- 10 फीसदी से ज्यादा बूथों पर अध्यक्ष निष्क्रिय मिले, विधानसभा चुनाव से पहले सत्यापन में सामने आई स्थिति; सक्रिय कार्यकर्ताओं को साथ जोड़ने की तैयारी
भारत 19
कानपुर। विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता परखी तो कई मंडलों में बड़ी संख्या में बूथ अध्यक्ष निष्क्रिय मिले। करीब छह माह पहले बूथों की जांच के बाद दो से चार सितंबर तक कराए गए दोबारा सत्यापन में 10 फीसदी से ज्यादा बूथों पर अध्यक्ष निष्क्रिय पाए गए। पार्टी अब इन्हें हटाने के बजाय उनके साथ एक-एक सहयोगी जोड़ने की तैयारी में है। इस व्यवस्था के जरिए मौजूदा अध्यक्षों को साथ रखते हुए बूथ का काम सक्रिय कार्यकर्ताओं के जरिए आगे बढ़ाने की कवायद है।
विधानसभा चुनाव से पहले बूथों का दोबारा सत्यापन
भाजपा अपने चुनावी अभियानों को बूथ स्तर की संगठनात्मक व्यवस्था के आधार पर आगे बढ़ाती है। विधानसभा चुनाव करीब आने के चलते पार्टी ने दो से चार सितंबर तक सभी बूथों का दोबारा सत्यापन कराने की तैयारी की थी। उद्देश्य था कि चुनाव से काफी पहले बूथों की स्थिति स्पष्ट हो जाए और जहां बदलाव या अतिरिक्त व्यवस्था की जरूरत हो, वहां समय रहते फैसला लिया जा सके। इसके लिए मंडल स्तर पर मंडल अध्यक्ष और एक-एक प्रवासी को बूथों के सत्यापन की जिम्मेदारी दी गई। तीन दिन चले अभियान में सामने आया कि कई मंडलों में 10 प्रतिशत या इससे ज्यादा बूथ अध्यक्ष निष्क्रिय हैं।
आर्थिक और पारिवारिक व्यस्तता भी बनी वजह
पार्टी के अंदर बूथ अध्यक्षों की सक्रियता कम होने के पीछे उनकी रोजी-रोटी और पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी एक वजह माना जा रहा है। पार्टी में बूथ अध्यक्षों की बड़ी संख्या ठेला, रेहड़ी लगाने और दैनिक स्तर पर कमाने-खाने वाले लोगों की है। परिवार का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी के चलते इनमें से कई संगठन को अपेक्षित समय नहीं दे पा रहे हैं। हालांकि, सत्यापन के लिए लगाए गए मंडल अध्यक्षों और प्रवासियों को निष्क्रिय बूथ अध्यक्षों को हटाने का अधिकार नहीं दिया गया। पार्टी ने इसके बजाय वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने का रास्ता चुना है।
निष्क्रिय अध्यक्ष के साथ जुड़ेगा सक्रिय सहयोगी
जिन बूथों पर अध्यक्ष निष्क्रिय पाए गए हैं, वहां किसी अन्य व्यक्ति को सामने लाकर उसे मौजूदा बूथ अध्यक्ष के सहयोगी के रूप में जोड़ने के लिए कहा गया है। मंडल स्तर पर सत्यापन के बाद इसकी रिपोर्ट जिला कमेटी को दी जाएगी। इसके बाद रिपोर्ट प्रदेश संगठन को भेजी जाएगी। प्रदेश स्तर पर रिपोर्ट की समीक्षा के बाद तय होगा कि किन बूथों पर सहयोगी लगाने की जरूरत है। यदि प्रदेश संगठन को लगता है कि मौजूदा बूथ अध्यक्ष सक्रिय होकर संगठन का काम संभाल सकता है तो उसी से काम कराया जाएगा। जरूरत महसूस होने पर उसके साथ सहयोगी लगाया जाएगा।
सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने पर सवाल
पार्टी नेताओं के मुताबिक निष्क्रिय बूथ अध्यक्ष के साथ सहयोगी लगाने का फॉर्मूला संगठन का काम चलाने के लिहाज से व्यावहारिक है, लेकिन इससे सक्रिय कार्यकर्ताओं के मनोबल को लेकर सवाल भी हैं। नेताओं का कहना है कि जो कार्यकर्ता संगठन के लिए लगातार बेहतर काम कर रहा है, उसे आगे लाकर बूथ की जिम्मेदारी देने के बजाय केवल सहयोगी बनाना उचित नहीं होगा। उनका मानना है कि सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी और आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला तो संगठन में उनका मनोबल प्रभावित हो सकता है। अब प्रदेश संगठन की रिपोर्ट पर होने वाले फैसले से तय होगा कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा बूथ स्तर पर अपनी टीम को किस रूप में अंतिम रूप देती है।


