- खाड़ी देशों पर निर्भरता घटी, लैटिन अमेरिकी देशों सहित अफ्रीका और रूस तक बढ़े वैकल्पिक स्रोत
- भारत 19 डेस्क
कानपुर। पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री जहाजों की आवाजाही पर बने खतरे ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को नए सिरे से गढ़ा है। भारतीय रिफाइनरियों ने अब केवल खाड़ी देशों के भरोसे रहने के बजाय अफ्रीका, रूस, वेनेजुएला और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों से कच्चे तेल की आपूर्ति तेज कर दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय तेल कंपनियों के लिए अब केवल ‘कीमत’ ही नहीं, बल्कि ‘सप्लाई सिक्योरिटी’ और ‘सुरक्षित समुद्री मार्ग’ भी क्रूड खरीद के मुख्य पैमाने बन गए हैं।
पश्चिमी अफ्रीका की ओर रणनीतिक रुख
होर्मुज संकट के दौरान भारत की सरकारी तेल कंपनियों की हालिया खरीदारी इस नई रणनीति का स्पष्ट प्रमाण है। इंडियन आयल (IOCL) ने अंगोला और कांगो जैसे पश्चिमी अफ्रीकी देशों से लगभग 40 लाख बैरल क्रूड आयल का सौदा किया। हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) ने अफ्रीकी क्रूड ग्रेड्स के कई अलग-अलग कार्गो खरीदे। पश्चिमी अफ्रीका से क्रूड आयल खरीद कर भारतीय रिफाइनरियों तक लाना सुरक्षित है, क्योंकि वहां से आने वाला क्रूड फारस की खाड़ी और होर्मुज के जोखिम भरे मार्ग से पूरी तरह मुक्त है।

खाड़ी से दूरी नहीं, बल्कि जोखिम का बंटवारा
भारत ने खाड़ी देशों से तेल का आयात बंद नहीं किया है। हाल ही में ओमान से 10 लाख बैरल क्रूड की खरीद इसका प्रमाण है। भारत खाड़ी देशों से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहा, बल्कि अपने जोखिम को बांट रहा है। अब भारत की ऊर्जा आपूर्ति खाड़ी देश, रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के एक संतुलित मिश्रित सप्लाई मॉडल पर आधारित हो रही है। संकट से पहले भारत अपनी जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और 90 प्रतिशत एलपीजी होर्मुज मार्ग से ही आयात करता था।
रूस और वेनेजुएला: बैकअप से मुख्य स्तंभ तक
‘अल-जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी में व्यवधान के दौरान वेनेजुएला भारत का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बनकर उभरा। रूस संकट के समय भारत के लिए सबसे मजबूत और निरंतर आपूर्ति का स्रोत बना हुआ है। एशियाई रिफाइनरियों में अब गैर-खाड़ी (Non-Gulf) क्रूड की मांग तेजी से बढ़ी है।
होर्मुज के साथ बाब-अल-मंदेब का खतरा
भारत के सामने चुनौती केवल होर्मुज तक सीमित नहीं है। लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में सुरक्षा जोखिम बढ़ने से आपूर्ति श्रृंखला पर दोहरी मार पड़ी है। बाब-अल-मंदेब से रोज़ाना करीब 60 लाख बैरल क्रूड की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अफ्रीकी महाद्वीप के पश्चिमी तट से आने वाला क्रूड भारत के लिए रणनीतिक रूप से सबसे सुरक्षित विकल्प बनकर उभरता है, भले ही इसके लिए लंबी समुद्री दूरी और अधिक मालभाड़ा चुकाना पड़े।
क्रूड खरीद का बदला गणित
पहले भारतीय रिफाइनरियों की प्राथमिकता केवल कम कीमत, गुणवत्ता और रिफाइनरी अनुकूलता हुआ करती थी। अब इसमें भू-राजनीतिक और समुद्री सुरक्षा जोखिम चौथा सबसे अहम फैक्टर बन चुका है। मिडिल ईस्ट भारत के सबसे करीब है और वहाँ से परिवहन लागत सबसे कम आती है, इसलिए खाड़ी देशों की जगह कोई और पूरी तरह नहीं ले सकता। लेकिन इस संकट ने भारत को यह सीख दी है कि ऊर्जा सुरक्षा का मतलब सिर्फ क्रूड खरीदना नहीं, बल्कि उसके सुरक्षित रास्ते और विविध स्रोत (Diverse Sources) तैयार रखना है।


