- CBI ने फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज से पासपोर्ट हासिल करने का लगाया था आरोप, अदालत ने कहा- अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका
BHARAT 19/ देहरादून। जिस फर्जी पासपोर्ट मामले में पतंजलि के आचार्य बालकृष्ण करीब डेढ़ दशक से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, सोमवार को उसका पटाक्षेप हो गया। देहरादून की विशेष CBI अदालत ने आचार्य बालकृष्ण और सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
फर्जी दस्तावेज से पासपोर्ट लेने का था आरोप
मामला भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल से जुड़ा था। CBI ने आरोप लगाया था कि बालकृष्ण ने पासपोर्ट बनवाने के लिए ऐसे शैक्षणिक दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनकी प्रामाणिकता पर सवाल थे। मामले में खुर्जा स्थित संस्कृत महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य नरेश चंद्र द्विवेदी को भी आरोपी बनाया गया था। अभियोजन का आरोप था कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने की प्रक्रिया में दोनों की भूमिका रही। हालांकि, लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।
2011 में CBI ने दर्ज किया था केस
यह मामला करीब 15 साल पहले 2011 में CBI की जांच के दायरे में आया था। जांच के बाद एजेंसी ने बालकृष्ण और नरेश चंद्र द्विवेदी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। मामला आगे चलकर देहरादून की विशेष CBI अदालत में चला। इस दौरान बालकृष्ण को गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत की प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ा। मुकदमे की सुनवाई कई वर्षों तक चलती रही और आरोपों तथा दस्तावेजों को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें अदालत के सामने रखी गईं।
अदालत में साबित नहीं हो सके CBI के आरोप
फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि CBI द्वारा लगाए गए आरोपों और अदालत में उनकी कानूनी पुष्टि के बीच अंतर रहा। अभियोजन को किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आरोपों को निर्धारित कानूनी कसौटी पर साबित करना होता है। इस मामले में अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसी आधार पर विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (CBI) एवं तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संदीप सिंह भंडारी की अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
पासपोर्ट को लेकर भी लंबी चली कानूनी लड़ाई
मामले के दौरान बालकृष्ण का पासपोर्ट भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा। पासपोर्ट वापस लेने और उसके नवीनीकरण को लेकर उन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद उन्हें पासपोर्ट से संबंधित राहत मिली थी। इस तरह पासपोर्ट से जुड़ा यह विवाद केवल CBI ट्रायल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई वर्षों तक अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाओं में भी चलता रहा।
15 साल बाद मिली बड़ी कानूनी राहत
आचार्य बालकृष्ण पतंजलि समूह के प्रमुख चेहरों में हैं और बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी रहे हैं। ऐसे में करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में दोषमुक्ति उनके लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत है। हालांकि, फैसले का अर्थ यह है कि इस आपराधिक मुकदमे में अभियोजन आरोप सिद्ध नहीं कर सका और इसलिए अदालत ने आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया। इसे आरोपों के न्यायिक रूप से सिद्ध न होने के रूप में ही रिपोर्ट किया जाना अधिक सटीक होगा।
क्या था पूरा मामला
- 2011 में CBI ने मामले की जांच शुरू कर मुकदमा दर्ज किया।
- फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने का आरोप लगा।
- खुर्जा के संस्कृत महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य नरेश चंद्र द्विवेदी को सह आरोपी बनाया गया।
- करीब 15 वर्षों तक केस चलने के बाद देहरादून की विशेष CBI अदालत ने दोनों को दोषमुक्त कर दिया।
- अदालत के फैसले का आधार बना अभियोजन पक्ष का आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाना।


