- कानपुर-बुंदेलखंड में छह साल से नहीं बदली टीम, विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ा संगठन का संकट
राजीव सक्सेना, कानपुर। विधानसभा चुनाव में करीब छह महीने बचे हैं, लेकिन कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में भाजपा अभी तक अपनी चुनावी टीम तय नहीं कर पाई है। छह साल में दो क्षेत्रीय अध्यक्ष बदले और तीसरे अध्यक्ष रामकिशोर साहू को आए दो महीने से अधिक हो चुके हैं, लेकिन क्षेत्रीय कमेटी आज भी वही है, जो 2020-21 में तत्कालीन अध्यक्ष मानवेन्द्र सिंह के समय बनी थी। भाजपा की दिक्कत केवल नई कमेटी घोषित करने में देरी नहीं है। असली संकट यह है कि पार्टी चुनाव के करीब पहुंच रही है और उसके सामने फैसला है, पुराने पदाधिकारियों को हटाकर नई टीम बनाई जाए या फिर उसी कमेटी के भरोसे विधानसभा चुनाव की तैयारी की जाए, जिसकी उम्र छह साल हो चुकी है।
अध्यक्ष बदलते गए, कमेटी वहीं की वहीं
मानवेन्द्र सिंह के कार्यकाल में बनी 31 सदस्यीय क्षेत्रीय कमेटी के बाद मार्च 2023 में प्रकाश पाल अध्यक्ष बने। वह तीन साल से अधिक समय तक पद पर रहे, लेकिन अपनी टीम नहीं बना सके। इस दौरान कई पदाधिकारियों की सक्रियता पर सवाल उठे, कुछ बैठकों और संगठनात्मक गतिविधियों से भी दूर रहे, लेकिन उन्हें हटाया नहीं जा सका। 25 जून 2026 को रामकिशोर साहू को क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया और प्रकाश पाल को पिछड़ा वर्ग मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद भी क्षेत्रीय कमेटी में कोई बदलाव नहीं हुआ। यानि भाजपा ने नेतृत्व बदल दिया, लेकिन नेतृत्व के नीचे काम करने वाला ढांचा नहीं बदला।
नई टीम बने तो नाराजगी, पुरानी रहे तो बोझ
यहीं भाजपा की सबसे बड़ी मजबूरी छिपी है। छह साल से पद पर बैठे नेताओं को हटाना आसान नहीं है। संगठन में उनकी अपनी पकड़ है, स्थानीय समीकरण हैं और अलग-अलग नेताओं से राजनीतिक रिश्ते हैं। चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर फेरबदल हुआ तो असंतोष बढ़ने की आशंका है। दूसरी तरफ, कमेटी को जस का तस रखना भी पार्टी के लिए जोखिम है। कई पदाधिकारी लंबे समय से प्रभावी भूमिका में नहीं हैं और प्रकाश पाल भी अपने कार्यकाल में इस ढांचे को बदल नहीं पाए। भाजपा इसलिए ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां **कमेटी बदली तो नाराजगी और नहीं बदली तो चुनावी तैयारी पर सवाल।
रामकिशोर साहू के सामने भी प्रकाश पाल वाली चुनौती
प्रकाश पाल के कार्यकाल में अध्यक्ष नया था, लेकिन टीम पुराने दौर की। यही स्थिति अब रामकिशोर साहू के सामने है। लोकसभा चुनाव के दौरान संगठन के भीतर यह खींचतान भी सामने आई थी। कमेटी के कुछ पदाधिकारी प्रकाश पाल के बजाय मानवेन्द्र सिंह से निर्देश लेते रहे। इससे यह सवाल उठा कि जब अध्यक्ष की अपनी टीम ही नहीं होगी तो संगठन की कमांड किसके हाथ में होगी। अब विधानसभा चुनाव के समय रामकिशोर साहू को भी उसी पुराने ढांचे के साथ काम करना पड़ रहा है। यदि उन्हें अपनी टीम बनाने का मौका नहीं मिलता तो चुनावी जवाबदेही भी धुंधली रहेगी। अध्यक्ष हार-जीत के लिए जवाबदेह होगा, लेकिन उसके पास अपनी चुनावी टीम नहीं होगी।
छह महीने में 52 सीटों की पड़ताल कौन करेगा
