- आराधना मिश्रा से ब्राह्मण आधार, इमरान मसूद से मुस्लिम पहुंच; निषाद-दलित नेतृत्व के जरिए ओबीसी-दलित विस्तार की तैयारी, 2027 में संगठन की परीक्षा और 2029 के लिए उसी ढांचे को राष्ट्रीय राजनीति में इस्तेमाल करने का संकेत
भारत 19/राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश कांग्रेस में हुआ नेतृत्व परिवर्तन सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने तक सीमित नहीं दिखता। पार्टी ने तीन बार की रामपुर खास विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष और सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को नए सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के साथ खड़ा करने का संकेत दिया है। देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाए जाने से नई टीम में ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व का समीकरण भी सामने आया है।
कांग्रेस की यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव उसके संगठन की अगली बड़ी परीक्षा होगा। इसके बाद 2029 का लोकसभा चुनाव आएगा, जहां उत्तर प्रदेश की भूमिका राष्ट्रीय सत्ता के समीकरणों में महत्वपूर्ण रहेगी। पार्टी की मौजूदा नियुक्तियों को इसी लंबी अवधि की संगठनात्मक तैयारी के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि 2029 को लेकर पार्टी की ओर से कोई औपचारिक रणनीति इन नियुक्तियों के साथ घोषित नहीं की गई है।
आराधना मिश्रा के साथ प्रमोद तिवारी की राजनीतिक विरासत
आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाना कांग्रेस के लिए केवल महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का फैसला नहीं है। वह प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार विधायक हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता रही हैं। उनके पिता प्रमोद तिवारी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं और रामपुर खास से नौ बार विधायक रह चुके हैं।
रामपुर खास में तिवारी परिवार की लंबी चुनावी मौजूदगी ने आराधना मिश्रा को जमीनी राजनीति का अनुभव दिया है। विधानसभा चुनावों में लगातार जीत और कांग्रेस संगठन में सक्रिय भूमिका ने उन्हें प्रदेश नेतृत्व के लिए पार्टी के भीतर स्थापित चेहरा बनाया। अब प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका विधानसभा क्षेत्र की राजनीति से निकलकर पूरे उत्तर प्रदेश में संगठन को सक्रिय करने की होगी।
उनकी नियुक्ति का एक राजनीतिक संदेश ब्राह्मण प्रतिनिधित्व से भी जोड़ा जा रहा है। कांग्रेस के पुराने सामाजिक आधार में ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन पिछले दशकों में इस समुदाय का बड़ा हिस्सा दूसरे राजनीतिक दलों की ओर गया। नई नियुक्ति को लेकर राजनीतिक विश्लेषण में इसी पुराने आधार तक दोबारा पहुंच बनाने की चर्चा है।
इमरान मसूद के जरिए पश्चिमी यूपी पर नजर
सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से कांग्रेस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने राजनीतिक आधार को संगठन के केंद्र में जगह दी है। मसूद 2024 में सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए थे। उनकी राजनीतिक सक्रियता लंबे समय से सहारनपुर और आसपास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रही है।
मसूद की नियुक्ति को मुस्लिम प्रतिनिधित्व के साथ-साथ पश्चिमी यूपी में संगठनात्मक पहुंच बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस ने नई टीम में ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व को पार्टी की व्यापक सामाजिक पहुंच से जोड़कर देखा है।
मसूद की पहचान अपने मुखर भाषण और अलग संवाद शैली के लिए भी रही है। राजनीतिक मंचों पर शायरी और काव्यात्मक अंदाज में अपनी बात रखने की उनकी शैली उन्हें पार्टी के दूसरे नेताओं से अलग पहचान देती है। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल उन्हें पद देने की नहीं, बल्कि उनकी क्षेत्रीय सक्रियता को प्रदेश संगठन के विस्तार में बदलने की भी होगी।
ब्राह्मण-मुस्लिम के साथ ओबीसी-दलित विस्तार
नई टीम में देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाए जाने से सामाजिक प्रतिनिधित्व का दायरा और व्यापक होता है। राजनीतिक विश्लेषण में देवेंद्र निषाद को ओबीसी और आलोक प्रसाद को दलित प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा जा रहा है। इस तरह प्रदेश संगठन में शीर्ष स्तर पर अलग-अलग सामाजिक समूहों की मौजूदगी दिखाई देती है।
यहां कांग्रेस के लिए असली चुनौती प्रतिनिधित्व से आगे की है। अलग-अलग समुदायों के नेताओं को संगठन में जगह मिलना और उन समुदायों के बीच पार्टी का जमीनी नेटवर्क दो अलग बातें हैं। 2027 के चुनाव से पहले पार्टी को जिला, विधानसभा और बूथ स्तर पर इस नई टीम की राजनीतिक पहुंच को संगठनात्मक ताकत में बदलना होगा।
यही वजह है कि नई नियुक्तियों को केवल जातीय समीकरण के रूप में देखना अधूरा होगा। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण नेतृत्व, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम नेतृत्व और ओबीसी-दलित प्रतिनिधित्व के साथ क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है।
पुराने कांग्रेस सामाजिक आधार को जोड़ने की कोशिश!
