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वैवाहिक विवाद में POCSO गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा

  • माता-पिता या साथ रहने वाले परिजन पर आरोप होने पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं; बच्चे का विशेषज्ञ से मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराने के बाद आगे बढ़ेगी जांच

भारत 19
नई दिल्ली।
वैवाहिक विवाद और बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े कुछ POCSO मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर अहम सुरक्षा उपाय तय किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि यदि बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा हो और POCSO का आरोप बच्चे के माता-पिता या उसके साथ उसी घर में रहने वाले किसी परिवार के सदस्य पर लगा हो, तो केवल आरोप या एफआईआर के आधार पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में बच्चे का बाल मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराने के बाद ही गिरफ्तारी की जरूरत पर विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि इन सुरक्षा उपायों का उद्देश्य POCSO की गंभीरता कम करना नहीं, बल्कि जांच को तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर आगे बढ़ाना है।

हर POCSO मामले पर लागू नहीं होंगे नए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था सभी POCSO मामलों के लिए नहीं बनाई है। इसके लिए खास परिस्थितियां जरूरी हैं। पहला, आरोपी बच्चे का माता-पिता या उसके साथ उसी घर में रहने वाला परिवार का सदस्य हो। दूसरा, बच्चे के माता-पिता के बीच किसी तरह का वैवाहिक विवाद मौजूद हो। यह विवाद अदालत में लंबित होना जरूरी नहीं है। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद बच्चे पर दबाव डाल सकता है और आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी हो जाती है।

गिरफ्तारी से पहले विशेषज्ञ करेगा बच्चे का मूल्यांकन

ऐसी स्थिति सामने आने पर जांच अधिकारी को बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ की मदद लेनी होगी। विशेषज्ञ बच्चे का स्वतंत्र मूल्यांकन करेगा और उसकी रिपोर्ट जांच का हिस्सा बनेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक इस मूल्यांकन का उद्देश्य यह समझना है कि बच्चे के बयान या आरोप पर किसी तरह का बाहरी प्रभाव, दबाव या दूसरे अभिभावक की ओर से प्रभावित किए जाने की संभावना तो नहीं है। इसके बाद ही जांच अधिकारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 के तहत गिरफ्तारी के लिए जरूरी आधार पर विचार करेगा।

सिर्फ एफआईआर दर्ज होने से गिरफ्तारी नहीं होगी

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज होना अपने आप गिरफ्तारी का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। पुलिस को उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की पूरी परिस्थितियों को देखकर यह तय करना होगा कि गिरफ्तारी वास्तव में जरूरी है या नहीं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को गिरफ्तारी से स्थायी छूट मिल गई है। यदि जांच में पर्याप्त और ठोस सामग्री सामने आती है तथा कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो गिरफ्तारी की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट का जोर तुरंत या स्वचालित गिरफ्तारी से बचने और जांच को सावधानी से आगे बढ़ाने पर है।

विशेषज्ञ की राय को अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा

बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन विशेषज्ञ की रिपोर्ट को अकेले मामले का अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। जांच अधिकारी को अन्य उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल रिपोर्ट, बयान और परिस्थितियों को भी देखना होगा। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ मूल्यांकन को जांच में सहायता देने वाला उपाय माना है, न कि पुलिस या अदालत के विवेक का विकल्प।

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO की गंभीरता पर भी जोर दिया

अदालत ने साफ किया कि इन सुरक्षा उपायों का मतलब POCSO कानून को कमजोर करना नहीं है। बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला यह कानून अपनी पूरी गंभीरता के साथ लागू रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि माता-पिता के बीच चल रहे विवाद में बच्चे को कानूनी लड़ाई का हिस्सा बना देने से उसके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए अदालत ने वास्तविक यौन अपराधों की जांच और संभावित गलत इस्तेमाल, दोनों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत बताई।

बच्चे की कस्टडी का फैसला भी सिर्फ POCSO केस से नहीं

अदालत ने बच्चे की अभिरक्षा यानी कस्टडी से जुड़े विवाद पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। केवल इस आधार पर कि किसी माता-पिता के खिलाफ POCSO की एफआईआर दर्ज हो गई है, उसकी कस्टडी या अभिभावक होने के दावे पर स्वतः प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। कस्टडी का फैसला बच्चे के सर्वोत्तम हित और मामले में उपलब्ध पूरी सामग्री के आधार पर किया जाना होगा। यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैवाहिक विवाद में POCSO मामला दर्ज होने का असर समानांतर कस्टडी विवाद पर भी पड़ सकता है।

जिस मामले से जुड़े हैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट का फैसला ‘आर’ बनाम ‘ई’ मामले से जुड़ा है। यह लंबे समय से चल रहे वैवाहिक और बच्चे की कस्टडी विवाद का मामला था। विवाद के दौरान पिता के खिलाफ अपनी नाबालिग बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाते हुए POCSO के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपने और विशेषज्ञों को जांच में शामिल करने के निर्देश दिए थे। बाद में अदालत के सामने सीबीआई की जांच रिपोर्ट आई। फैसले में अदालत ने पूरे घटनाक्रम और बच्चे पर पड़ रहे प्रभाव को विस्तार से देखा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 24 सितंबर 2026 को ‘Rajeev Giri vs Ekta Singh’ मामले का फैसला सूचीबद्ध है।

अदालत ने बच्चे को माता-पिता के विवाद से बचाने पर जोर दिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब माता-पिता के बीच विवाद इतना बढ़ जाए कि बच्चे को यौन शोषण के आरोपों और कानूनी लड़ाई के बीच खड़ा कर दिया जाए, तो उसका सीधा असर बच्चे और माता-पिता के रिश्ते पर पड़ सकता है। अदालत ने इसी संदर्भ में जांच प्रक्रिया को संवेदनशील बनाने पर जोर दिया है, ताकि बच्चे से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष तरीके से जांच हो और उसे बार-बार कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के कारण अतिरिक्त मानसिक दबाव का सामना न करना पड़े।

सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था का मतलब क्या है

साफ तौर पर देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामलों में गिरफ्तारी पर सामान्य रोक नहीं लगाई है। नई सुरक्षा व्यवस्था केवल उन विशेष मामलों के लिए है, जिनमें आरोपी माता-पिता या उसी घर में रहने वाला परिवार का सदस्य है और बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद मौजूद है। ऐसे मामलों में पुलिस को जल्दबाजी में गिरफ्तारी करने के बजाय पहले विशेषज्ञ मूल्यांकन और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ना होगा। वहीं यदि जांच में अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी। अदालत का निर्देश POCSO की सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखते हुए जांच और गिरफ्तारी की प्रक्रिया में अतिरिक्त सावधानी बरतने पर केंद्रित है।

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