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में 52 विधानसभा सीटें हैं। 2017 में भाजपा ने इनमें से 47 सीटें जीती थीं। 2022 में यह संख्या घटकर 40 रह गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति और बिगड़ी। 2019 में क्षेत्र की सभी 10 लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा 2024 में केवल चार सीटें जीत सकी। इन नतीजों के बाद आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सामान्य तैयारी से काम नहीं चलेगा। पार्टी को सीट-दर-सीट समीक्षा करनी होगी। कहां संगठन कमजोर हुआ, किन क्षेत्रों में कार्यकर्ता निष्क्रिय हैं, किन विधायकों के खिलाफ नाराजगी है, कहां विपक्ष मजबूत हुआ और किस सीट पर अलग रणनीति चाहिए, यह पड़ताल क्षेत्रीय संगठन की जिम्मेदारी है। लेकिन भाजपा के सामने समस्या यही है कि चुनावी तैयारी के इस सबसे महत्वपूर्ण दौर में क्षेत्रीय स्तर पर जिम्मेदारियों का नया बंटवारा ही नहीं हुआ।
कमेटी में देरी का सीधा असर टिकट पर
विधानसभा चुनाव से पहले क्षेत्रीय संगठन की रिपोर्ट उम्मीदवार चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पार्टी को यह जानना होगा कि मौजूदा विधायक की स्थिति क्या है, किस सीट पर उम्मीदवार बदलना पड़ सकता है और किस क्षेत्र में भाजपा की जमीन कमजोर हुई है। यदि निष्क्रिय या असमंजस में पड़े पदाधिकारियों के भरोसे राजनीतिक फीडबैक तैयार हुआ तो जमीन की सही तस्वीर ऊपर तक पहुंचने में देर या कमी हो सकती है। इसका असर टिकट वितरण तक जा सकता है। गलत राजनीतिक आकलन का पहला नुकसान टिकट में होता है और अंतिम हिसाब मतदान के बाद सीटों में।
नई कमेटी देर से बनी तो तैयारी का समय घटेगा
यदि भाजपा नई क्षेत्रीय कमेटी बनाने का फैसला करती है तो अब उसके पास समय बहुत कम है। नए पदाधिकारियों को 14 प्रशासनिक जिलों और 17 जिला इकाइयों के साथ समन्वय बनाना होगा। उन्हें अपने क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति समझनी होगी और विधानसभा स्तर की चुनावी जिम्मेदारियां संभालनी होंगी। इस पूरी प्रक्रिया के लिए समय चाहिए। जितनी देर से नई टीम बनेगी, उतना कम समय उसे बूथों, विधानसभा क्षेत्रों और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ बनाने के लिए मिलेगा। चुनाव के बिल्कुल करीब टीम घोषित हुई तो नए पदाधिकारी सीधे चुनावी दबाव में उतरेंगे। वहीं पुरानी कमेटी के साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया जाता है तो पार्टी को उसे भी जल्द स्पष्ट करना होगा। मौजूदा पदाधिकारियों को यह भरोसा देना जरूरी होगा कि चुनाव तक जिम्मेदारी उन्हीं के पास है, ताकि वे बदलाव की आशंका छोड़कर पूरी ताकत से मैदान में उतर सकें।
इटावा से बुंदेलखंड तक अलग-अलग चुनौती
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र राजनीतिक रूप से एक जैसा नहीं है। इसमें इटावा है, जो समाजवादी पार्टी का मजबूत केंद्र रहा है और सपा प्रमुख अखिलेश यादव का पैतृक क्षेत्र भी है। कानपुर, कन्नौज, फर्रुखाबाद और औरैया के समीकरण अलग हैं तो बुंदेलखंड की अपनी राजनीतिक चुनौतियां हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भी संकेत दिया है कि पूरे क्षेत्र के लिए एक जैसी रणनीति पर्याप्त नहीं होगी। भाजपा को विधानसभा-दर-विधानसभा रणनीति और उसकी निगरानी के लिए स्पष्ट संगठनात्मक कमांड की जरूरत होगी। यहीं क्षेत्रीय कमेटी की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
अब फैसला टला तो तैयारी पर पड़ेगा भारी
भाजपा के सामने समय तेजी से निकल रहा है। अगले छह महीने में पार्टी को कमजोर सीटों की पहचान से लेकर बूथों की मजबूती, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, विधायकों की रिपोर्ट और उम्मीदवारों के चयन तक कई चरण पूरे करने हैं। लेकिन कानपुर-बुंदेलखंड में पार्टी अभी भी उस बुनियादी फैसले पर अटकी है, जो इन सभी तैयारियों की दिशा तय करेगा। नई कमेटी बनती है तो उसे मैदान समझने और टीम खड़ी करने का समय चाहिए। पुरानी कमेटी रहती है तो उसे चुनाव तक जिम्मेदारी का भरोसा देना होगा।