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पुराना सामाजिक आधार लंबे समय तक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समर्थन के व्यापक गठजोड़ से जुड़ा रहा। मंडल राजनीति, भाजपा के विस्तार और क्षेत्रीय दलों के उभार के साथ यह आधार अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंटता गया। ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर गया, मुस्लिम मतदाता मुख्य रूप से सपा के साथ जुड़ा और दलित राजनीति में बसपा का प्रभाव मजबूत हुआ।
नई टीम को इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखने पर आराधना मिश्रा और इमरान मसूद दो प्रमुख सामाजिक समूहों तक कांग्रेस की पहुंच के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं, जबकि देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद के जरिए ओबीसी और दलित वर्गों तक विस्तार का संकेत मिलता है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी नियुक्तियों को ब्राह्मण-मुस्लिम-ओबीसी-दलित संतुलन के संदर्भ में देखा है।
हालांकि इसे कांग्रेस की घोषित जातीय चुनावी रणनीति कहना अभी जल्दबाजी होगी। पार्टी नेतृत्व ने संगठन को मजबूत करने और चुनावी तैयारी पर जोर दिया है। इसलिए नियुक्तियों से निकलने वाले राजनीतिक संकेत और कांग्रेस की औपचारिक चुनावी रणनीति को अलग-अलग देखना जरूरी है।
2027 की परीक्षा, 2029 की बड़ी तस्वीर
नई टीम के सामने तत्काल चुनौती 2027 विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस को संगठन के पुनर्निर्माण के साथ उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व, बूथ प्रबंधन और गठबंधन की राजनीति पर काम करना होगा। इमरान मसूद पहले ही समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखते रहे हैं। आराधना मिश्रा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ कांग्रेस ने चौधरी वीरेंद्र सिंह को उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल का नया नेता भी नियुक्त किया है। इससे संगठन और विधानसभा में पार्टी के नेतृत्व की भूमिकाएं अलग हो गई हैं।
यही बदलाव 2027 के बाद 2029 की राजनीति से भी जुड़ता है। विधानसभा चुनाव में संगठन का प्रदर्शन यह बताएगा कि पार्टी अपनी नई सामाजिक और क्षेत्रीय संरचना को कितनी मजबूती से जमीन तक ले जा पाती है। लोकसभा चुनाव में वही नेटवर्क कांग्रेस के लिए संसदीय सीटों पर संगठनात्मक आधार बन सकता है। इस लिहाज से आराधना मिश्रा की राजनीतिक विरासत, इमरान मसूद की पश्चिमी यूपी में मौजूदगी और देवेंद्र निषाद तथा आलोक प्रसाद के जरिए व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व को एक ही टीम में रखना कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्गठन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिलहाल इस प्रयोग का चुनावी परिणाम बताना संभव नहीं है। लेकिन नई नियुक्तियां यह संकेत जरूर देती हैं कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चेहरों के साथ संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय पहुंच को एक साथ पुनर्गठित करने की कोशिश कर रही है। 2027 इस रणनीति की पहली बड़ी जमीनी परीक्षा होगी और 2029 के लिए यही संगठन कितना उपयोगी साबित होता है, यह उसके बाद की राजनीति तय करेगी।


