMK पर भ्रष्टाचार के आरोप; TVK सरकार के साथ कांग्रेस की नजदीकी से परिसीमन और महिला आरक्षण की राष्ट्रीय राजनीति में बदलेगा समीकरण
भारत 19
तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच चुनाव बाद शुरू हुई राजनीतिक दरार को तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की सरकार के मुखिया सी. जोसेफ विजय के सोमवार के विधानसभा हमले ने नया मोड़ दे दिया। विजय ने ED दस्तावेजों और सरकरिया आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के शासनकाल में कथित भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। जवाब में DMK विधायकों ने सदन में हंगामा किया और बाद में वॉकआउट कर दिया। खास बात यह है कि विजय सरकार को कांग्रेस का समर्थन हासिल है और कांग्रेस कुछ ही समय पहले अपने पुराने सहयोगी डीएमके से अलग हुई है।
यह टकराव तमिलनाडु तक सीमित रहने वाला नहीं है। कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ती दूरी का असर परिसीमन, लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्षी रणनीति में दिखाई दे सकता है। दक्षिणी राज्यों की सीटों को लेकर DMK की चिंता और कांग्रेस का TVK के साथ नया समीकरण इस पूरे विवाद को दिल्ली की राजनीति से जोड़ देता है।
विधानसभा में विजय का सीधा हमला
मुख्यमंत्री विजय ने सोमवार को विधानसभा में डीएमके पर निशाना साधते हुए सरकारी ठेकों में कथित ‘पार्टी फंड’ वसूली का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ ठेकेदारों से ठेका राशि का 7.5 से 10 प्रतिशत तक पार्टी फंड के नाम पर लिया जाता था। उन्होंने इसे ‘वैज्ञानिक भ्रष्टाचार’ बताते हुए ED दस्तावेजों का हवाला दिया। विजय ने कथित ED दस्तावेजों के आधार पर एमके स्टालिन, उदयनिधि स्टालिन और अन्य नेताओं के नाम भी लिए। Tamil Nadu State Marketing Corporation Limited (TASMAC) से जुड़े मामलों में उन्होंने पूर्व मंत्री वी. सेंथिल बालाजी, उनके भाई अशोक कुमार और कथित ‘करूर गैंग’ का उल्लेख किया। हालांकि ये सभी विजय द्वारा ED दस्तावेजों के हवाले से लगाए गए आरोप हैं, इन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के तौर पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
हंगामे के बाद DMK का वॉकआउट
विजय के आरोपों के बाद डीएमके विधायकों ने सदन में विरोध शुरू कर दिया। विधायक स्पीकर के आसन के सामने पहुंच गए और नारेबाजी की। उदयनिधि स्टालिन को तत्काल जवाब देने की अनुमति नहीं मिलने के बाद डीएमके विधायकों ने सदन से वॉकआउट किया। बाद में उदयनिधि ने विजय के आरोपों को खारिज करते हुए सरकार पर कानून-व्यवस्था के सवालों से बचने का आरोप लगाया। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि TVK सरकार और डीएमके के बीच टकराव अब केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि विधानसभा के भीतर भी सीधी राजनीतिक भिड़ंत का रूप ले चुका है।
कांग्रेस-DMK रिश्ते में नई राजनीतिक दरार
इस टकराव की पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा बदलाव कांग्रेस का डीएमके से अलग होकर TVK सरकार के साथ खड़ा होना है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने विजय के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन दिया। इससे लंबे समय से साथ रहे कांग्रेस और डीएमके के बीच राजनीतिक दूरी खुलकर सामने आ गई। डीएमके के लिए स्थिति इसलिए ज्यादा असहज है क्योंकि उसका पूर्व सहयोगी अब ऐसी सरकार का समर्थन कर रहा है, जिसका मुख्यमंत्री विधानसभा के भीतर डीएमके के पिछले शासन को भ्रष्टाचार के आरोपों से घेर रहा है। विजय के हमले ने इस पुराने गठबंधन की दरार को अब सार्वजनिक राजनीतिक संघर्ष में बदलने का काम किया है।
परिसीमन के साथ महिला आरक्षण का बड़ा सवाल
