- दूसरी छमाही में 23 साप्ताहिक नीलामियां, पूरे वित्त वर्ष की उधारी 15.99 लाख करोड़; बॉन्ड यील्ड 7.1% के पार, जानिए बाजार और आम आदमी पर क्या होगा असर
भारत 19 डेस्क
केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही यानी अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के बीच बाजार से 7.86 लाख करोड़ रुपये जुटाएगी। इसके लिए सरकारी बॉन्ड और अन्य दिनांकित प्रतिभूतियों की बिक्री की जाएगी। वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ विचार-विमर्श के बाद दूसरी छमाही का उधारी कैलेंडर जारी किया है। Reuters के अनुसार सरकार ने दूसरी छमाही की सकल बाजार उधारी को पहले के अनुमान की तुलना में कम रखा है। इसका उद्देश्य सरकारी बॉन्ड बाजार में आपूर्ति का दबाव सीमित करने और उधारी लागत को नियंत्रित रखने में मदद करना है।
पूरे वित्त वर्ष की उधारी 15.99 लाख करोड़ रुपये
सरकार की यह उधारी ऐसे समय हो रही है जब 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.1 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। यील्ड बढ़ने का असर सरकारी उधारी की लागत के साथ-साथ बाजार में ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव आगे चलकर होम लोन, वाहन ऋण और कंपनियों के कर्ज की लागत पर भी पड़ सकता है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में केंद्र सरकार ने 17.20 लाख करोड़ रुपये की सकल बाजार उधारी का अनुमान रखा था। बाद में ऋण प्रबंधन के उपायों के चलते इसमें संशोधन किया गया। अब पूरे वित्त वर्ष की सकल बाजार उधारी करीब 15.995 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यानी बजट अनुमान की तुलना में करीब 1.20 लाख करोड़ रुपये की कमी की गई है। सरकार अप्रैल से सितंबर के दौरान करीब 8.13 लाख करोड़ रुपये की बाजार उधारी कर चुकी है। दूसरी छमाही में 7.86 लाख करोड़ रुपये जुटाने के बाद वित्त वर्ष की कुल सकल बाजार उधारी करीब 16 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच जाएगी।
23 साप्ताहिक नीलामियों में जुटाई जाएगी रकम
दूसरी छमाही की 7.86 लाख करोड़ रुपये की उधारी 23 साप्ताहिक नीलामियों के जरिए की जाएगी। औसतन प्रत्येक नीलामी में करीब 34,000 करोड़ रुपये की प्रतिभूतियां जारी होंगी, हालांकि वास्तविक राशि अलग-अलग नीलामी में बदल सकती है। सरकार तीन साल से लेकर 50 साल तक की अवधि वाले बॉन्ड जारी करेगी। इनमें 10 साल की अवधि वाले बॉन्ड का हिस्सा सबसे ज्यादा रहेगा।
लंबी अवधि के बॉन्ड पर सरकार का ज्यादा जोर
दूसरी छमाही के उधारी कार्यक्रम में सरकार ने लंबी अवधि वाली प्रतिभूतियों का हिस्सा बढ़ाया है। 15, 30, 40 और 50 साल की अवधि वाले बॉन्ड मिलाकर दूसरी छमाही की उधारी में इनका हिस्सा करीब 45.6 प्रतिशत रहेगा। लंबी अवधि के बॉन्ड का हिस्सा बढ़ाने से सरकार अपने कर्ज की औसत परिपक्वता अवधि बढ़ा सकती है। इससे पुराने कर्ज को बार-बार नए कर्ज से बदलने की जरूरत और उससे जुड़े जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
10 साल के बॉन्ड की यील्ड 7.1 प्रतिशत के पार
उधारी का यह कार्यक्रम ऐसे समय आया है जब सरकारी बॉन्ड बाजार में यील्ड ऊंची बनी हुई है। 25 सितंबर को भारत की 10 साल की बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 7.12 प्रतिशत पर रही। Reuters के मुताबिक इसमें लगातार छठे सप्ताह साप्ताहिक आधार पर बढ़ोतरी दर्ज हुई। बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब सरकार के लिए बाजार से पैसा जुटाने की लागत बढ़ना है। बड़ी मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियां बाजार में आने पर यदि मांग उसके अनुपात में कमजोर रहती है तो बॉन्ड की कीमत और यील्ड पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार ने दूसरी छमाही की सकल उधारी कम करके बाजार में नई प्रतिभूतियों की आपूर्ति का दबाव कुछ कम करने की कोशिश की है।
