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यूपी में भाजपा 2027 के टिकट में करेगी 2024 का हिसाब

  • कानपुर-बुंदेलखंड में 52 में 31 विधानसभा सीटों पर लोकसभा चुनाव में पिछड़ी भाजपा, इनमें 21 सीटों पर उसके विधायक; जनाधार, जातीय समीकरण और प्रदर्शन बन सकते हैं टिकट के पैमाने

कानपुर। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा अब 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन का हिसाब लगाने की तैयारी में है। कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्रीय कमेटी में बड़े फेरबदल के बाद विधानसभा टिकटों को लेकर पार्टी के मौजूदा विधायकों की बेचैनी बढ़ गई है। संगठन में कई पुराने चेहरों की जगह नए और दूसरे स्तर से सक्रिय नेताओं को जिम्मेदारी दिए जाने को आने वाले विधानसभा चुनाव में संभावित बदलावों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि 2027 में टिकट का आधार केवल मौजूदा विधायक की जीत नहीं, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके विधानसभा क्षेत्र का प्रदर्शन, व्यक्तिगत जनाधार और जातीय समीकरण भी हो सकता है। यानी जिस विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा कमजोर पड़ी, वहां पार्टी नए विकल्प तलाश सकती है।

52 में 31 सीटों पर पिछड़ी थी भाजपा

कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में विधानसभा की कुल 52 सीटें हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इनमें 47 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में उसकी सीटें घटकर 40 रह गईं। 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति और चुनौतीपूर्ण रही। पार्टी 52 में 31 विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रतिद्वंद्वी से पीछे रही, जबकि इनमें 21 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा के विधायक पहले से मौजूद हैं। यही आंकड़ा अब 2027 के टिकट की समीक्षा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के स्तर पर तैयार हुई चुनावी समीक्षा में यह भी सामने आया कि कुछ विधायकों ने लोकसभा चुनाव में उतनी सक्रियता नहीं दिखाई, जितनी उन्होंने अपने विधानसभा चुनाव में दिखाई थी। ऐसे में 2024 का प्रदर्शन उनके लिए टिकट की अगली कसौटी बन सकता है।

2022 में हारी सीटों पर नए चेहरे की तलाश

भाजपा के सामने दूसरा बड़ा सवाल 2022 में गंवाई गई विधानसभा सीटों को वापस हासिल करने का है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक इन सीटों पर मजबूत जनाधार वाले नए चेहरों की तलाश की जा सकती है। इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में जिन विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी पिछड़ी, वहां भी मौजूदा विधायक के प्रदर्शन और संगठन में उसकी पकड़ की समीक्षा संभव है। इस लिहाज से क्षेत्रीय कमेटी का मौजूदा फेरबदल भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कमेटी में बड़ी संख्या में नए चेहरों को जगह देकर पार्टी ने संगठन में बदलाव का संकेत दिया है। अब इसी तरह विधानसभा चुनाव में भी सिटिंग विधायकों के मुकाबले मजबूत दावेदारों को मौका देने की रणनीति अपनाई जा सकती है।

लाखों की बढ़त कुछ हजार पर सिमटी

2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा के लिए एक और चिंता सामने रखी। 2019 में जिन लोकसभा सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने दो से ढाई लाख तक के अंतर से जीत दर्ज की थी, 2024 में कई जगह यह बढ़त कुछ हजार वोटों तक सिमट गई। कुछ विधानसभा क्षेत्रों में लोकसभा प्रत्याशी भाजपा के खाते में आगे तो रहे, लेकिन उन्हें उतने वोट नहीं मिले, जितने उसी क्षेत्र के भाजपा विधायक को पिछले विधानसभा चुनाव में मिले थे। पार्टी के लिए यह अंतर इसलिए अहम है क्योंकि इससे विधायक के स्थानीय जनाधार और संगठनात्मक पकड़ का आकलन किया जा सकता है। यदि विधायक का व्यक्तिगत वोट बैंक लोकसभा चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार के काम नहीं आया तो 2027 के टिकट की समीक्षा में यह सवाल उठना स्वाभाविक है।

जातीय समीकरण भी टिकट का अहम आधार

भाजपा के लिए टिकट का फैसला केवल चुनावी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने वाला। कानपुर-बुंदेलखंड की सामाजिक संरचना को देखते हुए जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण रहेगा। नई क्षेत्रीय कमेटी में अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने के बाद अब विधानसभा सीटों पर भी इसी तरह के सामाजिक संतुलन को साधने की कोशिश की जा सकती है। ऐसे में 2027 के लिए संभावित उम्मीदवारों के चयन में 2024 का वोट ट्रेंड, 2022 का विधानसभा प्रदर्शन, मौजूदा विधायक का जनाधार और सीट का जातीय समीकरण एक साथ देखा जा सकता है।

विधायकों के लिए 2024 बना परीक्षा परिणाम

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जून में कानपुर में कहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में विधायकों का प्रदर्शन ही उनका टिकट तय करने में महत्वपूर्ण होगा। अब क्षेत्रीय कमेटी में बदलाव के बाद यह संदेश और स्पष्ट माना जा रहा है कि पार्टी 2027 के लिए संगठन और चुनावी चेहरे, दोनों स्तर पर नए सिरे से तैयारी कर रही है। इसलिए कानपुर-बुंदेलखंड के भाजपा विधायकों के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव अब सिर्फ पुराना चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि 2027 के टिकट का रिपोर्ट कार्ड बन सकता है।

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