तमिलनाडु की यह राजनीतिक लड़ाई उस समय तेज हुई है, जब देश में लोकसभा क्षेत्र परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस महत्वपूर्ण चरण में है। 2023 के संविधान संशोधन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके क्रियान्वयन को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। यानी परिसीमन केवल लोकसभा सीटों के पुनर्विन्यास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के नए राजनीतिक भूगोल को भी प्रभावित करेगा। यही वजह है कि तमिलनाडु समेत दक्षिणी राज्यों की राजनीति इस मुद्दे पर राष्ट्रीय महत्व रखती है।
DMK की सीटों पर पकड़ बचाने की लड़ाई
डीएमके परिसीमन में आबादी के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण को लेकर दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं को लगातार उठाता रहा है। तमिलनाडु की चिंता यह है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उन्हें आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्विन्यास में राजनीतिक नुकसान न उठाना पड़े। इसलिए डीएमके के लिए परिसीमन का मुद्दा केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि दक्षिणी राज्यों की राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी हिस्सेदारी बनाए रखने का सवाल है। इसी मोर्चे पर कांग्रेस और डीएमके की संयुक्त राजनीतिक रणनीति पहले ज्यादा प्रभावी हो सकती थी। अब दोनों के बीच बढ़ती दूरी उस समन्वय को कमजोर कर सकती है।
भाजपा के लिए खुलता राजनीतिक अवसर
कांग्रेस-DMK संबंधों में बढ़ती खाई भाजपा के लिए संभावित राजनीतिक अवसर भी पैदा करती है। विपक्षी खेमे के दो महत्वपूर्ण दल यदि तमिलनाडु में अलग-अलग राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़ते हैं तो राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्षी समन्वय प्रभावित होने की संभावना बढ़ेगी। परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दक्षिणी राज्यों की पार्टियों को साथ रखने की चुनौती पहले से मौजूद है। कांग्रेस और डीएमके के बीच दूरी बढ़ने से यह चुनौती और जटिल हो सकती है। हालांकि इसे भाजपा के लिए निश्चित चुनावी लाभ या किसी संवैधानिक बदलाव के परिणाम की गारंटी मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन **विपक्षी एकजुटता में दरार भाजपा के लिए राजनीतिक स्पेस जरूर बढ़ा सकती है।
विजय का हमला, कांग्रेस की नई मजबूरी
विजय के लिए डीएमके पर आक्रामक हमला राजनीतिक रूप से स्वाभाविक भी है। TVK को तमिलनाडु की स्थापित द्रविड़ राजनीति के सामने खुद को नए विकल्प के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए डीएमके के पिछले शासन की आलोचना उसका प्रमुख राजनीतिक हथियार बन सकती है। दूसरी ओर कांग्रेस अब TVK सरकार की सहयोगी है। ऐसे में डीएमके पर विजय के हमले कांग्रेस को पुराने सहयोगी के साथ और दूरी की स्थिति में ला सकते हैं। यानी विधानसभा में सोमवार को हुआ टकराव केवल विजय और डीएमके के बीच की भिड़ंत नहीं है। इसके पीछे **कांग्रेस का बदला गठबंधन, डीएमके की घटती राजनीतिक साझेदारी और राष्ट्रीय स्तर पर बदलते विपक्षी समीकरण भी दिखाई दे रहे हैं।
चेन्नई की भिड़ंत से दिल्ली तक बदलेगा गणित
तमिलनाडु में बदलते गठबंधन अब राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। एक तरफ TVK सरकार कांग्रेस के समर्थन से अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ डीएमके अपने पुराने सहयोगी कांग्रेस से दूरी के बीच परिसीमन जैसे मुद्दों पर दक्षिणी राज्यों की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करेगा। इस पूरी तस्वीर में महिला आरक्षण और लोकसभा परिसीमन सबसे बड़ा राष्ट्रीय कनेक्ट बनकर उभरते हैं। आने वाले संसदीय बदलावों में सीटों के पुनर्विन्यास के साथ महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नया नक्शा तैयार होना है। ऐसे समय तमिलनाडु में कांग्रेस-DMK की बढ़ती दरार केवल एक राज्य के गठबंधन का टूटना नहीं है। यह विपक्षी राजनीति के बदलते समीकरण और लोकसभा के भविष्य के राजनीतिक नक्शे पर असर डालने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।