15 हजार करोड़ रुपये के ग्रीन बॉन्ड भी आएंगे
दूसरी छमाही में केंद्र सरकार करीब 15,000 करोड़ रुपये के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जारी करेगी। पहली छमाही के 15,000 करोड़ रुपये को मिलाकर वित्त वर्ष 2026-27 में ग्रीन बॉन्ड के जरिए कुल उधारी करीब 30,000 करोड़ रुपये हो सकती है। इन बॉन्ड से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल सरकार की तय हरित और पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं में किया जाता है।
ट्रेजरी बिल से भी जारी रहेगी अल्पकालिक उधारी
अक्टूबर से दिसंबर के बीच सरकार हर सप्ताह करीब 23,000 करोड़ रुपये के ट्रेजरी बिल जारी करने की योजना में है। यह पहली छमाही में जारी किए गए करीब 24,000 करोड़ रुपये के साप्ताहिक ट्रेजरी बिल से थोड़ा कम है। ट्रेजरी बिल सरकार की अल्पकालिक उधारी का साधन हैं, जबकि सरकारी बॉन्ड आम तौर पर लंबी अवधि के लिए जारी किए जाते हैं।
7.86 लाख करोड़ को पूरा नया कर्ज समझना गलत
7.86 लाख करोड़ रुपये को सीधे सरकार का नया खर्च या अतिरिक्त कर्ज समझना सही नहीं होगा। यह सकल बाजार उधारी है, जिसमें पुराने कर्ज की अदायगी और ऋण प्रबंधन से जुड़ी जरूरतें भी शामिल होती हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने करीब 11.73 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध बाजार उधारी का अनुमान रखा था। इसलिए सकल और शुद्ध उधारी के आंकड़ों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
बाजार और आम आदमी पर क्या हो सकता है असर
सरकारी बाजार उधारी का असर सीधे तौर पर आम लोगों पर नया कर्ज डालने के रूप में नहीं पड़ता। इसका प्रभाव मुख्य रूप से बॉन्ड बाजार और ब्याज दरों के रास्ते अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। अगर सरकारी बॉन्ड की यील्ड ऊंची बनी रहती है तो बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों की धन जुटाने की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आगे चलकर होम लोन, वाहन ऋण और कॉरपोरेट कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। हालांकि इन दरों पर असर केवल सरकारी बॉन्ड यील्ड से तय नहीं होता। दूसरी ओर, बजट अनुमान की तुलना में सरकार की सकल बाजार उधारी कम होने से सरकारी प्रतिभूतियों की नई आपूर्ति का दबाव सीमित हो सकता है। इसका असर बॉन्ड बाजार की मांग और यील्ड के रुख पर निर्भर करेगा।
राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत रखने का लक्ष्य
वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में सरकार के सामने विकास और सार्वजनिक खर्च के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने के साथ उधारी और ब्याज लागत को नियंत्रित रखने की चुनौती है। दूसरी छमाही के उधारी कार्यक्रम में रकम घटाने और लंबी अवधि के बॉन्ड पर जोर को इसी ऋण प्रबंधन रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
क्या है पूरी तस्वीर
केंद्र सरकार अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के बीच 7.86 लाख करोड़ रुपये बाजार से जुटाएगी। इसके साथ वित्त वर्ष 2026-27 की कुल सकल बाजार उधारी करीब 15.99 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। सरकार ने बजट में तय 17.20 लाख करोड़ रुपये के शुरुआती अनुमान की तुलना में उधारी घटाई है। दूसरी ओर, सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.1 प्रतिशत से ऊपर रहने के कारण बाजार के लिए उधारी की लागत महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में सरकार का फोकस केवल रकम जुटाने पर नहीं, बल्कि कम उधारी, लंबी अवधि के बॉन्ड और संतुलित ऋण प्रबंधन पर भी है।


