- हूती कब्जे के बाद सऊदी ने ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन बंद की, लाल सागर के रास्ते पर संकट बढ़ने से भारत-चीन समेत यूरोप की ऊर्जा आपूर्ति और एशिया-यूरोप व्यापार पर मंडराया खतरा
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पश्चिम एशिया की जंग अब दुनिया की ऊर्जा और व्यापार की दो अहम धमनियों तक पहुंचती दिख रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से युद्ध की चपेट में है और अब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की बाब-अल-मंदेब में बढ़ती सक्रियता ने लाल सागर के रास्ते को भी खतरे में डाल दिया है। इसी बीच ड्रोन हमलों के बाद सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन का संचालन रोक दिया। दोनों घटनाक्रम एक साथ सामने आने से आशंका बढ़ी है कि संकट लंबा खिंचा तो तेल आपूर्ति के साथ एशिया-यूरोप का समुद्री व्यापार भी महंगा और मुश्किल हो सकता है।
पेरिम या मय्यून द्वीप बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बीच रणनीतिक स्थिति में है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और आगे स्वेज नहर के रास्ते यूरोप तक पहुंचने वाले समुद्री मार्ग की अहम कड़ी है। इस रास्ते से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के साथ बड़ी मात्रा में कंटेनर और अन्य सामान गुजरता है। ऐसे में यहां तनाव बढ़ने का असर केवल यमन या सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा।

सऊदी की पाइपलाइन बंद होने का बड़ा मतलब
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के तट पर स्थित यनबू से जोड़ती है। इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक खासियत यह है कि सऊदी अरब इसके जरिए अपने तेल को फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से बचाकर लाल सागर तक पहुंचा सकता है। यानी होर्मुज में संकट के बीच यह पाइपलाइन सऊदी के लिए वैकल्पिक तेल मार्ग का काम करती है। लेकिन ड्रोन हमलों के बाद इसके संचालन पर रोक और उसी समय बाब-अल-मंदेब में बढ़ता हूती दबाव एक बड़ी चिंता पैदा करता है। एक तरफ समुद्री रास्ता जोखिम में है और दूसरी तरफ वैकल्पिक पाइपलाइन भी प्रभावित हो रही है। यही स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाती है।
होर्मुज के बाद दूसरा ऊर्जा गलियारा निशाने पर
होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया से निकलने वाली ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री रास्ता है। ईरान युद्ध के कारण यहां तनाव बढ़ने से पहले ही कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही को लेकर बाजार में चिंता बनी हुई है। अब बाब-अल-मंदेब में भी अस्थिरता बढ़ती है तो ऊर्जा आपूर्ति के सामने दूसरा बड़ा समुद्री अवरोध खड़ा हो सकता है। दोनों रास्ते लंबे समय तक प्रभावित रहे तो तेल टैंकरों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं। इससे यात्रा की दूरी, ईंधन खपत, बीमा और माल ढुलाई लागत बढ़ेगी। यही वजह है कि बाब-अल-मंदेब का संकट केवल एक और सैन्य मोर्चा नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है।
लाल सागर का व्यापार रुका तो बढ़ेगी कीमत
बाब-अल-मंदेब में लंबे समय तक जहाजों की आवाजाही बाधित हुई तो सबसे सीधा असर लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते होने वाले व्यापार पर पड़ेगा। जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ सकता है। इस वैकल्पिक मार्ग से यात्रा में कई दिन बढ़ सकते हैं। ज्यादा ईंधन, चालक दल की लागत और बीमा खर्च के कारण माल ढुलाई महंगी होगी। कंटेनर की डिलीवरी में देरी से कंपनियों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। पहले भी लाल सागर में हूती हमलों के दौरान बड़ी संख्या में जहाजों ने स्वेज मार्ग से दूरी बनाई थी। अब यदि खतरा और बढ़ता है तो एशिया-यूरोप व्यापार पर एक बार फिर बड़ा दबाव बन सकता है।
भारत पर तेल और व्यापार का दोहरा असर
