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डॉलर 95 के पार, महंगा तेल बढ़ा दबाव

कमजोर रुपया और महंगा कच्चा तेल बढ़ा रहे आयात बिल, लागत और महंगाई का जोखिम; निर्यातकों को सीमित राहत

भारत 19 न्यूज

कानपुर। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक साथ दोहरा दबाव खड़ा कर दिया है। मंगलवार को कारोबार के दौरान रुपया 95.40 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। एक दिन पहले यह करीब 95.30 रुपये प्रति डॉलर पर था। तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी अनिश्चितता ने मुद्रा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। Reuters के अनुसार 11 अगस्त को सरकारी बैंकों के जरिये डॉलर की बिक्री के संकेत मिले, जिसे बाजार ने रुपये पर दबाव सीमित करने के लिए RBI के हस्तक्षेप के रूप में देखा। इस स्थिति का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि डॉलर पहली बार किसी खास मनोवैज्ञानिक स्तर के पार गया है। असली चिंता यह है कि रुपये की कमजोरी ऐसे समय में आई है जब भारत के लिए कच्चा तेल भी महंगा हो रहा है। इससे देश के आयात बिल, कंपनियों की लागत और महंगाई पर एक साथ दबाव बन सकता है।

महंगा तेल और कमजोर रुपया, दोहरा झटका

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। यदि उसी समय रुपया भी कमजोर हो जाए तो प्रत्येक डॉलर खरीदने के लिए आयातकों को पहले से अधिक रुपये देने पड़ते हैं। यही वह स्थिति है जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दोहरे दबाव के रूप में देखा जा रहा है। मसलन, किसी आयातक को एक करोड़ डॉलर का भुगतान करना है। डॉलर 90 रुपये का होने पर उसे 900 करोड़ रुपये की जरूरत होगी, जबकि 95 रुपये की दर पर यही भुगतान 950 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत में बढ़ोतरी को इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल लागत और बढ़ जाती है। यही वजह है कि रुपये की गिरावट का असर सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। आयातित कच्चे माल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रसायन और अन्य जरूरी वस्तुओं की लागत बढ़ने पर इसका प्रभाव उत्पादन और बाजार कीमतों तक पहुंच सकता है।

आयातकों के लिए लागत का नया जोखिम

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आलोक अग्रवाल के मुताबिक रुपये की कमजोरी का सीधा असर उन कारोबारियों पर पड़ रहा है जो डॉलर में भुगतान करते हैं। उनका कहना है कि कारोबारी जिस विनिमय दर पर माल का ऑर्डर करते हैं, भुगतान के समय तक यदि रुपया कमजोर हो जाए तो उसी माल के लिए उन्हें अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उनके अनुसार बड़ी कंपनियां मुद्रा जोखिम से बचने के लिए बैंकों के माध्यम से हेजिंग जैसी व्यवस्था कर सकती हैं, लेकिन छोटे आयातकों के लिए यह सुविधा अपेक्षाकृत महंगी और जटिल हो सकती है। ऐसे में विनिमय दर में अचानक बदलाव सीधे उनकी लागत और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करता है। इसका अर्थ यह भी है कि डॉलर की मजबूती का बोझ हर कारोबारी समान तरीके से नहीं उठाता। बड़े कारोबारी वित्तीय साधनों के जरिए जोखिम को सीमित कर सकते हैं, जबकि छोटे कारोबारियों के पास लागत बढ़ने को अपने मार्जिन में समाहित करने के अलावा कम विकल्प बचते हैं।

निर्यातकों को फायदा, मगर सीमित

कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए स्वाभाविक रूप से पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। जिन कंपनियों को विदेश से डॉलर में भुगतान मिलता है, उन्हें डॉलर को रुपये में बदलने पर अधिक रकम मिलती है। आईटी सेवाओं, फार्मा, टेक्सटाइल और कुछ इंजीनियरिंग निर्यातकों को इससे फायदा हो सकता है। लेकिन यह लाभ सभी निर्यातकों के लिए समान नहीं है। जिन कंपनियों का उत्पादन आयातित मशीनरी, रसायनों या कच्चे माल पर निर्भर है, उनके लिए डॉलर महंगा होने से लागत भी बढ़ती है। आलोक अग्रवाल के मुताबिक छोटे निर्यातकों को कमजोर रुपये का फायदा अक्सर उतना नहीं मिल पाता जितना बड़े निर्यातकों को। कई छोटे कारोबारी बड़े निर्यातकों या विदेशी एजेंटों के माध्यम से कारोबार करते हैं। ऐसे मामलों में डॉलर से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का पूरा हिस्सा उत्पादक तक नहीं पहुंच पाता। यही वजह है कि कमजोर रुपये से सबसे अधिक लाभ उस निर्यातक को मिलता है जिसकी आमदनी डॉलर में और लागत का बड़ा हिस्सा रुपये में हो।

महंगे तेल का असर पेट्रोल से आगे

चार्टर्ड अकाउंटेंट की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व सभापति दीप कुमार मिश्रा के मुताबिक रुपये की कमजोरी और महंगे पेट्रोलियम की स्थिति का असर अर्थव्यवस्था की पूरी लागत संरचना पर पड़ता है। उनके अनुसार पेट्रोलियम उत्पाद परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत से सीधे जुड़े हैं। जब कच्चे तेल की कीमत और आयात लागत बढ़ती है तो माल ढुलाई से लेकर उत्पादन तक की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर किसी एक उद्योग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सप्लाई चेन के अलग-अलग चरणों से होते हुए अंतिम उत्पाद तक पहुंच सकता है। दीप कुमार मिश्रा का कहना है कि ऐसे माहौल में RBI के सामने दोहरी चुनौती है। उसे रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल भी संतुलित तरीके से करना होगा। यदि रुपये की तेज गिरावट को पूरी तरह बाजार पर छोड़ दिया जाए तो आयात लागत बढ़ने के साथ महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।

