- सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता दोहराई; किसी एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, सैन्य प्रमुखों ने खुफिया साझेदारी और रक्षा समन्वय बढ़ाने पर दिया जोर
भारत 19 डेस्क
सऊदी अरब पर यमन के हूती हमलों के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अब सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। समझौते के तीनों सदस्य—सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये—ने सऊदी की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई है। 25 सितंबर को न्यूयॉर्क में तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद 26 सितंबर को रियाद में तीनों देशों के सैन्य प्रमुख भी मिले। उन्होंने खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, सैन्य समन्वय और रक्षा क्षमताओं के एकीकरण को मजबूत करने पर चर्चा की। सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय और पाकिस्तान की सेना की ओर से जारी विवरण में बैठक को समझौते की प्रतिबद्धताओं को प्रभावी सैन्य सहयोग में बदलने की दिशा में कदम बताया गया है।
मक्का समझौते की सबसे बड़ी शर्त क्या है
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। सऊदी सरकार के आधिकारिक राष्ट्रीय पोर्टल के मुताबिक, समझौते का उद्देश्य तीनों देशों की सामूहिक सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना तथा रक्षा सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों को आगे बढ़ाना है। Reuters ने समझौते की रिपोर्ट में भी इसकी इस प्रमुख शर्त की पुष्टि की थी, हालांकि उसने यह भी बताया था कि समझौते के तहत वास्तविक सैन्य जिम्मेदारियों का पूरा ढांचा अभी स्पष्ट नहीं किया गया है।
सऊदी पर हमलों के बीच क्यों सक्रिय हुआ समझौता
मक्का समझौते के सक्रिय होने का घटनाक्रम सऊदी अरब पर बढ़े हमलों के बीच सामने आया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार, हूती हमलों में मक्का सहित नागरिक और आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिशें हुई हैं। 25 सितंबर को न्यूयॉर्क में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का और सऊदी अरब के नागरिक एवं आर्थिक ढांचे को निशाना बनाने वाले हमलों की निंदा की। तुर्किये के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के मुताबिक, तीनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार की पुष्टि भी की।
सैन्य प्रमुखों ने रियाद में क्या किया फैसला
25 सितंबर की राजनीतिक बैठक के बाद 26 सितंबर को तीनों देशों के सैन्य प्रमुख रियाद में एक साथ बैठे। पाकिस्तान के सरकारी रेडियो के अनुसार, बैठक में सऊदी अरब के सामने मौजूद सुरक्षा खतरों की समीक्षा की गई और मक्का तथा सऊदी नागरिक एवं आर्थिक बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा की गई। बैठक में खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, सैन्य समन्वय और सैन्य क्षमताओं के एकीकरण को बढ़ाने पर चर्चा हुई। तीनों सैन्य प्रमुखों ने सामूहिक रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराते हुए सऊदी की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का संकल्प जताया।
पाकिस्तान और तुर्किये से सऊदी को कितनी मदद मिलेगी
यही इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण अगला सवाल है। अभी तक सार्वजनिक बयानों में पाकिस्तान या तुर्किये की ओर से किसी निश्चित संख्या में सैनिक भेजने या सीधे युद्ध में शामिल होने की घोषणा नहीं हुई है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने पहले कहा था कि उनका देश मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब की सैन्य जरूरतों में मदद करेगा। Reuters के अनुसार, तुर्किये ने तकनीकी सैन्य जरूरतों में सहायता की तत्परता जताई है, जबकि पाकिस्तान ने भी सऊदी की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। Al Jazeera की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देश सऊदी को समर्थन के लिए आगे बढ़े हैं, लेकिन उनकी सैन्य भागीदारी की सीमा को लेकर अभी सावधानी बरती जा रही है।
पाकिस्तान ने सऊदी की रक्षा पर क्या कहा
पाकिस्तान पहले ही सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक कर चुका है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि मक्का और मदीना पर हमला लाल रेखा होगा। Al Jazeera के मुताबिक, उन्होंने सऊदी अरब की सुरक्षा को पाकिस्तान के लिए विशेष महत्व वाला मुद्दा बताया। हालांकि, पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को सीधे सैन्य हस्तक्षेप की घोषणा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पाकिस्तान ने रक्षा प्रतिबद्धता तो दोहराई है, लेकिन किसी विशेष सैन्य अभियान या तैनाती की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है।
तुर्किये ने समझौते को लेकर क्या कहा
तुर्किये ने भी सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने का संकेत दिया है। 25 सितंबर की बैठक में तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का समझौते के तहत महासचिवालय, समितियों और कार्य समूहों के गठन की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की। तुर्किये के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तीनों देश अंतरराष्ट्रीय कानून, राज्यों की संप्रभुता, अच्छे पड़ोसी संबंध और समुद्री आवाजाही की सुरक्षा पर भी जोर दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने क्षेत्रीय संकटों के शांतिपूर्ण समाधान और तनाव कम करने की कोशिशों का समर्थन किया।
