- 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा आंकड़े बने आधार; कांग्रेस 107-120 सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा की ओर से 60-70 सीटों की पेशकश की चर्चा, असली खींचतान सीटों की संख्या के साथ ‘क्वालिटी’ पर भी
भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर भले बनी हुई हो, लेकिन सीट बंटवारा सबसे अहम बातचीत बन गया है। कांग्रेस सूत्रों की माने तो पार्टी की ओर से 107 से 120 सीटों की मांग की जा रही है, जबकि सपा 60-70 सीटों से अधिक नहीं देना चाहती। दोनों दलों के बीच मतभेद केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कुछ अहम सीटों को लेकर भी बात अटक रही है। कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन और 2017 के गठबंधन फॉर्मूले को आधार बनाकर अधिक सीटों की मांग कर रही है। दूसरी ओर सपा 2022 के विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन और 2024 में 37 लोकसभा सीटों पर जीत को अपने हिस्से के बड़े दावे का आधार बना रही है।
2022 में सपा का प्रदर्शन बना बड़ा आधार
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने 347 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसे 111 सीटों पर जीत मिली और 223 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही। यानी सपा जिन सीटों पर मैदान में थी, उनमें 334 सीटों पर उसका प्रदर्शन जीत या दूसरे स्थान के रूप में दर्ज हुआ। यही आंकड़े सपा की मौजूदा बातचीत में महत्वपूर्ण आधार बनते हैं। पार्टी के लिए उन विधानसभा क्षेत्रों में अपना संगठन और मौजूदा राजनीतिक आधार बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा, जहां 2022 में वह सीधे मुकाबले में थी। इसके मुकाबले कांग्रेस ने 2022 में 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ दो सीटें जीती थीं। चार सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। उसका वोट शेयर करीब 2.33 प्रतिशत रहा था।
2024 ने कांग्रेस की बातचीत मजबूत की
लोकसभा चुनाव 2024 में तस्वीर बदली। सपा और कांग्रेस ने यूपी में गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने 17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और इनमें छह पर जीत दर्ज की, जबकि 11 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही। यानी कांग्रेस जिन 17 सीटों पर लड़ी, वहां वह शीर्ष दो में रही। सपा ने 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 पर जीत दर्ज की। 24 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। इस तरह सपा 61 सीटों पर शीर्ष दो में रही। यही आंकड़े दोनों दलों की बातचीत में अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। कांग्रेस 17 सीटों में छह जीत और 11 दूसरे स्थान को अपनी बेहतर स्ट्राइक रेट के आधार के तौर पर देखती है, जबकि सपा पूरे प्रदेश में अपने व्यापक चुनावी आधार को प्रमुखता देती है।
कांग्रेस 2017 का फॉर्मूला भी सामने रख रही
कांग्रेस 2027 के लिए केवल 2022 के विधानसभा आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ हुए गठबंधन को भी बातचीत का आधार बना रही है। सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस 107 से 120 सीटों के दायरे में दावा कर रही है। हालांकि 2017 और 2027 की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। 2017 में सपा सत्ता में थी, जबकि अब दोनों दल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नए राजनीतिक समीकरणों के साथ बातचीत कर रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने जुलाई में 2027 के लिए बराबरी और सम्मान के आधार पर सीट बंटवारे की बात कही थी।
सपा 60-70 सीटों के फॉर्मूले पर चर्चा में
दूसरी ओर हालिया रिपोर्टों में सपा की ओर से कांग्रेस को करीब 60-70 सीटें देने के फॉर्मूले की चर्चा है। जून में सामने आई रिपोर्टों में यह दायरा 60 से 80 सीटों के बीच बताया गया था, जबकि सितंबर की रिपोर्टों में 60-70 सीटों की चर्चा सामने आई। इस अंतर का सीधा कारण दोनों दलों के चुनावी आंकड़ों को देखने का अलग नजरिया है। सपा 2022 के विधानसभा परिणामों को सीट-दर-सीट आधार मान रही है, जबकि कांग्रेस 2024 के लोकसभा परिणाम को अपनी बातचीत की ताकत के रूप में रख रही है।
असली सवाल सीटों की संख्या नहीं, सीटें कौन सी
सीट बंटवारे में केवल यह तय होना महत्वपूर्ण नहीं होगा कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलती हैं। उससे बड़ा सवाल यह होगा कि कौन सी विधानसभा सीटें उसके हिस्से में आती हैं। कांग्रेस उन सीटों पर जोर दे सकती है जहां 2024 में उसके लोकसभा उम्मीदवार जीते या दूसरे स्थान पर रहे। दूसरी ओर सपा ऐसी विधानसभा सीटें अपने पास रखना चाहेगी जहां उसका 2022 का प्रदर्शन मजबूत रहा था और संगठनात्मक ढांचा पहले से तैयार है। इसी वजह से दोनों दलों के बीच संभावित बातचीत में सीटों की संख्या के साथ भौगोलिक वितरण, पिछला चुनावी प्रदर्शन और स्थानीय संगठन महत्वपूर्ण मुद्दे बनेंगे। कांग्रेस की ओर से जल्दी सीट बंटवारे की मांग के पीछे भी ‘क्वालिटी’ सीटों पर फोकस की बात सामने आई है।
2027 के साथ 2029 का गणित भी महत्वपूर्ण
सीट बंटवारे का असर केवल 2027 विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए भी दोनों दल विधानसभा स्तर पर अपने संगठन और प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करना चाहेंगे। 2024 में सपा ने 37 लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में छह सीटें आई थीं। इसलिए 2027 में किस दल को किन विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने का अवसर मिलता है, उसका असर भविष्य में लोकसभा सीटों पर दावेदारी और संगठनात्मक विस्तार पर भी पड़ सकता है।
बातचीत में अभी अंतिम फॉर्मूला तय नहीं
फिलहाल 107-120 बनाम 60-70 सीटों का अंतर दोनों दलों की शुरुआती स्थितियों को दिखाता है, अंतिम समझौते को नहीं। सितंबर की रिपोर्टों में दोनों दलों के बीच संख्या और कुछ महत्वपूर्ण सीटों को लेकर मतभेद का उल्लेख है। इसलिए किसी संभावित अंतिम संख्या को अभी तय मानना जल्दबाजी होगी। दोनों पक्ष अपने-अपने चुनावी आंकड़ों, संगठनात्मक स्थिति और महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों के आधार पर बातचीत आगे बढ़ा रहे हैं। सीटों की संख्या से ज्यादा निर्णायक यह होगा कि समझौते में किन विधानसभा क्षेत्रों का बंटवारा किस आधार पर होता है। यही बिंदु 2027 के गठबंधन की चुनावी रणनीति और दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे की अंतिम तस्वीर को आकार देगा।


