- कांतपुरम एपी अबू बकर मुसलियार की टिप्पणी पर केरल में सियासी घमासान; एक ओर महिलाओं को लोकसभा-विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने की तैयारी, दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी पर धर्मगुरु की आपत्ति, विरोध के बाद दी सफाई
भारत 19
देश में महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी बढ़ाने की बहस के बीच केरल में सुन्नी धर्मगुरु कांतपुरम एपी अबू बकर मुसलियार की टिप्पणी ने विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने पर आपत्ति जताते हुए इसे ‘भारी विनाश’ से जोड़ दिया। उनके इस बयान पर केरल के राजनीतिक और सामाजिक हलकों से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। विवाद बढ़ने के बाद धर्मगुरु ने अपने रुख पर सफाई दी और समर्थकों से संयम बरतने की अपील की।
महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी पर उठाए सवाल
कांतपुरम से जुड़े समस्ता केरल जमीयतुल उलेमा के एक सर्कुलर के बाद यह विवाद सामने आया। सर्कुलर में धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन को इस्लामी मानकों के अनुरूप रखने और महिलाओं की सार्वजनिक मंचों पर गैर-रिश्तेदार पुरुषों के बीच मौजूदगी से बचने की बात कही गई थी। इसके बाद कोच्चि में एक कार्यक्रम के दौरान कांतपुरम ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कुरान की शिक्षा का हवाला देते हुए महिलाओं के घर में रहने की बात कही और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी को गंभीर परिणामों से जोड़ा।
ओणम और ईद में महिलाओं की भागीदारी बनी पृष्ठभूमि
कांतपुरम की टिप्पणी ऐसे समय आई जब केरल में ओणम और ईद से जुड़े सार्वजनिक आयोजनों में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी चर्चा में थी। सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में महिलाओं और लड़कियों की सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी को लेकर भी बहस हुई। इसी माहौल में धर्मगुरु की टिप्पणी ने महिलाओं के धार्मिक-सामाजिक जीवन और सार्वजनिक भागीदारी को लेकर विवाद को और हवा दे दी।
राजनीतिक दलों ने भी जताई कड़ी आपत्ति
बयान पर केरल के राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। सीपीएम नेता केके शैलजा समेत कई नेताओं ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने वाली सोच की आलोचना की। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने भी ऐसी टिप्पणियों को आधुनिक और प्रगतिशील केरल की सामाजिक सोच के विपरीत बताया। सीपीएम के अन्य नेताओं ने भी कहा कि महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक भागीदारी को सीमित करने वाली सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
33 फीसदी महिला आरक्षण के बीच बयान ने बढ़ाया विरोधाभास
कांतपुरम की टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का संवैधानिक प्रावधान किया जा चुका है। ऐसे समय जब महिलाओं को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की तैयारी है, सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी को सीमित करने वाली टिप्पणी ने बहस को और तीखा कर दिया है।
विरोध के बीच कांतपुरम ने दी सफाई
लगातार आलोचना के बाद कांतपुरम ने 4 सितंबर को अपनी टिप्पणी को लेकर सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनके संगठन पर महिलाओं को दबाने या उन्हें समाज से अलग रखने का आरोप उचित नहीं है। उन्होंने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा के लिए संचालित संस्थानों का उदाहरण भी दिया। इसके बाद उन्होंने अपने अनुयायियों से विवाद को आगे नहीं बढ़ाने और किसी उकसावे में नहीं आने की अपील की। उन्होंने स्वस्थ चर्चा और विचार-विमर्श को प्राथमिकता देने की बात कही। हालांकि, कांतपुरम ने अपने मूल बयान को स्पष्ट शब्दों में वापस लेने की घोषणा नहीं की। इसलिए उनके ताजा रुख को सफाई और संयम की अपील के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
महिलाओं की भूमिका को लेकर फिर छिड़ी बहस
कांतपुरम की टिप्पणी ने केरल में महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है। सवाल केवल किसी धार्मिक आयोजन में महिलाओं की मौजूदगी का नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, राजनीति और सामाजिक जीवन में उनकी स्वतंत्र भागीदारी का भी है।


