- 2007 में 206 सीट और 30.43% वोट से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा 2012 में 80, 2017 में 19 और 2022 में महज एक सीट पर पहुंची; वोट शेयर भी 30.43% से घटकर 12.88% रह गया
भारत 19
राजीव सक्सेना, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी सत्ता के केंद्र में रही बहुजन समाज पार्टी का चुनावी सफर पिछले डेढ़ दशक में पूरी तरह बदल गया है। 2007 में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा 2022 में सिर्फ एक विधानसभा सीट तक सिमट गई। इसी अवधि में पार्टी का वोट शेयर भी 30.43 प्रतिशत से घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया। यानी बसपा के सामने चुनौती केवल सीटें वापस हासिल करने की नहीं, बल्कि अपने बिखरते चुनावी आधार को फिर से प्रभावी राजनीतिक ताकत में बदलने की भी है।
2007 में बसपा ने रचा था सत्ता का इतिहास
2007 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए उसके राजनीतिक विस्तार का चरम था। पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 206 सीटों पर जीत दर्ज की। उसे 30.43 प्रतिशत वोट मिले और वह पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही। 403 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 202 सीटें जरूरी थीं, जबकि बसपा ने इससे चार सीट ज्यादा हासिल की थीं। यह प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि बसपा ने अपने सामाजिक आधार को व्यापक राजनीतिक समर्थन में बदलते हुए अकेले सरकार बनाने लायक संख्या हासिल की थी। 2007 के बाद पार्टी की चुनावी दिशा लगातार बदलती गई और अगले विधानसभा चुनाव में ही उसकी सीटों में भारी गिरावट दिखाई दी।
सत्ता गई तो 2012 में 80 सीटों पर पहुंची
2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हो गई। पार्टी ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ा और 80 सीटें जीतीं। उसका वोट शेयर भी 2007 के 30.43 प्रतिशत से घटकर करीब 25.9 प्रतिशत रह गया। यानी वोट प्रतिशत में लगभग 4.5 प्रतिशत अंक की कमी के साथ पार्टी की सीट संख्या 206 से घटकर 80 रह गई। हालांकि 80 सीटों के साथ बसपा विधानसभा में एक बड़ी विपक्षी ताकत बनी रही। लेकिन 2007 के मुकाबले यह बदलाव इस बात का शुरुआती संकेत था कि पार्टी के व्यापक वोट आधार को सीटों में बदलने की क्षमता कमजोर पड़ने लगी थी।
2017 में वोट बचा रहा, सीटें सिर्फ 19
2017 का चुनाव बसपा के लिए एक और बड़ा झटका लेकर आया। पार्टी को 22.23 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसकी सीटें घटकर केवल 19 रह गईं। यानी 2012 की तुलना में वोट शेयर में गिरावट अपेक्षाकृत सीमित रही, लेकिन सीटों की संख्या में 61 सीटों की कमी हो गई। यहीं से बसपा के चुनावी प्रदर्शन में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देने लगा—वोट प्रतिशत और सीटों के बीच दूरी बढ़ती गई। पार्टी को प्रदेशभर में पर्याप्त वोट मिल रहे थे, लेकिन वे वोट पर्याप्त विधानसभा क्षेत्रों में जीत में तब्दील नहीं हो पा रहे थे।
2022 में वोट 12.88 प्रतिशत, सीट सिर्फ एक
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन उसके पिछले चुनावों की तुलना में और कमजोर हुआ। पार्टी ने सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन केवल एक सीट जीत सकी। उसका वोट शेयर 12.88 प्रतिशत रहा। पार्टी की एकमात्र जीत बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट पर हुई। यानी 2007 में 206 सीटें जीतने वाली पार्टी 15 साल बाद एक विधायक तक पहुंच गई। दिलचस्प पहलू यह है कि वोट शेयर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। 12.88 प्रतिशत वोट के बावजूद बसपा की सीट संख्या एक रही। इससे उसके सामने वोटों के राज्यव्यापी वितरण और उन्हें सीटों में बदलने की चुनौती स्पष्ट होती है।
2007 से 2022 तक लगातार गिरता गया वोट
बसपा के चार विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन को साथ रखकर देखें तो गिरावट का क्रम साफ दिखाई देता है। 2007 में पार्टी को 30.43 प्रतिशत वोट के साथ 206 सीटें मिली थीं। 2012 में वोट शेयर 25.91 प्रतिशत और सीटें 80 रह गईं। 2017 में वोट शेयर 22.23 प्रतिशत और सीटें 19 हो गईं। 2022 में वोट शेयर 12.88 प्रतिशत तक पहुंचा और पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी। इन आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2022 के बीच बसपा के वोट शेयर में 17.55 प्रतिशत अंक की कमी आई। सीटों के लिहाज से गिरावट इससे भी बड़ी रही। 206 से एक सीट तक पहुंचने का मतलब है कि पार्टी ने 205 विधानसभा सीटें गंवाईं। इस पूरे दौर में किसी भी विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़ा नहीं।
