- US और पश्चिमी मीडिया की नजर BRICS Summit पर; ईरान युद्ध, UAE तनाव और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत के सामने बड़ी कूटनीतिक चुनौती
भारत 19 डेस्क
भारत में 12 और 13 सितंबर को होने वाले BRICS Summit 2026 से पहले दुनिया की निगाहें नई दिल्ली पर टिक गई हैं। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध ने इस बार ब्रिक्स की बैठक को सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रहने दिया है। अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग में युद्ध, ईरान-यूएई तनाव, रूस-चीन की भूमिका और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत की रणनीति पर खास नजर है।
अमेरिकी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों की रिपोर्टिंग में इस बार ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती उसके भीतर मौजूद अलग-अलग हितों को बताया जा रहा है। ब्लूमबर्ग ने युद्ध, अमेरिकी शुल्क और सदस्य देशों के अलग-अलग हितों को ब्रिक्स के सामने बड़ी मुश्किलों में गिना है। वहीं रॉयटर्स ने ईरान युद्ध के बीच ब्रिक्स की एकजुटता की परीक्षा पर जोर दिया है। अमेरिका की नजर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक ओर वाशिंगटन का रणनीतिक साझेदार है, वहीं दूसरी ओर रूस, ईरान और ग्लोबल साउथ के साथ अपने रिश्तों को भी बनाए रखना चाहता है।
ईरान ने BRICS की एकजुटता की परीक्षा बढ़ाई
ईरान के ब्रिक्स में शामिल होने के बाद संगठन का पश्चिम एशिया से जुड़ाव और गहरा हुआ है। लेकिन मौजूदा युद्ध ने यही समीकरण मुश्किल बना दिया है। ईरान के साथ यूएई और सऊदी अरब के अलग-अलग रिश्ते हैं और क्षेत्रीय तनाव का असर आर्थिक और ऊर्जा हितों पर भी पड़ रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह का व्यवधान वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा खतरा है। कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाना इस संकट की आर्थिक गंभीरता को भी दिखा रहा है।
संयुक्त घोषणापत्र पर अटकी BRICS की सहमति
BRICS Summit से पहले सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया युद्ध पर साझा भाषा तय करने की है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिक्स के वार्ताकार इस मुद्दे पर मतभेद दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक भी संयुक्त बयान के बिना खत्म हुई थी। यही वजह है कि नई दिल्ली बैठक में जारी होने वाला संयुक्त घोषणापत्र इस सम्मेलन की सबसे अहम राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाएगा।
अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत की मुश्किल बढ़ाई
ईरान को लेकर भारत के सामने एक और चुनौती अमेरिकी प्रतिबंधों की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए व्यापक आर्थिक अभियान शुरू किया है। ऐसे में भारत को ईरान के साथ अपने ऊर्जा और रणनीतिक हितों तथा अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों के बीच संतुलन साधना होगा। भारत के लिए चाबहार बंदरगाह भी रणनीतिक महत्व रखता है। साथ ही रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीद भारत की ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बनी हुई है। यही वजह है कि वाशिंगटन की नजर भारत के अगले कदम पर बनी हुई है।
BRICS में डॉलर से दूरी पर अमेरिका की नजर
ब्रिक्स देशों में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और डॉलर पर निर्भरता घटाने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। लेकिन भारत इस मुद्दे को सीधे अमेरिकी डॉलर के विकल्प के तौर पर पेश करने से बचता रहा है। रॉयटर्स की 10 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ब्रिक्स देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं यानी CBDC के बीच सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को जोड़ने की दिशा में जोर दे रहा है। हालांकि इसके सामने तकनीकी और राजनीतिक दोनों तरह की अड़चनें हैं।
चीन और रूस की मौजूदगी से बढ़ा भू-राजनीतिक महत्व
इस बार BRICS Summit इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आ रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, उनकी यात्रा भारत-चीन रिश्तों में जारी सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का मौका दे सकती है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी के साथ मोदी-शी और मोदी-पुतिन मुलाकातों पर भी दुनिया की निगाह रहेगी। इससे सम्मेलन का महत्व आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति संतुलन तक पहुंच गया है।
भारत नहीं चाहता BRICS बने अमेरिका विरोधी मंच
भारत की कोशिश ब्रिक्स को किसी एक देश के खिलाफ राजनीतिक मंच बनाने की नहीं, बल्कि विकासशील देशों के आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाने की रही है। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा भी है। उसे ब्रिक्स के भीतर रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ खड़ा दिखना है, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को भी कमजोर नहीं होने देना है।
ईरान बना BRICS Summit की सबसे बड़ी परीक्षा
इस बार ईरान सिर्फ ब्रिक्स का एक सदस्य देश नहीं है, बल्कि सम्मेलन के एजेंडे को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। युद्ध, तेल, होर्मुज, अमेरिकी प्रतिबंध और ईरान-यूएई तनाव ने ब्रिक्स के सामने ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर दी हैं, जिनमें साझा रुख बनाना आसान नहीं होगा। यही कारण है कि अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया इस सम्मेलन को इस सवाल के साथ देख रहा है कि ब्रिक्स संकट की घड़ी में सिर्फ बयान जारी करता है या वास्तव में सामूहिक राजनीतिक और आर्थिक ताकत के रूप में सामने आता है।
दिल्ली Summit में अमेरिका किन चार बातों पर नजर रखेगा
- ईरान युद्ध पर साझा रुख। क्या ब्रिक्स सदस्य देश पश्चिम एशिया संकट पर एकजुट भाषा तैयार कर पाएंगे?
- भारत-चीन-रूस समीकरण। क्या शी जिनपिंग की भारत यात्रा और मोदी-पुतिन मुलाकातों से ब्रिक्स के भीतर नया राजनीतिक संतुलन दिखाई देगा?
- डॉलर से दूरी और भुगतान व्यवस्था। क्या स्थानीय मुद्राओं और CBDC आधारित भुगतान को आगे बढ़ाने पर ठोस पहल होती है?
- ब्रिक्स की दिशा। क्या संगठन ग्लोबल साउथ के आर्थिक सहयोग तक सीमित रहेगा या अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करेगा?
BRICS Summit 2026 पर दुनिया की निगाह
नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit 2026 भारत के लिए सिर्फ मेजबानी का अवसर नहीं है। ईरान युद्ध और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के बीच यह सम्मेलन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की भी परीक्षा है। अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया की नजर इस बात पर रहेगी कि भारत ब्रिक्स के भीतर कितनी एकजुटता कायम कर पाता है और क्या नई दिल्ली ऐसा रास्ता निकालती है, जिसमें रूस-चीन-ईरान के साथ सहयोग और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी दोनों साथ चल सकें।