भारत के लिए बाब-अल-मंदेब संकट खास तौर पर महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में है और पश्चिम एशिया की ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी व्यवधान का असर उसकी खरीद लागत पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारतीय रिफाइनर कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर दूसरे देशों को निर्यात भी करते हैं। लाल सागर का रास्ता महंगा होने पर कच्चे तेल को भारत लाने और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों को यूरोप तक पहुंचाने—दोनों की लागत बढ़ सकती है। भारत के लिए रूसी तेल भी इस समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रूस से एशिया की ओर आने वाली कुछ तेल खेपें लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के रास्ते पहुंचती हैं। अगर यह रास्ता असुरक्षित हुआ तो वैकल्पिक लंबे मार्ग की जरूरत पड़ सकती है। इससे फ्रेट और बीमा लागत बढ़ने का असर भारतीय रिफाइनरों को मिलने वाले रूसी तेल के मूल्य लाभ पर पड़ सकता है।
चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर भी दबाव
चीन दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में है। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल की ढुलाई महंगी होने का असर उसकी रिफाइनिंग और औद्योगिक लागत पर पड़ सकता है। इसके अलावा एशिया-यूरोप कंटेनर रूट में व्यवधान से चीन से यूरोप जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और दूसरे तैयार सामान की लागत बढ़ सकती है। जापान और दक्षिण कोरिया भी ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं। समुद्री रास्ते लंबे होने और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। इस तरह बाब-अल-मंदेब का संकट सिर्फ तेल आयात करने वाले देशों का संकट नहीं होगा, बल्कि उन देशों के लिए भी चुनौती बनेगा जिनकी अर्थव्यवस्था एशिया-यूरोप के समुद्री व्यापार पर निर्भर है।
यूरोप को दोहरी महंगाई का खतरा
यूरोप पर इसका असर दो स्तरों पर पड़ सकता है। पहला, महंगा कच्चा तेल और ईंधन परिवहन तथा उद्योग की लागत बढ़ाएगा। दूसरा, एशिया से आने वाले सामान की समुद्री ढुलाई महंगी और धीमी हो सकती है। एशिया से यूरोप पहुंचने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और दूसरे उपभोक्ता सामान की लागत बढ़ने पर उसका असर कंपनियों से होते हुए उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। यानी तेल महंगा होने के साथ-साथ सामान भी महंगा और देर से पहुंच सकता है। यही संयोजन यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई का नया दबाव पैदा कर सकता है।
मिस्र की कमाई पर भी सीधी चोट
इस संकट से मिस्र भी प्रभावित हो सकता है। लाल सागर से स्वेज नहर होकर गुजरने वाले जहाजों की संख्या घटने पर नहर से मिलने वाला राजस्व कम होगा। यदि जहाज लंबा अफ्रीकी मार्ग चुनते हैं तो स्वेज नहर की उपयोगिता और उससे होने वाली कमाई दोनों पर असर पड़ सकता है। पहले लाल सागर संकट के दौरान स्वेज नहर के राजस्व में गिरावट इसका संकेत दे चुकी है।
रूसी तेल की राह भी हो सकती है महंगी
लाल सागर का संकट भारत और चीन के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से एशिया पहुंचने वाले तेल की कुछ खेपें इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरती हैं। यदि बाब-अल-मंदेब में जोखिम बढ़ता है तो इन जहाजों को लंबा रास्ता चुनना पड़ सकता है। इससे रूसी तेल की कीमत में नहीं, बल्कि उसकी ढुलाई की कुल लागत में बढ़ोतरी हो सकती है। भारत और चीन जैसे खरीदारों के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूसी तेल की प्रतिस्पर्धात्मक कीमत का एक हिस्सा उसकी अपेक्षाकृत कम परिवहन लागत से भी जुड़ा है।
BRICS के सामने भी बढ़ेगी चुनौती
घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन चल रहा है। ईरान युद्ध पहले ही समूह के सामने ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया को लेकर साझा रुख की चुनौती खड़ी कर चुका है। अब बाब-अल-मंदेब और लाल सागर का संकट चर्चा को और व्यापक कर सकता है। भारत को एक तरफ सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी है, वहीं रूस और ईरान जैसे साझेदारों के साथ संबंध तथा अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक हितों के बीच संतुलन भी साधना है।
तेल संकट से आगे बढ़ सकता है असर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इसका असर केवल कच्चे तेल की कीमत तक सीमित न रहे। तेल महंगा होगा तो परिवहन लागत बढ़ेगी। समुद्री मार्ग लंबा होगा तो माल ढुलाई और बीमा महंगे होंगे। आपूर्ति में देरी होगी तो कंपनियों की लागत बढ़ेगी और इसका असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।