वोट आधार रहा, लेकिन सीटों में नहीं बदला
बसपा के 2022 के प्रदर्शन का सबसे अहम पहलू यही है कि पार्टी पूरी तरह वोटविहीन नहीं हुई थी। उसे 12.88 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन यह समर्थन केवल एक विधानसभा क्षेत्र में जीत दिला सका। 2017 में भी करीब 22 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद पार्टी सिर्फ 19 सीट जीत सकी थी। इससे बसपा के चुनावी प्रदर्शन को केवल वोट प्रतिशत के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती वोटों के भौगोलिक वितरण और विधानसभा क्षेत्रों में उनकी एकाग्रता की है। किसी पार्टी को राज्यव्यापी वोट मिलने के बावजूद यदि वह पर्याप्त सीटों पर दूसरे या पहले स्थान की स्थिति नहीं बना पाती, तो उसका विधानसभा प्रतिनिधित्व सीमित रह सकता है।
संगठन और जमीनी सक्रियता पर भी सवाल
बसपा की राजनीतिक पहचान लंबे समय तक मजबूत संगठन और काडर आधारित चुनावी ढांचे से जुड़ी रही है। पार्टी ने लंबे समय तक बड़े स्तर के चुनावी अभियानों के बजाय बूथ और सामाजिक संपर्क के नेटवर्क पर भरोसा किया। लेकिन 2022 में एक सीट तक सिमटने के बाद संगठन की सक्रियता और जमीनी उपस्थिति को लेकर राजनीतिक विश्लेषण में सवाल उठे। 2022 के चुनाव के दौरान मायावती की चुनावी गतिविधियां भी अन्य प्रमुख नेताओं की तुलना में काफी सीमित रही थीं। हालांकि संगठन की कमजोरी को बसपा के चुनावी प्रदर्शन का अकेला कारण मानना उचित नहीं होगा। चुनावी मुकाबले में विपक्षी वोटों का बंटवारा, रणनीतिक मतदान, उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और सामाजिक गठबंधन जैसे कई कारक सीटों के नतीजे को प्रभावित करते हैं।
2027 से पहले सामाजिक आधार की चुनौती
बसपा के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने परंपरागत सामाजिक आधार को बनाए रखने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक समर्थन हासिल करने की चुनौती है। 2007 में पार्टी का सामाजिक गठबंधन इतना व्यापक था कि वह 30 प्रतिशत से अधिक वोट लेकर बहुमत तक पहुंच गई। बाद के चुनावों में यह समर्थन कमजोर होता गया। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच भाजपा की बढ़ती पहुंच और सपा की दलित मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश को भी बसपा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है। इसलिए 2027 की तैयारी में बसपा के सामने केवल पिछली सीट संख्या बढ़ाने का सवाल नहीं है। उसे यह भी देखना होगा कि उसका वोट किन सामाजिक समूहों और किन विधानसभा क्षेत्रों में केंद्रित है और वहां उसे दोबारा प्रतिस्पर्धी स्थिति में लाने के लिए किस तरह का संगठनात्मक अभियान चलाया जाए।
सत्ता से विपक्ष और फिर विधानसभा में हाशिया
बसपा का 2007 से 2022 तक का सफर तीन अलग-अलग चरणों में देखा जा सकता है। 2007 में वह पूर्ण बहुमत वाली सरकार में थी। 2012 में सत्ता से बाहर होने के बावजूद 80 विधायकों के साथ विधानसभा में बड़ी ताकत रही। 2017 में यह संख्या 19 पर पहुंची और 2022 में केवल एक विधायक रह गया। इस तरह बसपा का चुनावी सफर 206 से 80, फिर 19 और आखिर में एक सीट तक पहुंचा। यह केवल सत्ता गंवाने की कहानी नहीं है, बल्कि विधानसभा में लगातार घटते प्रतिनिधित्व की भी तस्वीर है।
2027 में वापसी की असली परीक्षा क्या होगी
2027 का चुनाव बसपा के लिए अपने पिछले चुनावी प्रदर्शन को बदलने की कोशिश का अगला बड़ा अवसर होगा। लेकिन 2007 के प्रदर्शन को दोहराने के लिए केवल वोट प्रतिशत बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को अपने मतदाताओं को अधिक विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी चुनावी समर्थन में बदलना होगा। इसके लिए संगठन की सक्रियता, बूथ स्तर का नेटवर्क, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता महत्वपूर्ण कारक होंगे। साथ ही 2027 तक गठबंधन और प्रदेश के राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं, इसलिए 2022 के आंकड़ों को अगले चुनाव का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता।
