- दो दशक से नगर निगम पर भाजपा का कब्जा और ‘डबल इंजन’ का दम, फिर भी हर बारिश में तालाब बनता शहर
– चुनाव आए तो भाजपा विधायक को महसूस हुआ शहर का दर्द, मंत्री को ज्ञापन दे खुद खोली अपनी सरकार की पोल
– हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च होते है, पहली बारिश में ही सारा का सारा बह जाता - भारत 19
कानपुर। हर मानसून के साथ कानपुर में एक ही सवाल इतिहास की तरह दोहराया जाता है… आखिर शहर हर साल पानी में क्यों डूब जाता है? पिछले करीब दो दशकों से नगर निगम की कुर्सी पर भाजपा का कब्जा है और 2017 से प्रदेश व केंद्र दोनों जगह ‘डबल इंजन’ की सरकार हैं। बावजूद इसके कुछ घंटे की बारिश शहर तालाब बन जाता और सड़कें नहरें। ट्रैफिक थम जाता, जनजीवन बंधक बन जाता। अब नगर निगम ने ‘अर्बन फ्लड स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज मास्टर प्लान’ के नाम पर 10 करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या 2026 में भी शहर को यह पता लगाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ेंगे कि आखिर पानी जाता कहां है?
20 साल बाद जागा प्रशासन या लीपापोती का नया हथकंडा?
2006 से लगातार कानपुर की सत्ता एक ही दल के हाथों में है। इस दौरान केंद्र से लेकर राज्य तक सब तरफ अपने लोग थे, लेकिन शहर के लिए एक ‘ड्रेनेज मास्टर प्लान’ तक नहीं बन पाया। अब अचानक डिजिटल सर्वे, ऑनलाइन रिकॉर्ड और अगले 20 साल के सपनों का झुनझुना पकड़ाया जा रहा है। सवाल यह है—क्या पिछले 20 साल से नगर निगम के नुमाइंदे आंखें मूंदकर बैठे थे? क्या उन्हें यह भी नहीं पता था कि उनके अपने शहर के नाले कहां से गुजरते हैं?
हर साल सफाई पर करोड़ों खर्च, फिर जलभराव क्यों?
कागजों पर नाला सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं। बड़े-बड़े दावे और विज्ञप्तियां छपती हैं। लेकिन पहली ही बारिश उन दावों की पोल खोलकर रख देती है।
- अगर नाले साफ थे, तो पानी सड़कों पर क्यों उतरा?
– अगर सफाई नहीं हुई, तो करोड़ों रुपये गए कहां?
– क्या आज तक किसी भ्रष्ट अधिकारी या लापरवाह ठेकेदार पर कोई कार्रवाई हुई?
जनता इन सवालों के जवाब मांग-मांग कर थक चुकी है, लेकिन सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
अपनों ने ही खींची अपनी सरकार की टांग
विपक्ष तो सालों से चीख रहा था, लेकिन जब गोविंद नगर से भाजपा विधायक सुरेंद्र मैथानी को विधानसभा में अपनी ही सरकार के खिलाफ ज्ञापन देना पड़े, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है। विधायक ने खुद माना कि बारिश के बाद 8 से 10 घंटे तक शहर ठप रहता है, बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते और एंबुलेंस तक जाम में दम तोड़ती हैं। जब सत्तारूढ़ दल का विधायक ही नगर निगम और सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दे, तो इसे विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की पूर्ण और नग्न विफलता माना जाना चाहिए।
जनता का दो टूक सवाल—योजना नहीं, नतीजे चाहिए!
10 करोड़ का नया सर्वे सिर्फ फाइलों का पेट भरने का जरिया है या सच में कोई राहत मिलेगी? कानपुर की जनता अब झूठे आश्वासनों और घोषणाओं के झांसे में आने वाली नहीं है। 20 साल बाद यदि शहर को अपने ड्रेनेज सिस्टम का ककहरा पढ़ना पड़ रहा है, तो यह विकास नहीं, बल्कि दो दशकों की नाकामी का सबसे बड़ा कलंक है।
जिम्मेदार जनप्रतिनियों के अपने तर्क

मेयर प्रमिला पांडेय
मेयर प्रमिला पांडेय शहर में जलभराव की मुख्य वजह नालों पर अतिक्रमण को बताती है। उनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट भी इसको लेकर बेहद सख्त है, नगर निगम के अधिकारियों को कोर्ट के आदेश का पालन कराने को कहा गया है। मेयर का तर्क है कि बारिश होने के चार पांच घंटे के भीतर पानी निकल जाए तो उसे जलभराव नहीं माना जा सकता। पानी एक या दो दिन तक भरा रहता है तो उसको ही जलभराव कहा जा सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि प्रकृति के आगे सब बेबस हैं अगर तेज बारिश हो गई तो तुरंत पानी निकल जाए से तो संभव ही नहीं है।

विधायक सुरेंद्र मैथानी
भाजपा के गोविंद नगर विधानसभा सीट से विधायक सुरेंद्र मैथानी उनकी बात से इत्तेफाक नहीं रखते उनके मुताबिक बारिश होने के बाद कई घंटों तक शहर बंधक सा हो जाता है। सामान्य ट्रैफिक के साथ मरीजों को ले जा रहीं एबुंलेंस तक में जलभराव के कारण ब्रेक लग जाते। शहर के बदहाल ड्रेनेज सिस्टम के स्थायी सुधार के लिए नगर विकास मंत्री से उनके द्वारा गुजारिश की गई है और मंत्री की ओर से सकारात्मक जवाब भी दिया गया है।

विधायक अमिताभ बाजपेयी
नगर निगम चुनाव के समय नाला सफाई का मुद्दा उठाने और उसको लेकर मेयर के पुत्र पर सवाल खड़े करने वाले समाजवादी पार्टी के शहर की आर्यनगर सीट से विधायक अमिताभ बाजपेयी को नहीं लगता कि भाजपा शासित नगर निगम या प्रदेश सरकार शहर के ड्रेनेज सिस्टम को ठीक कर पाएगी। उनके मुताबिक सपा की सरकार बनने पर जलभराव के स्थायी समाधान के लिए ड्रेनेज सिस्टम को सीवरेज सिस्टम से बिल्कुल अलहदा किया जाएगा।


