- हर जिले में छह सदस्यीय ECCE कोर ग्रुप बनेगा; 200 मीटर के दायरे वाले आंगनबाड़ी केंद्र स्कूल परिसरों से जुड़ेंगे, 3-6 साल के बच्चों की उपस्थिति, सीखने और समग्र विकास पर होगी नजर
भारत 19
लखनऊ। कक्षा एक में पहुंचने से पहले बच्चों की सीखने की नींव मजबूत करने के लिए उत्तर प्रदेश में शुरुआती शिक्षा की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से जोड़ने की तैयारी है। हर जिले में छह सदस्यीय ECCE कोर ग्रुप बनाया जाएगा। यह टीम आंगनबाड़ी और परिषदीय स्कूलों के बीच समन्वय मजबूत करने के साथ तीन से छह वर्ष के बच्चों की प्री-प्राइमरी शिक्षा, उपस्थिति और सीखने की प्रगति पर नजर रखेगी। स्कूलों के 200 मीटर के दायरे में गैर-विभागीय भवनों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों को भी विद्यालय परिसरों से जोड़ने पर जोर रहेगा।
आंगनबाड़ी से स्कूल तक जुड़ेगी पढ़ाई की कड़ी
नई व्यवस्था का मकसद बच्चे के स्कूल पहुंचने से पहले ही उसकी सीखने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है। आंगनबाड़ी में मिलने वाली शुरुआती देखभाल और गतिविधि आधारित शिक्षा को परिषदीय स्कूलों की प्री-प्राइमरी व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश होगी। इससे आंगनबाड़ी से बाल वाटिका और फिर कक्षा एक तक बच्चे के लिए सीखने का क्रम अधिक सहज बनाया जा सकेगा। 200 मीटर के दायरे में गैर-विभागीय भवनों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों को परिषदीय स्कूल के परिसर में लाने की योजना है। इससे बच्चों के लिए उपलब्ध शैक्षिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और स्कूल के शिक्षकों के बीच तालमेल बढ़ने से प्री-प्राइमरी से प्राथमिक कक्षाओं तक संक्रमण आसान होने की उम्मीद है।
बच्चे की प्रगति का बनेगा समग्र रिपोर्ट कार्ड
प्री-प्राइमरी बच्चों की प्रगति को भी ज्यादा व्यवस्थित करने की तैयारी है। समग्र रिपोर्ट कार्ड में पढ़ाई के साथ बच्चे के स्वास्थ्य और विकास से जुड़े पहलु भी शामिल किए जाएंगे। बच्चे का आकलन केवल अक्षर, शब्द या अंक पहचानने की क्षमता तक सीमित नहीं होगा। तीन से छह वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए पढ़ाई को उनकी उम्र और रुचि के अनुरूप रखा जाएगा। खेल, गतिविधियों और अनुभव आधारित शिक्षा से भाषा, शुरुआती गणितीय समझ और दुनियावी समझ विकसित करने की कोशिश होगी। आंगनबाड़ी केंद्रों और बाल वाटिकाओं में लर्निंग कॉर्नर को भी इसी उद्देश्य से मजबूत किया जा रहा है।
आंगनबाड़ी और बेसिक शिक्षा विभाग आएंगे साथ
शुरुआती शिक्षा की व्यवस्था में एक बड़ी चुनौती यह है कि आंगनबाड़ी और स्कूल शिक्षा अलग-अलग विभागों के माध्यम से संचालित होती है। जिला स्तर पर दोनों विभागों से जुड़े प्रतिनिधियों को एक ही कोर ग्रुप में शामिल करने का उद्देश्य इसी दूरी को कम करना है। बच्चों की उपस्थिति, केंद्रों की स्थिति, प्रशिक्षण और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़े मामलों में दोनों विभाग साझा स्तर पर काम कर सकेंगे। इस बदलाव का अहम पहलू यह है कि शुरुआती शिक्षा का आकलन केवल कितने केंद्र चल रहे हैं और कितने बच्चे दर्ज हैं, तक सीमित नहीं रहेगा। बच्चा नियमित आ रहा है या नहीं, उम्र के मुताबिक क्या सीख रहा है और कक्षा एक के लिए कितना तैयार है—इन सवालों पर भी नजर होगी।
हर जिले में छह सदस्यीय कोर ग्रुप
ECCE यानी अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन के लिए गठित होने वाले छह सदस्यीय दल में बेसिक शिक्षा, बाल विकास, प्रशिक्षण और अकादमिक सहयोग से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होंगे। टीम का काम सिर्फ केंद्रों की स्थिति देखना नहीं होगा। वह नामांकन, बच्चों की उपस्थिति, शिक्षण गतिविधियों, संसाधनों और शिक्षकों-आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की भी समीक्षा करेगी। नई व्यवस्था में केवल बच्चों को केंद्रों तक लाना ही लक्ष्य नहीं है। प्री-प्राइमरी स्तर पर 70 प्रतिशत उपस्थिति हासिल करने पर भी जोर रहेगा। इसके लिए अभिभावकों और समुदाय को शुरुआती शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी भी जिला स्तर की व्यवस्था से जोड़ी गई है।
शिक्षकों के प्रशिक्षण की भी होगी समीक्षा
ECCE कोर ग्रुप प्री-प्राइमरी शिक्षा से जुड़े शिक्षकों और आंगनबाड़ी कर्मियों के प्रशिक्षण पर भी नजर रखेगा। मकसद यह है कि शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को केवल किताबों के जरिए पढ़ाने के बजाय खेल और गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर मिले। इसके लिए उपलब्ध शिक्षण सामग्री और केंद्रों के संसाधनों की स्थिति की भी समीक्षा की जाएगी।
