- इलेक्ट्रोलिसिस से अलग जैविक प्रक्रिया पर आधारित है कानपुर के संस्थान का शोध
- प्रयोगशाला सफलता के बाद अब प्रोटोटाइप और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर
- हाइड्रोजन के शुद्धिकरण, भंडारण और सुरक्षित इस्तेमाल का मॉडल विकसित करने की तैयारी
विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर।
कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा की दोहरी चुनौती के बीच कानपुर का डा. अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी फार दिव्यांगजन (एआईटीडी) हाइड्रोजन उत्पादन की एक वैकल्पिक तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संस्थान के बायोटेक्नोलाजी विभाग में किया गया शोध पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस से अलग जैविक प्रक्रिया पर आधारित है। प्रयोगशाला स्तर पर सफलता मिलने के बाद अब शोध को अगले चरण में ले जाने की तैयारी है।
बायोटेक्नोलाजी विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो. डा. मनीष सिंह राजपूत के नेतृत्व में यह शोध डार्क फर्मेंटेशन आधारित हाइड्रोजन उत्पादन पर केंद्रित है। शोध का उद्देश्य ऐसी प्रक्रिया विकसित करना है जिसमें जैविक अवशेषों में मौजूद जटिल कार्बनिक पदार्थों को सूक्ष्मजीवी गतिविधियों के जरिए तोड़कर हाइड्रोजन उत्पादन किया जा सके। इससे कचरे को केवल निस्तारण की समस्या के रूप में देखने के बजाय उसे ऊर्जा संसाधन में बदलने की दिशा में काम किया जा सकता है।
इलेक्ट्रोलिसिस से अलग क्यों है यह शोध
वर्तमान में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए इलेक्ट्रोलिसिस प्रमुख तकनीकों में शामिल है। इसमें पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने के लिए विद्युत ऊर्जा की जरूरत होती है। यदि यह बिजली नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होती है तो उत्पादित हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है। एआईटीडी का शोध इससे अलग रास्ता अपनाता है। इसमें हाइड्रोजन उत्पादन के लिए जैविक पदार्थों पर सूक्ष्मजीवों की गतिविधि का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि शोधकर्ताओं के लिए इस तकनीक की ऊर्जा खपत, उत्पादन दर और आर्थिक व्यवहार्यता का अध्ययन महत्वपूर्ण है। यदि इन मानकों पर तकनीक सफल रहती है तो यह उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकती है जहां जैविक कचरा और कृषि अवशेष स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

प्रोफेसर डा. मनीष राजपूत
शोध का अगला पड़ाव प्रोटोटाइप
प्रयोगशाला में सफल परीक्षण के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती इस प्रक्रिया को नियंत्रित और लगातार चलने वाले सिस्टम में बदलना है। इसी उद्देश्य से संस्थान प्रोटोटाइप विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसमें उत्पादन क्षमता, गैस की गुणवत्ता, प्रक्रिया की स्थिरता और अलग-अलग परिस्थितियों में हाइड्रोजन उत्पादन की दक्षता का परीक्षण किया जाएगा। शोध परियोजना का शीर्षक ‘सस्टेनेबल ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन वाया इंटीग्रेटेड डार्क फर्मेंटेशन आफ लिग्नोसेल्युलोजिक एग्रीकल्चरल रेजिड्यूज एंड फूड वेस्ट: ए सर्कुलर इकोनॉमी एप्रोच’ है। इसका व्यापक उद्देश्य कचरे से ऊर्जा उत्पादन को सर्कुलर इकोनॉमी के मॉडल से जोड़ना है, जिसमें अपशिष्ट को संसाधन के रूप में दोबारा अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल किया जा सके।

उत्पादन के साथ भंडारण भी बड़ी चुनौती
हाइड्रोजन तैयार करना पूरी प्रक्रिया का केवल एक हिस्सा है। इसके बाद गैस का शुद्धिकरण, सुरक्षित भंडारण, दबाव नियंत्रण और उपयोग के स्थान तक पहुंचाना भी जरूरी है। एआईटीडी ने अब उत्पादन के बाद हाइड्रोजन स्टोरेज मॉडल पर भी काम शुरू किया है। हाइड्रोजन का भंडारण सामान्य गैसों की तुलना में अधिक तकनीकी सावधानी मांगता है। इसलिए संस्थान का अगला चरण केवल यह देखना नहीं है कि हाइड्रोजन कितनी मात्रा में बन सकता है, बल्कि यह भी है कि उसे सुरक्षित और उपयोगी रूप में कितनी देर तक रखा जा सकता है।
असली कसौटी होगी लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन
शोधकर्ताओं के सामने अब सबसे अहम सवाल इसकी व्यावसायिक उपयोगिता का है। प्रयोगशाला स्तर पर किसी तकनीक की सफलता और बड़े पैमाने पर उसका आर्थिक रूप से सफल होना दो अलग-अलग चरण हैं। इसके लिए प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन उत्पादन की लागत, कच्चे माल की लगातार उपलब्धता, गैस की शुद्धता, उत्पादन की गति और संयंत्र संचालन की लागत का आकलन करना होगा। यदि इन सभी मानकों पर तकनीक खरी उतरती है तो भविष्य में मंडियों, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, कृषि क्षेत्रों और अन्य स्थानों पर जहां जैविक अवशेष बड़ी मात्रा में निकलते हैं, वहां विकेंद्रीकृत हाइड्रोजन उत्पादन इकाइयों की संभावना बन सकती है।
पराली प्रबंधन को भी मिल सकता है नया विकल्प
इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू कृषि अवशेषों को ऊर्जा उत्पादन से जोड़ना है। पराली के निस्तारण के लिए किसानों को हर साल अलग-अलग विकल्प तलाशने पड़ते हैं। यदि कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन की तकनीक आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनती है तो यह पराली को जलाने के बजाय उसके उपयोग का एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है। हालांकि इसे तत्काल पराली जलाने की समस्या का समाधान मानना जल्दबाजी होगी। इसके लिए बड़े पैमाने पर कच्चे माल के संग्रह, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण की पूरी श्रृंखला विकसित करनी होगी।
कचरे को संसाधन में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
एआईटीडी की निदेशक प्रो. रचना अस्थाना ने शोध को संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उनके मुताबिक स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली ऐसी तकनीकों पर शोध भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। प्रो. डॉ. मनीष राजपूत के मुताबिक शोध का लक्ष्य केवल प्रयोगशाला में हाइड्रोजन तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसी तकनीक विकसित करना है जिसे आगे चलकर व्यावहारिक मॉडल में बदला जा सके। इसके लिए उत्पादन से लेकर शुद्धिकरण और भंडारण तक पूरी प्रक्रिया को एकीकृत करने पर काम किया जा रहा है। फिलहाल एआईटीडी का शोध प्रयोगशाला से प्रोटोटाइप की ओर बढ़ रहा है। आने वाले चरणों में यह तय होगा कि कचरे से हाइड्रोजन बनाने का यह मॉडल वैज्ञानिक सफलता से आगे बढ़कर आर्थिक और व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी साबित होता है।


