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UP में बने 131 जन्म प्रमाणपत्रों से देशभर में फर्जी आधार का शक

  • यूपी के 21 जिलों से जुड़े प्रमाणपत्रों के सत्यापन में जुटी सीबीआई, कन्नौज के 73 समेत 131 दस्तावेज जांच के घेरे में, पश्चिम बंगाल और असम में इनके आधार पर पहचान दस्तावेज बनने की जानकारी से बढ़ी चिंता

भारत 19/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जारी बताए जा रहे 131 जन्म प्रमाणपत्रों ने देशभर में आधार से जुड़ी पहचान व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन प्रमाणपत्रों के आधार पर अलग-अलग राज्यों में आधार बनाए जाने की जानकारी सामने आने के बाद सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के संबंधित अधिकारियों से इनके सत्यापन की रिपोर्ट मांगी है। जांच का मकसद यह पता लगाना है कि ये प्रमाणपत्र वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड में जारी हुए थे या इनके जरिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। मामले में यूपी के 21 जिलों से जुड़े प्रमाणपत्र जांच के दायरे में हैं। 

कन्नौज के 73 प्रमाणपत्र सबसे ज्यादा

जांच सूची में कन्नौज के 73 प्रमाणपत्र हैं। इसके बाद इटावा के 17 और ललितपुर के 10 प्रमाणपत्र शामिल हैं। बागपत के पांच, कानपुर नगर के तीन, फतेहपुर के तीन और हमीरपुर के तीन प्रमाणपत्र भी सूची में हैं। बिजनौर, जालौन और सोनभद्र के दो-दो तथा सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद, औरैया, कुशीनगर, बदायूं, संत कबीरनगर, मिर्जापुर, कानपुर देहात, रामपुर और फर्रुखाबाद के एक-एक प्रमाणपत्र का सत्यापन कराया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल और असम तक पहुंचा मामला

जांच में इन प्रमाणपत्रों के आधार पर पश्चिम बंगाल और असम समेत दूसरे राज्यों में आधार बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। यही पहलू मामले को स्थानीय दस्तावेजी गड़बड़ी से आगे ले जाता है। अगर सत्यापन में प्रमाणपत्र फर्जी या रिकॉर्ड से छेड़छाड़ कर बनाए गए पाए जाते हैं, तो जांच का अगला चरण यह पता लगाना होगा कि इनका इस्तेमाल कितने आधार और दूसरे सरकारी पहचान दस्तावेज हासिल करने में हुआ।

सीबीआई अब तीन स्तर पर करेगी सत्यापन

जांच में सबसे पहले यह देखा जाएगा कि सूची में शामिल जन्म प्रमाणपत्र संबंधित जिले से वास्तव में जारी हुए थे या नहीं। इसके बाद प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि और पते का मूल सरकारी रिकॉर्ड से मिलान किया जाएगा। इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में किसी अधिकारी, कर्मचारी, ऑपरेटर या अन्य व्यक्ति की भूमिका तो नहीं थी। जिलों से मांगी गई रिपोर्ट इसी पूरी कड़ी को समझने में अहम होगी। रिपोर्ट 15 अक्टूबर तक भेजे जाने की बात सामने आई है।

एक दस्तावेज से पूरी पहचान बदलने का खतरा

मामले की गंभीरता इस बात में है कि जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज का इस्तेमाल व्यक्ति की पहचान और जन्म संबंधी जानकारी स्थापित करने के लिए किया जाता है। यदि किसी गलत या कूटरचित रिकॉर्ड को वैध सरकारी दस्तावेज के रूप में स्वीकार कर लिया जाए तो उसके आधार पर आगे दूसरे पहचान दस्तावेज हासिल करने की गुंजाइश बन जाती है। यही वजह है कि जांच अब केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहेगी कि 131 प्रमाणपत्र सही हैं या गलत, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि इनसे आगे कौन-कौन से दस्तावेज तैयार हुए और उनका इस्तेमाल कहां किया गया।

यूपी में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

उत्तर प्रदेश में फर्जी जन्म प्रमाणपत्र और पहचान दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोह पहले भी सामने आते रहे हैं। दिसंबर 2025 में शाहजहांपुर पुलिस ने ऐसे ही एक मामले में दो लोगों की गिरफ्तारी की थी। पुलिस के मुताबिक उनके पास से लैपटॉप, प्रिंटर, फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैनर, वेबकैम तथा कूटरचित आधार और जन्म प्रमाणपत्र बरामद किए गए थे। 2026 में यूपी एटीएस ने भी एक अलग मामले में फर्जी दस्तावेजों के जरिए आधार तैयार कराने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क की जांच की थी। हालांकि मौजूदा 131 प्रमाणपत्रों की जांच को इन पुराने मामलों से जोड़ने वाला कोई आधिकारिक प्रमाण फिलहाल सामने नहीं आया है।

131 प्रमाणपत्रों से आगे कितनी बड़ी है कड़ी

अब जांच की सबसे अहम कड़ी यह होगी कि संबंधित जिलों के मूल रिकॉर्ड क्या बताते हैं। अगर बड़ी संख्या में प्रमाणपत्र सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं मिले या उनमें गंभीर विसंगतियां सामने आईं तो मामला केवल दस्तावेजी फर्जीवाड़े तक सीमित नहीं रहेगा। इसके बाद एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि इन प्रमाणपत्रों के आधार पर कितने आधार बनाए गए, किन राज्यों में इस्तेमाल हुए और पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे। फिलहाल 131 प्रमाणपत्र जांच का शुरुआती बिंदु हैं, इनके सत्यापन से ही पूरे मामले के आकार और वास्तविक स्वरूप की तस्वीर साफ होगी।

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