महंगाई का दबाव कैसे पहुंचता है जेब तक

कमजोर रुपया और महंगा तेल मिलकर आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ाते हैं। हालांकि डॉलर के 95 रुपये पार करने का अर्थ यह नहीं है कि घरेलू बाजार में हर वस्तु की कीमत उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। किसी उत्पाद की अंतिम कीमत में कच्चे माल, टैक्स, परिवहन, कंपनियों का मार्जिन, घरेलू मांग और वैश्विक कीमतों सहित कई कारक शामिल होते हैं। फिर भी यदि तेल और रुपया दोनों लंबे समय तक प्रतिकूल दिशा में बने रहते हैं तो परिवहन और उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है। यानी रुपये की कमजोरी का असर तत्काल हर वस्तु पर नहीं, बल्कि लागत की पूरी श्रृंखला के जरिये धीरे-धीरे दिखाई देता है।

RBI के सामने संतुलन की चुनौती

रुपये की कमजोरी को रोकने के लिए RBI के पास विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का विकल्प है। लेकिन लगातार डॉलर बेचने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए केंद्रीय बैंक के लिए चुनौती रुपये को किसी एक निश्चित स्तर पर बनाए रखने से ज्यादा बाजार में अनावश्यक अस्थिरता रोकने की होती है। हालिया घटनाक्रम में यह भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। 7 अगस्त को भी Reuters ने सरकारी बैंकों के जरिये RBI के हस्तक्षेप की रिपोर्ट की थी। उस समय तेल की कीमत करीब 82.7 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी। दूसरी ओर, 5 अगस्त को RBI ने अपनी रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी थी। इसका अर्थ है कि फिलहाल केंद्रीय बैंक महंगाई, वृद्धि और वैश्विक जोखिमों के बीच संतुलन की नीति पर चल रहा है।

अब तेल और Fed तय करेंगे अगली दिशा

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा के लिए तीन संकेत सबसे महत्वपूर्ण रहेंगे—कच्चे तेल की कीमत, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति और RBI का रुख। पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही को लेकर अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है। 11 अगस्त को Brent crude करीब 89.64 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि पिछले दिनों में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। अमेरिकी महंगाई के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। हालिया कमजोर रोजगार आंकड़ों के बाद सितंबर में अमेरिकी Fed की ब्याज दर को लेकर बाजार की उम्मीदों में बदलाव आया है, लेकिन 11 अगस्त तक Reuters के अनुसार सितंबर में दर बढ़ोतरी की संभावना करीब 52 प्रतिशत आंकी जा रही थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि कमजोर रोजगार आंकड़ों के बाद दर बढ़ने की आशंका पूरी तरह कम हो गई है। आगामी अमेरिकी CPI और अन्य आर्थिक आंकड़े इस धारणा को फिर बदल सकते हैं। यदि अमेरिकी महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है तो Fed की नरमी की उम्मीद कमजोर हो सकती है और डॉलर को समर्थन मिल सकता है। इसके विपरीत महंगाई में नरमी और ब्याज दरों में अपेक्षाकृत नरम रुख रुपये समेत उभरते बाजारों को राहत दे सकता है।

95 रुपये का स्तर क्यों है अहम 

डॉलर का 95 रुपये के पार जाना अपने आप में आर्थिक संकट का संकेत नहीं है। बाजार में विनिमय दर लगातार बदलती रहती है और किसी एक स्तर को देखकर अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं तय की जा सकती। लेकिन मौजूदा परिस्थिति इसलिए अलग है क्योंकि रुपये पर दबाव तेल की कीमतों में तेजी और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के साथ आया है। Reuters ने भी हालिया बाजार आकलनों में तेल को रुपये की दिशा का प्रमुख चालक बताया है। Crédit Agricole के भारत ट्रेजरी प्रमुख ने 10 अगस्त को रुपये के लिए 94-96 रुपये प्रति डॉलर का संभावित दायरा बताया था और 96 के आसपास को उचित मूल्य का संदर्भ स्तर माना था। यह बाजार का अनुमान है, कोई निश्चित सीमा नहीं। इसलिए आने वाले दिनों की असली कहानी यह नहीं होगी कि डॉलर 95 या 96 रुपये के स्तर पर जाता है या नहीं। महत्वपूर्ण यह होगा कि तेल कितना महंगा रहता है, भू-राजनीतिक जोखिम कितने समय तक बने रहते हैं और RBI बाजार में किस तरह हस्तक्षेप करता है।

भारत के लिए कमजोर रुपया दोधारी स्थिति है। डॉलर में कमाई करने वाले कुछ निर्यातकों को फायदा मिल सकता है, लेकिन आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था में महंगा डॉलर लागत बढ़ाता है। यदि इसी समय कच्चा तेल भी महंगा रहता है तो आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल रुपये की अगली दिशा केवल मुद्रा बाजार नहीं, बल्कि तेल बाजार, पश्चिम एशिया की स्थिति, अमेरिकी Fed की नीति और RBI के कदम मिलकर तय करेंगे।

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