- अशोक मिश्रा ने संगठन के कामकाज और कार्यकर्ताओं की स्थिति पर उठाए सवाल; रामदेव शुक्ला के बाद दूसरा सार्वजनिक विरोध, क्षेत्रीय अध्यक्ष पहले ही दे चुके हैं अनुशासन की चेतावनी**
भारत 19
कानपुर। भाजपा के कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में नई क्षेत्रीय कमेटी के गठन के बाद संगठन के भीतर उठे असंतोष के सुर अब और मुखर हो गए हैं। पूर्व जिलाध्यक्ष रामदेव शुक्ला के बाद अब क्षेत्रीय मीडिया संपर्क संयोजक और कानपुर के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अशोक मिश्रा ने करीब 450 शब्दों का खुला पत्र जारी कर संगठन के कामकाज, कार्यकर्ताओं की भूमिका और नेतृत्व की कार्यशैली पर तीखे सवाल उठाए हैं। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि रामदेव शुक्ला की सार्वजनिक नाराजगी के बाद क्षेत्रीय अध्यक्ष राम किशोर साहू अनुशासनहीनता पर कार्रवाई की चेतावनी दे चुके हैं। इसके बावजूद दूसरा खुला विरोध सामने आने से नई क्षेत्रीय कमेटी को लेकर चल रही नाराजगी की चर्चा और तेज हो गई है।
संगठन में डेटा बनाम कार्यकर्ता की भूमिका पर सवाल
अशोक मिश्रा ने पत्र में दावा किया कि लंबे समय से पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ रही है। उनका कहना है कि संगठन में कार्यकर्ताओं के राजनीतिक विकास और नेतृत्व तैयार करने के बजाय डेटा जुटाने और उसकी रिपोर्टिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। उन्होंने चेताया कि कार्यकर्ताओं की इस स्थिति का असर भविष्य में संगठन को नुकसान के रूप में उठाना पड़ सकता है। मिश्रा ने संगठन की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी करते हुए ‘बाबूगीरी, चमचागीरी, मुंशी, क्लर्क, चपरासीगीरी, सिक्योरिटी गार्ड, बॉडी गार्ड और जी हुजूरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘होमवर्क’ और आंकड़ों के नाम पर कार्यकर्ताओं पर बनाए जाने वाले दबाव तथा सार्वजनिक रूप से होने वाली कथित बेइज्जती पर भी सवाल उठाए।
कार्यकर्ताओं की चुप्पी पर गांधी के तीन बंदरों का जिक्र
खुले पत्र में मिश्रा ने कार्यकर्ताओं की चुप्पी की तुलना महात्मा गांधी के तीन बंदरों से करते हुए संगठन में असहमति की आवाज दबने का संकेत दिया। उन्होंने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के घर जाकर फोटो खिंचवाने की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया। मिश्रा के मुताबिक, लाभार्थियों के घर बार-बार फोटो खिंचवाने पहुंचने से उन्हें असहजता हो सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी कार्यक्रम का उद्देश्य सेवा है तो उसके प्रदर्शन पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है।
रामदेव शुक्ला पहले ही जता चुके हैं नाराजगी
नई क्षेत्रीय कमेटी को लेकर इससे पहले पूर्व जिलाध्यक्ष रामदेव शुक्ला सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने क्षेत्रीय कमेटी में आदित्य त्रिवेदी को क्षेत्रीय महामंत्री बनाए जाने पर सवाल उठाया था। त्रिवेदी पूर्व भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के निजी सचिव रह चुके हैं। शुक्ला ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में त्रिवेदी पर गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि, ये आरोप शुक्ला के व्यक्तिगत दावे हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके बाद क्षेत्रीय अध्यक्ष राम किशोर साहू ने संगठनात्मक बैठक में अनुशासनहीनता को लेकर सख्त संदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि पार्टी में अनुशासन से समझौता नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई होगी।
नई कमेटी में पदों को लेकर भी नाराजगी
नई क्षेत्रीय कमेटी के गठन के बाद संगठन के भीतर पदों के बंटवारे को लेकर भी असंतोष की चर्चा है। पार्टी के अंदर चर्चा है कि जिन नेताओं को क्षेत्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, उनमें कई को जगह नहीं मिली। इनमें पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष प्रकाश पाल के करीबी माने जाने वाले कुछ नेताओं के नाम भी बताए जा रहे हैं। हालांकि, पदों के बंटवारे को लेकर पार्टी नेतृत्व की ओर से किसी तरह की आधिकारिक असहमति सामने नहीं आई है।
घाटमपुर की बैठक में भी वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी
इसी बीच घाटमपुर में पूर्व जिलाध्यक्षों की बैठक को लेकर भी संगठन के भीतर चर्चा तेज हुई है। बैठक में एक क्षेत्रीय पदाधिकारी की मौजूदगी और वरिष्ठ पूर्व जिलाध्यक्षों के सामने संगठनात्मक अनुशासन को लेकर दिए गए संदेश पर कुछ वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी की बात सामने आई। पार्टी के पुराने नेताओं के बीच इसे संगठनात्मक अनुभव और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच बढ़ते अंतर के रूप में देखा जा रहा है।
चुनाव से पहले असंतोष दूर करना चुनौती
विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन को बूथ और शक्ति केंद्र स्तर तक सक्रिय करने में जुटी है। ऐसे समय में क्षेत्रीय कमेटी के गठन के बाद लगातार सार्वजनिक रूप से सामने आ रही नाराजगी नेतृत्व के लिए चुनौती बन सकती है। एक ओर पार्टी अनुशासन और एकजुटता का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ और सक्रिय कार्यकर्ताओं की ओर से सोशल मीडिया के जरिए संगठनात्मक कामकाज पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय नेतृत्व के सामने चुनौती केवल अनुशासन बनाए रखने की नहीं, बल्कि असंतोष के कारणों को समझकर संगठन के भीतर संवाद कायम करने की भी है।