मक्का समझौता बना तो क्या बदला
7 अगस्त को हुए समझौते ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच पहले से मौजूद रक्षा संबंधों को एक औपचारिक सामूहिक रक्षा ढांचे में बदल दिया। सऊदी अरब के आधिकारिक बयान के मुताबिक, इसका लक्ष्य सामूहिक प्रतिरोध क्षमता बढ़ाना और तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी क्षेत्रों को मजबूत करना है। इस समझौते को लेकर Reuters ने इसे तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में रिपोर्ट किया था। हालांकि, समझौते की वास्तविक सैन्य प्रतिक्रिया किस तरह होगी, इसके कई विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हैं।
क्या मक्का समझौता नाटो जैसा सैन्य गठबंधन है
मक्का समझौते की तुलना कई विश्लेषणों में नाटो की सामूहिक रक्षा व्यवस्था से की जा रही है, लेकिन दोनों को पूरी तरह समान मानना जल्दबाजी होगी। मक्का समझौते में हमले को सभी के खिलाफ हमला मानने की स्पष्ट व्यवस्था है, लेकिन नाटो जैसी विस्तृत संस्थागत सैन्य संरचना और स्वचालित सैन्य प्रतिक्रिया का पूरा ढांचा सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। Reuters ने भी समझौते के तहत वास्तविक जिम्मेदारियों के कई पहलुओं के अस्पष्ट होने की ओर ध्यान दिलाया है। इसलिए फिलहाल इसे तीन देशों के बीच सामूहिक रक्षा और प्रतिरोध का नया ढांचा कहना अधिक सटीक है।
मिस्र भी सऊदी के साथ, लेकिन समझौते में नहीं
सऊदी अरब को लेकर समर्थन केवल मक्का समझौते के तीन सदस्य देशों तक सीमित नहीं है। 22 सितंबर को तुर्किये, मिस्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान में सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया था। Reuters के अनुसार, चारों देशों ने क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री आवाजाही बनाए रखने और विवादों के समाधान के लिए बातचीत एवं कूटनीति पर जोर दिया। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है कि मिस्र मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का सदस्य नहीं है। समझौते के मूल हस्ताक्षरकर्ता केवल सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये हैं।
समझौते में ईरान को लेकर क्या संदेश
मक्का समझौते को लेकर तुर्किये ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसे किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। Reuters के अनुसार, तुर्किये की संसद के अध्यक्ष ने 25 सितंबर को कहा कि यह रक्षा समझौता आगे चलकर व्यापक मुस्लिम देशों की सुरक्षा व्यवस्था का आधार बन सकता है और इसमें ईरान के शामिल होने की संभावना की भी चर्चा हुई। हालांकि, यह भविष्य की राजनीतिक संभावना है, मौजूदा समझौते की सदस्यता नहीं। वर्तमान में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ही सदस्य हैं।
हूती हमलों ने समझौते की पहली परीक्षा बढ़ाई
मक्का समझौते के सामने पहली बड़ी व्यावहारिक चुनौती यमन के हूती हमलों के रूप में सामने आई है। सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच अब समझौते की सामूहिक रक्षा व्यवस्था को लेकर वास्तविक परीक्षण की स्थिति बनी है। Al Jazeera के अनुसार, पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य भागीदारी को लेकर अभी भी सावधानी बरती जा रही है। दोनों देशों ने सऊदी की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन उनकी प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं किया गया है।
अब तीनों देशों के सैन्य समन्वय पर नजर
रियाद में हुई सैन्य प्रमुखों की बैठक से मक्का समझौते को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर सामने आया है। तीनों देशों ने खुफिया साझेदारी, सैन्य समन्वय और रक्षा क्षमताओं के एकीकरण को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह सहयोग सिर्फ संयुक्त सुरक्षा समन्वय और प्रतिरोध तक सीमित रहता है या सऊदी पर हमलों की स्थिति में वास्तविक सैन्य सहायता तक पहुंचता है। फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक बयानों में सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता स्पष्ट है, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप की विस्तृत कार्ययोजना सार्वजनिक नहीं की गई है।
मक्का समझौते का अगला बड़ा पड़ाव क्या
मक्का समझौते के तहत महासचिवालय, समितियों और कार्य समूहों को सक्रिय करने की प्रक्रिया चल रही है। विदेश मंत्रियों ने इन संस्थागत व्यवस्थाओं की प्रगति की समीक्षा की है और सैन्य प्रमुखों की बैठक के जरिए रक्षा सहयोग को व्यावहारिक रूप देने की शुरुआत हुई है। ऐसे में सऊदी पर जारी हमले इस समझौते के लिए पहला बड़ा परीक्षण बन गए हैं। पाकिस्तान और तुर्किये किस स्तर पर सऊदी को सैन्य समर्थन देते हैं, तीनों देशों के बीच खुफिया एवं रक्षा समन्वय कितना बढ़ता है और क्षेत्रीय संकट किस दिशा में जाता है कि इन्हीं सवालों से मक्का समझौते की वास्तविक भूमिका तय होगी।


