- विश्व ईवी दिवस पर आईआईटी कानपुर में विशेषज्ञों का मंथन; स्मार्ट चार्जिंग, मजबूत वितरण नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा के साथ ग्रिड-रेडी ईवी इकोसिस्टम पर जोर
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कानपुर। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की संख्या बढ़ने के साथ भारत के सामने अब सिर्फ ईवी अपनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि बढ़ती चार्जिंग जरूरत के लिए बिजली ग्रिड को तैयार करने की भी बड़ी चुनौती है। बड़ी संख्या में ईवी एक साथ चार्ज होने पर बिजली की मांग, पीक लोड और वितरण नेटवर्क पर दबाव बढ़ सकता है। विश्व ईवी दिवस पर आईआईटी कानपुर में जुटे विशेषज्ञों ने इसी चुनौती पर मंथन किया। स्मार्ट चार्जिंग के साथ व्हीकल-टू-ग्रिड (V2G) तकनीक को ऐसी व्यवस्था की अहम कड़ी बताया गया, जिसमें जरूरत पड़ने पर ईवी की बैटरी से बिजली वापस ग्रिड को दी जा सके।
ईवी बढ़ेंगी तो चार्जिंग सिस्टम भी बदलना होगा
आईआईटी कानपुर में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के सहयोग से चल रही Greenhouse gases regulated emissions, and Energy use in Technology (GREET) परियोजना के तहत ‘भारत के लिए टिकाऊ और ग्रिड-रेडी ईवी इकोसिस्टम का निर्माण’ विषय पर एक दिवसीय कार्यक्रम हुआ। विशेषज्ञों ने कहा कि देश में ईवी को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए केवल वाहनों का उत्पादन और बिक्री बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। स्मार्ट चार्जिंग, मजबूत बिजली वितरण नेटवर्क, नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल और चार्जिंग स्टेशनों के मानकीकरण को भी साथ लेकर चलना होगा। तकनीकी सत्रों में स्मार्ट चार्जिंग और पीक डिमांड मैनेजमेंट को खास महत्व दिया गया। जरूरत और ग्रिड की स्थिति के अनुसार वाहनों की चार्जिंग का समय तय करने से बिजली की मांग को अलग-अलग समय में बांटा जा सकता है। इससे एक ही समय में बड़ी संख्या में ईवी चार्ज होने से पैदा होने वाले अतिरिक्त भार को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
V2G से ईवी की बैटरी बनेगी ग्रिड का सहारा
मंथन में व्हीकल-टू-ग्रिड यानी V2G तकनीक को भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था में ईवी की भूमिका बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण तकनीक के रूप में देखा गया। इसके जरिए ईवी की बैटरी में संग्रहित बिजली जरूरत पड़ने पर वापस ग्रिड को उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे इलेक्ट्रिक वाहन सिर्फ बिजली की खपत करने वाले साधन नहीं रहेंगे, बल्कि जरूरत के समय ग्रिड को सहारा देने में भी भूमिका निभा सकेंगे। हालांकि इसके लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजली वितरण नेटवर्क को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना होगा।
स्मार्ट चार्जिंग से पीक लोड संभालने की तैयारी
ईवी की बड़ी संख्या में एक साथ चार्जिंग बिजली वितरण व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है। स्मार्ट चार्जिंग के जरिए वाहनों को ऐसे समय चार्ज किया जा सकता है, जब ग्रिड पर बिजली की मांग अपेक्षाकृत कम हो। विशेषज्ञों के मुताबिक पीक डिमांड मैनेजमेंट और स्मार्ट चार्जिंग को साथ लागू करने से ईवी की बढ़ती संख्या के बावजूद ग्रिड पर अचानक पड़ने वाले अतिरिक्त भार को कम किया जा सकता है। इसके लिए चार्जिंग नेटवर्क और बिजली वितरण प्रणाली के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा।
उपभोक्ता सुविधा तय करेगी ईवी अपनाने की रफ्तार
ईवी का भविष्य केवल ग्रिड की क्षमता और तकनीकी ढांचे से तय नहीं होगा। वाहन की कीमत, चार्जिंग की उपलब्धता, ड्राइविंग रेंज, बैटरी का प्रदर्शन, कुल स्वामित्व लागत और आसान वित्तीय सुविधाएं भी उपभोक्ताओं के फैसले को प्रभावित करेंगी। विशेषज्ञों ने बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और चार्जिंग उपकरणों के क्षेत्र में घरेलू क्षमता बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। इससे ईवी इकोसिस्टम के लिए जरूरी तकनीक और उपकरणों की उपलब्धता मजबूत हो सकेगी।
चार्जिंग स्टेशनों के मानकीकरण पर भी जोर
ईवी की संख्या बढ़ने के साथ चार्जिंग स्टेशनों का विस्तार और उनका मानकीकरण भी जरूरी होगा। विशेषज्ञों ने ऐसी चार्जिंग व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया, जो बढ़ती मांग को पूरा करने के साथ बिजली वितरण प्रणाली पर अनियंत्रित दबाव न डाले। नवीकरणीय ऊर्जा को ईवी इकोसिस्टम से जोड़ने की जरूरत पर भी चर्चा हुई। इससे इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की बढ़ती बिजली जरूरत को अधिक टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों से पूरा करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
सरकार-उद्योग-शिक्षण संस्थानों के सहयोग की जरूरत
मंथन में यह बात भी सामने आई कि ग्रिड-रेडी ईवी इकोसिस्टम तैयार करने के लिए सरकार, उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच लगातार सहयोग जरूरी होगा। शोध, प्रदर्शन परियोजनाओं और तकनीकी नवाचार के जरिए ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो ईवी की बढ़ती संख्या और बिजली ग्रिड की जरूरतों के बीच संतुलन बना सके। कार्यक्रम का समन्वय आईआईटी कानपुर के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. सैकत चक्रवर्ती ने किया। कार्यक्रम में आईआईटी कानपुर के अनुसंधान एवं विकास अधिष्ठाता प्रो. जयंधरन जी. राव, CESC के सेवानिवृत्त उप महाप्रबंधक राजीब दास, द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI), हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (HBTU), कानपुर और पीएसजीआर कृष्णम्मल कॉलेज फॉर वूमेन, कोयंबटूर समेत विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ एवं प्रतिनिधि मौजूद रहे।


