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अब सिर्फ दाल नहीं, किसान की कमाई “उगाएगा” खेत

  • आईआईपीआर की नई दिशा में मौसम सहने वाली दलहन किस्मों से आधुनिक दाल मिल तक अनुसंधान को बाजार और किसान की आय से जोड़ने पर जोर

भारत 19 डेस्क
कानपुर। दलहन की खेती में अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है। मौसम की मार से फसल बचाना, लागत घटाना, गुणवत्ता सुधारना और उपज का बेहतर मूल्य हासिल करना भी अनुसंधान के केंद्र में आ गया है। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के स्थापना दिवस पर सामने आई संस्थान की अनुसंधान दिशा इसी बदलाव की तस्वीर पेश करती है। उन्नत दलहन किस्मों और गुणवत्तापूर्ण बीज से लेकर रोग-कीट प्रबंधन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन तक ऐसी तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है, जिनका सीधा असर किसान की आमदनी पर दिखाई दे।

स्थापना दिवस पर मुख्य अतिथि रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह ने संस्थान के अनुसंधान और नवाचार को किसानों के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने बदलते मौसम को दलहन उत्पादन के सामने बड़ी चुनौती बताते हुए ऐसी किस्मों की जरूरत पर जोर दिया, जो अधिक तापमान, बेमौसम बारिश और रोग-कीट के दबाव में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

मौसम बदला तो दलहन की किस्में भी बदलेंगी

जलवायु परिवर्तन के साथ खेती की परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव, बेमौसम बारिश और रोग-कीट का बढ़ता दबाव दलहन किसानों के लिए जोखिम बढ़ा रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों का जोर ऐसी जलवायु अनुकूल दलहन किस्मों के विकास पर है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। आईआईपीआर की आधिकारिक अनुसंधान जानकारी में भी दलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ जैविक और अजैविक दबावों से निपटने वाली किस्मों और तकनीकों पर काम का उल्लेख है। संस्थान की विकसित कई किस्मों में रोग प्रतिरोध, बेहतर उपज और अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुकूल गुण शामिल हैं। यानी भविष्य की दलहन खेती में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि एक हेक्टेयर में कितनी दाल पैदा हुई, बल्कि यह भी होगा कि मौसम की मार के बावजूद किसान कितनी फसल बचा पाया।

खेत की उपज अब गांव में बनेगी तैयार दाल


किसान की आय बढ़ाने का दूसरा बड़ा रास्ता प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन है। आईआईपीआर के निदेशक डॉ. जी.पी. दीक्षित ने प्रसंस्करण तकनीकों का उल्लेख करते हुए बताया कि मिनी दाल मिल और दूसरी प्रसंस्करण तकनीकों को इसी दिशा में विकसित और उन्नत किया है। संस्थान की तकनीकी जानकारी में मिनी दाल मिल को दलहन की सफाई, प्रसंस्करण और दाल तैयार करने के लिए विकसित तकनीक के रूप में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर दलहन प्रसंस्करण को बढ़ावा देना और इससे आय व रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसका सीधा मतलब है कि किसान को केवल कच्ची दलहन बेचने तक सीमित रहने के बजाय अपनी उपज को प्रसंस्कृत कर तैयार दाल के रूप में बाजार तक पहुंचाने का विकल्प मिल सकता है। यहीं से दलहन अनुसंधान का रास्ता खेत से आगे बढ़कर गांव, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंचता है

कच्ची दलहन से तैयार दाल तक बढ़ेगा मूल्य

दलहन की फसल तैयार होने के बाद किसान को कई बार तत्काल बिक्री करनी पड़ती है। ऐसे में उपज को स्थानीय स्तर पर ही प्रसंस्कृत करने की सुविधा मिलने पर मूल्य संवर्धन का लाभ किसान या ग्रामीण उद्यमी तक पहुंच सकता है। आईआईपीआर की मिनी दाल मिल इसी सोच पर आधारित तकनीकों में शामिल है। संस्थान ने ग्रामीण स्तर पर दलहन की छोटी प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देने को आय और रोजगार सृजन से जोड़ा है। इससे गांवों में छोटे कृषि उद्यम, स्थानीय प्रसंस्करण और रोजगार की नई संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं।

80 उन्नत प्रजातियों से मजबूत हुआ अनुसंधान

स्थापना दिवस पर बताया गया कि आईआईपीआर ने दलहनी फसलों की करीब 80 उन्नत प्रजातियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन प्रजातियों का उद्देश्य अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और बदलती कृषि परिस्थितियों में फसल की क्षमता को मजबूत करना है। संस्थान की आधिकारिक सूची में चना, अरहर, उड़द, मसूर और मटर समेत विभिन्न दलहनी फसलों की उन्नत किस्में दर्ज हैं। इनमें कई किस्मों को रोग प्रतिरोध, बेहतर उपज और विशेष कृषि क्षेत्रों के अनुरूप विकसित किया गया है। संस्थान के अनुसार ऐसी किस्मों को अपनाने से किसानों की उपज और आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

गुणवत्तापूर्ण बीज बनेगा बढ़ी उपज की पहली सीढ़ी

उन्नत किस्म विकसित होने के बाद उसका लाभ खेत तक पहुंचाना अगली चुनौती है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। स्थापना दिवस पर किसानों को उन्नत बीज के साथ कृषि निवेश सामग्री भी वितरित की गई। आईआईपीआर की अनुसंधान और तकनीकी गतिविधियों में उन्नत किस्मों के बीज तथा फसल उत्पादन तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने पर लगातार जोर दिया जाता रहा है। इसका मकसद नई तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे खेत तक पहुंचाना है।

उत्पादन बढ़ा, अब उत्पादकता और आय की बारी

उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद, लखनऊ के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह ने बताया कि देश में दलहन उत्पादन 14 मिलियन टन से बढ़कर 27.5 मिलियन टन तक पहुंचना आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि है। इसमें आईआईपीआर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। हालांकि अब चुनौती केवल कुल उत्पादन बढ़ाने की नहीं है। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता, गुणवत्ता, पोषण मूल्य और किसान की आमदनी बढ़ाना भी जरूरी है। यही वजह है कि अनुसंधान का अगला चरण नई किस्मों से आगे बढ़कर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन से जुड़ रहा है।

अनुसंधान की असली सफलता किसान की कमाई

आईआईपीआर के स्थापना दिवस पर सामने आई अनुसंधान दिशा से साफ है कि दलहन खेती का मॉडल बदल रहा है। नई किस्म विकसित होना उपलब्धि है, लेकिन उसका असली फायदा तब होगा जब मौसम के जोखिम में कमी आए, लागत घटे, उत्पादन बढ़े और किसान को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिले। मिनी दाल मिल जैसी तकनीक इस बदलाव को खेत से बाजार तक ले जाने का माध्यम बन सकती है। आईआईपीआर भी ऐसी तकनीकों को ग्रामीण स्तर पर आय और रोजगार के अवसरों से जोड़ रहा है। इसलिए आने वाले समय में दलहन अनुसंधान की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होगा कि कितनी नई किस्में विकसित हुईं, बल्कि यह भी होगा कि उनसे किसान की लागत कितनी घटी, उत्पादकता कितनी बढ़ी और उसकी उपज से मिलने वाली आमदनी कितनी बढ़ी।

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