- अगस्त में FPI ने करीब 3.1 अरब डॉलर लगाए, जो लगभग दो साल का सबसे बड़ा मासिक निवेश है; लेकिन वैश्विक निवेशकों ने सितंबर की शुरुआत में मनी मार्केट फंडों में 46.1 अरब डॉलर डाले, जिससे भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी की वापसी पर सवाल कायम हैं
भारत 19
नई दिल्ली। चार महीने की लगातार बिकवाली के बाद भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी जरूर हुई है, लेकिन वैश्विक बाजार का बदला रुख इस राहत को अभी स्थायी संकेत नहीं बनने दे रहा। अगस्त में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयरों में करीब 3.1 अरब डॉलर लगाए। यह सितंबर 2024 के बाद सबसे बड़ा मासिक विदेशी निवेश है। जुलाई में भी विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में खरीदार रहे थे। यानि भारत में विदेशी पैसा लौटता दिख रहा है, लेकिन दूसरी तरफ दुनिया भर के निवेशक जोखिम घटाने की रणनीति अपना रहे हैं। यही विरोधाभास सितंबर में भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
46.1 अरब डॉलर मनी मार्केट फंडों में पहुंचे
दो सितंबर को समाप्त सप्ताह में वैश्विक निवेशकों ने मनी मार्केट फंडों में 46.1 अरब डॉलर डाले। अगस्त की शुरुआत के बाद यह सबसे बड़ी साप्ताहिक आवक थी। अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक बॉन्ड बाजार में बिकवाली ने निवेशकों को जोखिम कम करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं। संकेत यह है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम लेने की क्षमता कमजोर हुई है। यदि यह रुझान बना रहा तो भारत जैसे उभरते बाजारों में नई पूंजी आने की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
शेयर बाजार से पैसा पूरी तरह नहीं निकला
वैश्विक फंड प्रवाह के आंकड़े बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। दो सितंबर तक के सप्ताह में वैश्विक इक्विटी फंडों में 6.65 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश आया। यूरोपीय इक्विटी फंडों को 13.09 अरब डॉलर और एशियाई इक्विटी फंडों को 4.22 अरब डॉलर मिले। इसके उलट अमेरिकी इक्विटी फंडों से 11.12 अरब डॉलर की निकासी हुई। यह लगातार दूसरा सप्ताह था जब अमेरिकी इक्विटी फंडों से पैसा निकला। इससे पिछले सप्ताह भी 22.72 अरब डॉलर की निकासी हुई थी।
अगस्त की खरीदारी से साल का नुकसान नहीं भरा
अगस्त का 3.1 अरब डॉलर निवेश भारतीय बाजार के लिए राहत जरूर है, लेकिन इससे 2026 की तस्वीर पूरी तरह नहीं बदली है। इस साल अब तक FPI भारतीय शेयरों से करीब 24.6 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। अगस्त की खरीदारी के पीछे भारतीय कंपनियों के बेहतर आय परिदृश्य, अपेक्षाकृत आकर्षक मूल्यांकन और रुपये को स्थिर करने के लिए रिजर्व बैंक के उपायों की भूमिका रही। अब सितंबर में यह खरीदारी जारी रहती है या नहीं, बाजार के लिए यही बड़ा सवाल है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और तेल पर नजर
भारतीय बाजार के सामने दूसरा बड़ा जोखिम अमेरिकी ब्याज दर और Treasury yield है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर निवेशकों के लिए सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियां अधिक आकर्षक हो जाती हैं। इससे उभरते बाजारों में जोखिम लेकर निवेश करने का आकर्षण घट सकता है। कच्चे तेल की कीमत भी अहम है। भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक है, इसलिए तेल में तेज उछाल महंगाई, चालू खाते और कंपनियों की लागत पर दबाव डाल सकता है। मौजूदा मध्य-पूर्व तनाव ने इस चिंता को और बढ़ाया है।
रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार भारत की ताकत
वैश्विक जोखिम के बीच भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है। 28 अगस्त को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 740.80 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह लगातार नौवां सप्ताह था जब भंडार बढ़ा। भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 600.67 अरब डॉलर और स्वर्ण भंडार 116.41 अरब डॉलर रहा। इतना बड़ा भंडार रुपये में अचानक तेज गिरावट की स्थिति में रिजर्व बैंक को मजबूत सुरक्षा देता है।
जापान की बढ़ती यील्ड भी विदेशी पूंजी के लिए चुनौती
जापान में सरकारी बॉन्ड पर बढ़ता रिटर्न भी वैश्विक पूंजी प्रवाह की दिशा बदल सकता है। घरेलू बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर जापानी निवेशकों के लिए विदेशों में जोखिम लेने के बजाय अपने बाजार में निवेश का आकर्षण बढ़ता है। इससे भारत जैसे उभरते बाजारों को विदेशी पूंजी के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है।
सितंबर में तीन संकेत तय करेंगे बाजार की चाल
अब भारतीय शेयर बाजार के लिए FPI निवेश, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी Treasury yield सबसे महत्वपूर्ण संकेत होंगे। तेल 100 डॉलर के आसपास पहुंचता है और अमेरिकी यील्ड ऊंची रहती है तो अगस्त की विदेशी खरीदारी की रफ्तार पर दबाव आ सकता है। इसके उलट मध्य-पूर्व तनाव घटा, तेल सस्ता हुआ और अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर सख्ती की आशंका कम हुई तो विदेशी निवेश की वापसी जारी रह सकती है।


