- अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध से बदल रही वैश्विक सप्लाई चेन; भारत के लिए China+1 का अवसर, लेकिन चीनी आयात और अमेरिकी निगरानी बढ़ने से नई चुनौतियां भी
भारत 19 डेस्क नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच चल रहा टैरिफ युद्ध अब केवल दोनों देशों के व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है। इसके असर से वैश्विक सप्लाई चेन का भूगोल बदल रहा है और भारत के सामने एक साथ बड़ा अवसर और नई चुनौती खड़ी हो रही है। चीन के उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ने से वैश्विक कंपनियां चीन के विकल्प तलाश रही हैं, जबकि चीन भी अपने निर्यात के लिए नए बाजार और व्यापारिक रास्ते तलाश रहा है। भारत के लिए यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि दुनिया की बड़ी कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए चाइना प्लस वन रणनीति अपना रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट, इंजीनियरिंग उत्पाद, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और कई अन्य क्षेत्रों में भारत इस बदलाव का लाभ उठा सकता है।

चीन से हटती सप्लाई चेन में भारत की जगह
अमेरिकी बाजार में चीन के सामान पर ऊंचे टैरिफ ने वहां से सीधे निर्यात करने की लागत और जोखिम बढ़ा दिया है। इसका फायदा उन देशों को मिल सकता है जिनके पास उत्पादन क्षमता, कुशल श्रम, बड़ा घरेलू बाजार और अमेरिका समेत पश्चिमी बाजारों तक पहुंच है। भारत इन मानकों पर मजबूत स्थिति में है। यदि वैश्विक कंपनियां चीन के अतिरिक्त भारत में उत्पादन क्षमता विकसित करती हैं तो इसका असर केवल निर्यात बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा। इससे निवेश, रोजगार, तकनीक हस्तांतरण और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी गति मिल सकती है। यही वह अवसर है जिसे भारत चाइना प्लस वन से चाइना प्लस इंडिया रणनीति की दिशा में बदल सकता है।
चीन भारत की सप्लाई चेन से बाहर नहीं
दूसरी तरफ चीन अभी भी भारतीय उद्योग के लिए अहम सप्तायर है। मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, औद्योगिक उपकरण, केमिकल और कई इंटरमीडिएट गुड्स के लिए भारतीय कंपनियां चीन पर निर्भर हैं। यानी अमेरिका चीन पर टैरिफ बढ़ाता है तो भारत को एक तरफ चीन से हटता कारोबार मिल सकता है, लेकिन दूसरी तरफ भारतीय उद्योग के लिए चीन से आने वाले कंपोनेंट्स और इनपुट्स महंगे या अस्थिर हो सकते हैं। यही भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल है, कि क्या भारत चीन का विकल्प बनेगा या चीन पर निर्भर रहते हुए केवल उसकी सप्लाई चेन का अगला पड़ाव।
चीन का माल दूसरे बाजारों में बढ़ा सकता है दबावअमेरिकी बाजार में चीनी सामान पर प्रतिबंध बढ़ने का एक और असर भारत के घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। अमेरिका में बिक्री घटने पर चीन के निर्माता दूसरे बड़े बाजारों में ज्यादा आक्रामक तरीके से निर्यात कर सकते हैं। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार ऐसे में चीनी उत्पादों के लिए और आकर्षक हो सकता है। इससे उपभोक्ताओं को कुछ क्षेत्रों में कम कीमत का लाभ मिल सकता है, लेकिन भारतीय निर्माताओं के सामने प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। इसलिए अमेरिकी टैरिफ का भारत पर असर केवल अमेरिका को भारतीय निर्यात तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव भारत के घरेलू उद्योग और बाजार पर भी पड़ेगा।
अमेरिकी रिपोर्ट ने नई चिंता क्यों बढ़ाई13 अगस्त को जारी अमेरिकी रिपोर्ट ‘The Great Transshipment Scam’ ने इस पूरी कहानी में एक नया पहलू जोड़ दिया है। अमेरिकी प्रशासन ने भारत को उन प्रमुख देशों में रखा है जहां चीन से जुड़े सामान के जरिए अमेरिकी टैरिफ से बचने का जोखिम माना गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत, मैक्सिको और वियतनाम जैसे देशों के जरिए अमेरिकी बाजार तक करीब 67 अरब डॉलर के संभावित ट्रांसशिपमेंट का अनुमान लगाया गया है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट में भारत का अलग आंकड़ा नहीं दिया गया है और किसी भारतीय कंपनी या विशिष्ट शिपमेंट को अवैध नहीं बताया गया है। इसलिए भारत के लिए इस रिपोर्ट का तत्काल अर्थ कोई नया टैरिफ नहीं, बल्कि अमेरिकी सीमा शुल्क जांच का बढ़ता जोखिम है।
भारत के लिए अवसर को मजबूत करने की चुनौती
भारत को अगर अमेरिका-चीन व्यापार तनाव का वास्तविक लाभ उठाना है तो उसे केवल विदेशी कंपनियों को भारत बुलाने पर निर्भर नहीं रहना होगा। घरेलू कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक, कौशल, तकनीक और निर्यात मानकों को मजबूत करना होगा। भारत जितना ज्यादा महत्वपूर्ण कंपोनेंट और इंटरमीडिएट गुड्स का उत्पादन देश में करेगा, उतना ही वह चीन की सप्लाई चेन पर निर्भरता कम कर सकेगा। अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का अवसर दे रहा है। लेकिन यह अवसर तभी स्थायी लाभ में बदलेगा जब भारत चीन से आने वाले इनपुट्स पर निर्भरता घटाकर वास्तविक वैल्यू एडेड मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र बने।


