- राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी 14 अक्टूबर को थामेंगे भाजपा का दामन, गौरीगंज में चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी और गोसाईंगंज में खब्बू तिवारी के सामने बढ़ सकती है टिकट की चुनौती, 2027 से पहले सामाजिक संतुलन साधने की परीक्षा
भारत 19/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायकों की भाजपा में प्रस्तावित एंट्री ने अवध से बुंदेलखंड तक नए सियासी समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। गौरीगंज के राकेश प्रताप सिंह, गोसाईंगंज के अभय सिंह और कालपी के विनोद चतुर्वेदी 14 अक्टूबर को भाजपा की सदस्यता लेने जा रहे हैं। तीनों ने 2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा से अलग रुख अपनाते हुए भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। अब उनकी औपचारिक ज्वाइनिंग के साथ सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा उन्हें उनकी मौजूदा विधानसभा सीटों से 2027 के चुनाव में उतारेगी? ऐसा हुआ तो कुछ सीटों पर पहले से दावेदारी कर रहे नेताओं के साथ तालमेल बिठाना पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।
14 अक्टूबर को अमेठी में सदस्यता कार्यक्रम
सपा से बगावत करने वाले तीनों विधायक 14 अक्टूबर को अमेठी में भाजपा में शामिल होंगे। रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी में सदस्यता कार्यक्रम होगा। राकेश प्रताप सिंह ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भाजपा में शामिल होने की घोषणा की है। अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी ने भी इस तारीख की पुष्टि की है। तीनों नेताओं के राजनीतिक सफर और विधानसभा क्षेत्रों को देखते हुए इस कदम का असर सिर्फ पार्टी बदलने तक सीमित नहीं है। भाजपा के सामने नए नेताओं को संगठन में समायोजित करने के साथ स्थानीय स्तर पर पहले से सक्रिय नेताओं की दावेदारी का ध्यान रखने की चुनौती भी रहेगी।
गौरीगंज में राकेश प्रताप सिंह बनाम चंद्र प्रकाश मिश्र
अमेठी की गौरीगंज सीट से राकेश प्रताप सिंह लगातार तीन बार विधायक चुने गए हैं। अब तक वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़ते रहे हैं। यदि भाजपा उन्हें 2027 में इसी सीट से उम्मीदवार बनाती है, तो पार्टी के पूर्व प्रत्याशी चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी की दावेदारी अहम हो जाएगी। मटियारी 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि पार्टी में शामिल होने भर से किसी को टिकट नहीं मिल जाता और वह भी अपनी उम्मीदवारी की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि टिकट का फैसला पार्टी और संगठन को करना है। इस बयान से स्पष्ट है कि गौरीगंज में टिकट को लेकर फैसला आसान नहीं होगा, हालांकि अभी भाजपा ने उम्मीदवारों पर कोई अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया है।
गोसाईंगंज में अभय सिंह और खब्बू तिवारी का समीकरण
अयोध्या जिले की गोसाईंगंज सीट पर भी संभावित टिकट को लेकर चर्चा है। यहां अभय सिंह का मुकाबला पहले भाजपा नेता इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी से रहा है। 2017 में खब्बू तिवारी ने अभय सिंह को हराया था, जबकि 2022 में अभय सिंह सपा के टिकट पर चुनाव जीत गए थे। अभय सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद सवाल है कि पार्टी उन्हें इसी सीट से चुनाव लड़ाएगी या कोई दूसरा विकल्प तलाशेगी। अगर उन्हें गोसाईंगंज से टिकट मिलता है, तो खब्बू तिवारी की राजनीतिक भूमिका और दावेदारी पर भी चर्चा होगी। दोनों नेताओं की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण यह सीट ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण के संदर्भ में भी देखी जा रही है। लेकिन टिकट को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
कालपी में विनोद चतुर्वेदी के सामने अलग समीकरण
जालौन जिले की कालपी सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी की भाजपा में एंट्री का स्थानीय समीकरण भी अलग है। चतुर्वेदी पहले कांग्रेस में रहे और बाद में सपा में शामिल हुए। 2022 में उन्होंने कालपी सीट पर निषाद पार्टी के प्रत्याशी छोटे सिंह को 2,816 मतों से हराया था। छोटे सिंह भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार थे। अब चतुर्वेदी के भाजपा में आने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी उन्हें किस तरह समायोजित करती है। कालपी में पुराने दावेदारों और स्थानीय संगठन के साथ तालमेल बैठाना भी रणनीति का हिस्सा होगा। हालांकि, यहां भी 2027 के लिए टिकट पर कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
भाजपा के सामने जातीय संतुलन की चुनौती
तीनों विधायकों की प्रस्तावित एंट्री के बाद सबसे अधिक चर्चा गौरीगंज और गोसाईंगंज की है, जहां नए नेताओं की दावेदारी और पुराने प्रत्याशियों की राजनीतिक जमीन के बीच संतुलन साधना पड़ सकता है। राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह ठाकुर समुदाय से आते हैं, जबकि इन सीटों पर भाजपा के पुराने दावेदारों में ब्राह्मण चेहरे भी रहे हैं। ऐसे में पार्टी के सामने दो स्तरों पर चुनौती हो सकती है। पहला, नए नेताओं को संगठन में जगह देना और दूसरा, पुराने दावेदारों तथा उनके समर्थकों की नाराजगी की आशंका को संभालना। यदि टिकट को लेकर असंतोष उभरता है, तो उसका असर स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी भाजपा में किसी व्यापक ठाकुर-ब्राह्मण टकराव की आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इसलिए इसे तय संघर्ष के बजाय संभावित राजनीतिक चुनौती के रूप में देखना उचित होगा।
2027 से पहले दल-बदल और टिकट की राजनीति
तीनों विधायकों की भाजपा में प्रस्तावित एंट्री राज्यसभा चुनाव के दौरान हुई क्रॉस वोटिंग के बाद बढ़ी नजदीकी का अगला कदम है। भाजपा पहले भी सपा से बगावत करने वाले विधायक मनोज पांडेय को अपनी सरकार में मंत्री बना चुकी है। अब राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी की जॉइनिंग से पार्टी के सामने नए चेहरों को जगह देने और पुराने नेताओं की दावेदारी के बीच संतुलन बनाने का सवाल खड़ा होगा।
फिलहाल तीनों नेताओं का भाजपा में शामिल होना प्रस्तावित है, लेकिन 2027 में उनकी उम्मीदवारी और सीटों को लेकर स्थिति साफ नहीं है। ऐसे में 14 अक्टूबर का कार्यक्रम केवल दल-बदल की औपचारिकता नहीं, बल्कि अवध और बुंदेलखंड की कुछ अहम सीटों पर भाजपा के आगामी राजनीतिक समीकरणों को समझने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा।


