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आठ हजार से शुरू हुई पार्टी के पास 620 करोड़ का खजाना

  • तीन साल में बदली आम जनमत पार्टी की वित्तीय तस्वीर, 2020-21 में महज 8 हजार रुपये की घोषित आय से 2023-24 में ₹620.24 करोड़ के बड़े चंदे तक पहुंची रकम

भारत 19

बिहार सियासत में पहले ही पूरे देश को चौंकाता रहा है अब वहां की एक आम जनमत पार्टी की वित्तीय कहानी भी चौंकाने वाली है। 2020-21 में महज 8 हजार रुपये की घोषित आय वाली इस पार्टी ने 2022-23 में 220.36 करोड़ रुपये और 2023-24 में ₹20 हजार से अधिक के योगदान के तौर पर 620.24 करोड़ रुपये घोषित किए। यानी कुछ ही वर्षों में पार्टी की वित्तीय तस्वीर पूरी तरह बदल गई। यहां कहानी सिर्फ 620 करोड़ रुपये की नहीं है। असली दिलचस्पी उस असाधारण वित्तीय छलांग में है, जो महज तीन वित्त वर्षों के दौरान दिखाई देती है।

आठ हजार से 220 करोड़ और फिर 620 करोड़

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 में आम जनमत पार्टी की घोषित आय सिर्फ ₹8,000 थी। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में पार्टी की आय बढ़कर करीब ₹220.36 करोड़ पहुंच गई। अगले वित्त वर्ष में तस्वीर और बदल गई। 2023-24 में पार्टी ने ₹20,000 से अधिक की श्रेणी में करीब ₹620.24 करोड़ के योगदान घोषित किए। यानी 2022-23 के मुकाबले अगले साल घोषित बड़े चंदे में करीब ₹400 करोड़ का इजाफा हुआ। महज एक-दो साल के भीतर इतनी बड़ी वित्तीय छलांग ही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल बन जाती है।

चुनावी असर और आर्थिक ताकत में बड़ा अंतर

आम जनमत पार्टी का चुनावी प्रदर्शन उसकी वित्तीय तस्वीर से बिल्कुल अलग रहा है। पार्टी ने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी उम्मीदवार विधानसभा नहीं पहुंच सका। यही वजह है कि पार्टी के चुनावी प्रभाव और उसके पास दिखाई देने वाले वित्तीय संसाधनों के बीच का अंतर ध्यान खींचता है। हालांकि, केवल बड़ी रकम जुटा लेना किसी राजनीतिक दल के लिए अपने आप में गलत या अवैध नहीं है। सवाल रकम की वैधता से ज्यादा उसकी पारदर्शिता, स्रोत और इस्तेमाल को लेकर है।

620 करोड़ अकेली असामान्य रकम नहीं

ADR की पड़ताल में आम जनमत पार्टी के साथ प्रबल भारत पार्टी का नाम भी सामने आया। दोनों दलों ने मिलकर ₹20 हजार से अधिक की श्रेणी में 680.65 करोड़ रुपये से ज्यादा के योगदान घोषित किए थे। ADR ने बिहार की पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग और वित्तीय खुलासे को लेकर निगरानी और पारदर्शिता मजबूत करने की जरूरत पर सवाल उठाए हैं। इसका मतलब यह है कि मामला केवल आम जनमत पार्टी तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कम चुनावी प्रभाव वाली गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों में बड़ी रकम आने पर उसकी निगरानी और सार्वजनिक वित्तीय जानकारी कितनी प्रभावी है।

अब 620 करोड़ की मनी ट्रेल अहम

आम जनमत पार्टी की वेबसाइट खुद को भ्रष्टाचार, जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ बताती है। पार्टी की मौजूदा वेबसाइट पर गौरव मिश्रा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है। पार्टी से जुड़ी रही अनामिका पासवान का कहना है कि उन्होंने 2022 में ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। वह फिलहाल भाजपा की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। लेकिन इन राजनीतिक बदलावों से अलग इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पैसे की यात्रा है।₹620.24 करोड़ का आंकड़ा सामने आने के बाद अब तीन सवाल सबसे अहम हैं—पैसा किन स्रोतों से आया, कितने दानदाताओं ने दिया और पार्टी ने इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल कहां किया? इन सवालों के जवाब contribution reports, audited accounts और उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड को एक साथ देखने पर ही सामने आ सकते हैं।

आठ हजार से 620 करोड़ की छलांग क्यों?

आम जनमत पार्टी की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां किसी एक साल के बड़े चंदे से ज्यादा महत्वपूर्ण फंडिंग का पूरा पैटर्न है। 2020-21 में 8 हजार रुपये, फिर 2022-23 में 220 करोड़ रुपये से ज्यादा और उसके बाद 2023-24 में 620 करोड़ रुपये से ज्यादा—ये आंकड़े राजनीतिक फंडिंग में असाधारण बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। अब असली पड़ताल यह होनी चाहिए कि इस वित्तीय छलांग के पीछे कौन से स्रोत और कौन सा फंडिंग पैटर्न था। यही पड़ताल बताएगी कि ₹620 करोड़ का यह खजाना सिर्फ एक चौंकाने वाला आंकड़ा है या इसके पीछे भारतीय राजनीतिक फंडिंग की कोई बड़ी कहानी छिपी है।

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