- 2026 में चौथी बार ब्रेंट ने पार किया 100 डॉलर का स्तर, हॉर्मुज और खाड़ी में जहाजों पर हमलों से सप्लाई का जोखिम बढ़ा, कतर के पास टैंकर पर प्रोजेक्टाइल से हमला, महंगे तेल से भारत के आयात बिल और रुपये पर दबाव की आशंका
भारत 19 डेस्क। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खाड़ी के समुद्री मार्गों पर जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता के बीच कच्चे तेल की कीमत फिर 100 डॉलर के पार पहुंच गई। गुरुवार को ब्रेंट 101.53 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी कच्चे तेल का बेंचमार्क WTI (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) 89.39 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। बाजार में तेजी की प्रमुख वजह हॉर्मुज क्षेत्र में तेल की आवाजाही बाधित होने की आशंका और समुद्री परिवहन पर बढ़ता जोखिम है।
2026 में चौथी बार 100 डॉलर का स्तर पार
यह इस साल ब्रेंट के 100 डॉलर पार करने का पहला मौका नहीं है। मार्च में पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद ब्रेंट 2022 के बाद पहली बार इस स्तर से ऊपर गया था। इसके बाद जुलाई और सितंबर में भी कीमत 100 डॉलर के पार पहुंची। अब अक्टूबर में फिर यह मनोवैज्ञानिक स्तर टूट गया है। यानी 2026 में चौथी बार ब्रेंट 100 डॉलर के ऊपर पहुंचा है। इससे साफ है कि मौजूदा तेजी किसी एक दिन के कारोबार का असर नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम लगातार कच्चे तेल के बाजार को प्रभावित कर रहे हैं।
कतर के पास टैंकर पर हमला बढ़ा समुद्री जोखिम
तेल बाजार की चिंता उस समय और बढ़ गई जब कतर के उत्तरी तट के पास एक टैंकर को कई प्रोजेक्टाइल से निशाना बनाए जाने की सूचना सामने आई। ब्रिटेन की UK Maritime Trade Operations ने घटना की जानकारी दी। हमले में हताहतों की खबर भी सामने आई, हालांकि जिम्मेदार पक्ष और घटना के सभी विवरणों की तत्काल स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में है। युद्ध से पहले इस रास्ते से वैश्विक तेल और ईंधन आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत गुजरता था। इसलिए यहां किसी बड़े व्यवधान का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ सकता है।
भारत पर सबसे पहले बढ़ेगा आयात बिल का दबाव
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88.7 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर देश को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। महंगे तेल से आयात बिल और व्यापार घाटा बढ़ सकता है। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर भी दबाव बन सकता है। यही वजह है कि कच्चे तेल की तेजी को भारत के लिए सिर्फ ऊर्जा बाजार की खबर नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक जोखिम माना जाता है।
पेट्रोल-डीजल से महंगाई तक पहुंच सकता है असर
महंगे कच्चे तेल का असर पेट्रोल और डीजल के अलावा माल ढुलाई, परिवहन, विमानन और पेट्रोकेमिकल उद्योग पर भी पड़ सकता है। इन क्षेत्रों की लागत बढ़ने पर उसका असर दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पहुंच सकता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम में उसी अनुपात में तत्काल बढ़ोतरी नहीं है। रुपये की विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों के मार्जिन भी खुदरा कीमतों को प्रभावित करते हैं।
भारत की नजर सप्लाई और वैकल्पिक स्रोतों पर
पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत सरकार तेल की उपलब्धता और भंडार पर नजर रख रही है। भारतीय तेल कंपनियां अलग-अलग स्रोतों से कच्चा तेल खरीदती हैं और कुछ आपूर्ति ऐसे मार्गों से भी आती है जो हॉर्मुज पर निर्भर नहीं हैं। इससे समुद्री मार्ग में अस्थायी व्यवधान की स्थिति में तत्काल कमी का जोखिम कुछ कम किया जा सकता है।


